ब्रह्मांडीय फैक्ट्री के दो महान ब्रांड
बोल हरि बोल – अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और हमारे राष्ट्रीय बालक में समानताएं वाकई हैरान कर देने वाली हैं… हरीश मलिक,वरिष्ठ व्यंग्यकार और स्तंभकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और हमारे...

बोल हरि बोल – अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और हमारे राष्ट्रीय बालक में समानताएं वाकई हैरान कर देने वाली हैं…
हरीश मलिक,
वरिष्ठ व्यंग्यकार और स्तंभकार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और हमारे राष्ट्रीय बालक, राजनीति के ये दो महापुरुष मानो एक ही ब्रह्मांडीय फैक्ट्री में बने हैं। बस लेबल अलग-अलग ब्रांड यानि देश के चिपका दिए गए हैं। दोनों की राजनीतिक यात्राएं ऐसे लगती हैं, जैसे किसी दैवीय शक्ति ने दुनिया को हंसाने-मुस्कुराने के ढेर सारे अवसर देने के लिए खास स्क्रिप्ट लिखी हो। राजनीति के ये दो चमकते हुए सितारे नहीं, बल्कि दो ऐसे टूटते तारे हैं, जिनको देखकर लोग दुआ नहीं, बल्कि मनोरंजन की उम्मीद करते हैं। राजनीति में इनका प्रवेश भी ऐसा है, जैसे कोई स्कूल का जिद्दी बच्चा गलती से प्रिंसिपल के ऑफिस में घुस जाए। उसे पता नहीं होता कि वहां क्या करना है? लेकिन उसमें बकलोल करने का आत्मविश्वास कूट-कूटकर भरा होता है।
यह दोनों विभूतियां पूरी तरह C… हैं, यानि Commendable सराहनीय/सम्मान योग्य! शायद इसीलिए दोनों की सूई हमेशा ‘C’ पर अटक जाती है। ट्रंप हर कुछ दिनों में भारत-पाक के बीच C यानि सीजफायर कराने की अपनी काल्पनिक महानता की याद दिलाते रहते हैं। ऐसा लगता है कि वे व्हाइट हाउस नहीं, बल्कि अपनी इमेजिनेशन का हॉलीवुड स्टूडियो चला रहे हैं। दूसरी ओर यहां राष्ट्रीय बालक अपनी विश्व-प्रसिद्ध C यानी चौकीदार, चोर और अब चोरी की कथा के पार्ट-1, पार्ट-2, पार्ट-3 जारी करते रहते हैं। मानिए कि वे राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि नेटफ्लिक्स की ‘सी’ सीरीज पर काम कर रहे हैं।
इन दोनों में अद्भुत समानता यह है कि जब भी वे अपने-अपने महावाक्य बोलते हैं, तो उनके आसपास मौजूद हवाएं भी कभी व्यंग्य से मुस्कुरा देती हैं तो कभी संकोच से सरगोशी करने लगती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ट्रंप की बातें सुनकर अमेरिका के साथ पूरी दुनिया हक्की-बक्की रह जाती है। पुतिन से लेकर शी जिनपिंग तक की आंखों में हंसी के लट्टू जलने-बुझने लगते हैं। और इधर हमारे राष्ट्रीय बालक की बातें सुनकर भारत का चुनाव आयोग मजाकिया अंदाज में हाई स्कूल के हेड मास्टर साहब की तरह कहता है- “युवराज, पहले पॉलिटिक्स की पहली कक्षा की कॉपी खोलो, हम समझाते हैं कि राजनीति कैसे करते हैं। हम तुम्हें वोट चोरी का इतिहास भी पढ़ाएंगे।”
दरअसल, शांति के नोबेल से चूक जाने के बावजूद ट्रंप बार-बार भारत-पाक सीजफायर करवाने का दावा ऐसे करते हैं, जैसे दुनिया के झगड़े सुलझाना उनकी पर्सनल हॉबी हो। या फिर भारत-पाक ने ही उन्हें इसके लिए ठेके पर रखा हो। डोनाल्ड डक-डक करते युद्दविराम को इतने हल्के अंदाज में लेते हैं, मानो वे कह रहे हों…, “आज मौसम बहुत अच्छा है, चलो एक और सीजफायर करवाते हैं!” उधर अपने राष्ट्रीय बालक भी चुनाव प्रक्रिया के शुरू होने पहले ही अपने पसंदीदा आरोप लगाने शुरू कर देते हैं। उनका तो जीवन का उद्देश्य ही यही है कि हर बार नया आरोप लॉन्च करो। जैसे टेक कंपनियां एक ही मशीनरी में मामूली हेर-फेर करके नया मॉडल लॉन्च कर देती है। बस फर्क इतना-सा है कि टेक कंपनियां पता लगते ही गलती तत्काल सुधारती हैं, और अपने बालक हर बार पिछली गलत लाइन का रिहर्सल दोहराते रहते हैं।
