पधारो म्हारा ‘घुसपैठिया’
चार प्रख्यात व्यंग्यकार रहे जोशी, परसाई, श्रीलाल और हरिश्चंद्र की शैलियों में बेचारे घुसपैठियों पर चुटीले...

बोल हरि बोल
हरीश मलिक,
लेखक और वरिष्ठ व्यंग्यकार
Table Of Content
देश की सीमाएं अब सैनिकों से नहीं, चुनाव आयोग की तारीखों से पहचानी जाती हैं। जैसे-जैसे जिस राज्य में चुनाव नजदीक आते हैं, वहां पर सीमाएं अपने-आप ढीली पड़ जाती है। दिलचस्प यह कि घुसपैठिए भीतर नहीं आते, बल्कि आमंत्रित किए जाते हैं। सवाल यह नहीं कि वे कहां से आए? क्यों और कैसे आए? सवाल यह होता है कि वे किस सूची में जुड़ेंगे। सरहदों की सुरक्षा एक गंभीर विषय है और वोट सुरक्षा व्यावहारिक विषय। इसलिए गंभीरता के बजाए व्यावहारिकता को जमीन पर उतारा जाता है। अगले साल सबसे पहले सरहदी राज्य पश्चिम बंगाल में चुनावी दुंदुभि बजने वाली है। ऐसे में घुसपैठ का मुद्दा अभी से सरगर्म है। क्योंकि घुसपैठिए अब अपराधी नहीं, वोट बैंक हैं। भविष्य की रैलियों की भीड़ और चुनावी गणना के उपयोगी अंक हैं। आइए, जानने की कोशिश करते हैं कि देश के चार प्रख्यात व्यंग्यकार इसे किस नजर और अल्फाजों से नवाजते…
घुसपैठ नहीं, लोकतंत्र की नई खेती
देश के सरहदी राज्यों में घुसपैठिए बढ़ रहे हैं। यह कोई समस्या नहीं, अब राजनीतिक संभावना है। कुछ दल उन्हें अवैध नहीं, भावी मतदाता के रूप में देखते हैं। कुछ के लिए वे करुणा की मूर्ति हैं और चाहते हैं कि शरणार्थी उनकी शरण में आकर वोट बैंक बन जाएं। पश्चिम बंगाल और कश्मीर इस प्रयोगशाला का सबसे उन्नत संस्करण हैं, जहां चुनाव आते ही घुसपैठिए शरणार्थी बन जाते हैं और शरणार्थी अचानक ‘मानवाधिकारी’ हो जाते हैं। नेताओं की नजर में वोट से बड़ा कोई दस्तावेज नहीं होता। यह लोकतंत्र का नया नागरिक शास्त्र है। वे कहते हैं ये बांग्लादेश से आएं, पाकिस्तान से आएं या कहीं और से आएं, पर सच यह है कि ये बड़ी और अहम जरूरत से आते हैं। जरूरत दोनों की है। उन्हें पेट भरने के लिए राशन चाहिए। हमें सत्ता पाने के लिए संख्या। हिसाब-किताब बराबरी का है। एक ओर चावल, दूसरी ओर चुनाव चिन्ह। देश पूछता रह जाता है कि सीमा कहां है? नागरिक कौन है? राजनीति मुस्कराकर कहती है, “चुनाव तक सब अपने हैं।” यह घुसपैठ नहीं, लोकतंत्र की नई खेती है, जिसमें फसल देश की नहीं, सत्ता की काटी जाती है।
(महान व्यंग्यकार शरद जोशी की शैली)
लोकतंत्र में छेद और सौदा एकदम खरा
ऐसा लगता है कि देश की सीमा पर अब सैनिक नहीं, कुतर्क तैनात हैं। और कुतर्क भी ऐसे, जो चुनाव आते ही और लंगड़ा जाते हैं। घुसपैठिया आज कोई अपराधी नहीं, बल्कि ‘जिम्मेदार मतदाता’ की भूमिका में है। कुछ दलों की आंखों में उसे देखकर वही चमक आ जाती है, जो साहूकार की आंखों में कर्जदार देखकर आती है। पश्चिम बंगाल में जैसे ही चुनाव की हवा चली, मानवीय संवेदना का मौसम बसंत बन गया। राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्दी लग गई। सवाल उठाओ तो इंसानियत जाग जाती है। लेकिन ये इंसानियत भी बड़ी चयनशील होती है, वोट देखकर जागती