आप यकीन मानिए, डोनाल्ड और अपने राष्ट्रीय बालक दोनों में समानता इतनी गहरी है कि दोनों का राजनीतिक डीएनए टेस्ट भी एक-जैसा ही है। सभी जानते हैं कि ट्रंप उस ‘अमेरिका को बचाने’ निकले हैं, जिसकी इकोनॉमी दुनिया में नंबर वन है! इधर अपने राष्ट्रीय बालक उस ‘लोकतंत्र को बचाने’ निकले हैं, जिसके जनतंत्र का डंका दुनियाभर में गुंजायमान हो रहा है! दोनों जी-तोड़ मेहनत कर अपने-अपने लक्ष्य को बचाने में जुटे हैं। यह अलग बात है कि दोनों ही खुद को दुनियावालों की हंसी से बचाना भूल गए हैं। दोनों का ही नतीजा एक जैसा है। ट्रंप को अमेरिका के कोर्ट ने आईना दिखाते हुए कहा है कि “भाई, अपनी हद में ही रहो।” दूसरी ओर अपने राष्ट्रीय बालक चुनाव आयोग ने समझाया कि “बेटा, यह राजनीति है, तुम्हारा टेक प्रोजेक्ट नहीं कि हर बार एक ही प्रयोग दोहराओ।”
वर्तमान में इन दोनों की हालत भी कमोबेश एक जैसी ही है। जैसे परीक्षा में फेल होने के बाद की बच्चा कहता है- “पेपर गलत था, सवाल ही गलत थे। टीचर मिला हुआ है। दुनिया गलत है, बस मैं सही हूं!” लेकिन असली मजे की बात तो यह है कि उन्हें अहसास ही नहीं है कि कल्पना-लोक की उनकी कथाएं सिर्फ उन्हीं के प्रशंसकों की व्हाट्सऐप यूनिवर्स में सच मानी जा रही हैं। बाकि यूनिवर्स में उनकी छवि मनोरंजक और हास्यास्पद बन रही है। अब दोनों मिलकर वैश्विक राजनीति के ‘कॉमेडी यूनिवर्स’ का एक ऐसा अध्याय बन चुके हैं, जिसे पढ़कर-सुनकर जनता कभी हंसती है, कभी मनोरंजन करती है। कभी माथा पकड़ लेती है। पर हां, दोनों को भूलती कभी नहीं है।
अब देखिए, ट्रंप दादा की तो चिंता तो अमेरिका ही करे। अपुन को तो अपने राष्ट्रीय बालक की फिक्र है। बाल दिवस के पुनीत दिन (14 नवंबर) राष्ट्रीय बालक को अपसेट कर देने के अपराध में चुनाव आयोग को क्षमा-याचना करनी चाहिए! उनका दु:ख यही है कि मतगणना मशीनें जानबूझकर गलत गिनती करती हैं। सिर्फ उन्हीं सीटों पर जहां उनके दल को हार मिलती है। बालक का मानना है कि मतदान तो बस एक औपचारिकता है। लोकतंत्र में भावनाएं ही सर्वोच्च होती हैं। आयोग ने बिहार में उनकी भावनाओं और पार्टी का कचूमर निकाल दिया है। बेचारा लोकतंत्र भी सोच में पड़ गया है कि वह किसकी सुने? वह कभी किसी की जीत का गवाह बनकर कटघरे में खड़ा हो जाता है, तो कभी किसी की हार के बाद दोषी। वोट चोरी के पुराने राग की तीन ताल बार-बार सुनाई दे रही है और अगले साल के चुनावों से पहले भी एसआईआर के कारण सुनाई देने वाली है। अजब-गजब यह भी है कि वोट चोरी का पुराना राग इतनी बार बज चुका है कि अब उसकी तीन-ताल भी थक कर कुर्सी मांग रही है!
चलते-चलते
फरीदाबाद में आतंकी डॉक्टर के पास जब AK-47 बरामद हुई तो उसने इसे “मेडिकल इक्विपमेंट” बता दिया।
उसका तर्क था कि जो मरीज एनेस्थीसिया से बेहोश नहीं होते, वो AK-47 देखकर मारे डर के बेहोश हो जाते हैं। यह पढ़ाई हमने पाकिस्तान की दाऊद इब्राहीम मेडिकल एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी में की है। वहां MBBS का मतलब है- Murder, Blasts, Bombing & Suicide.






No Comment! Be the first one.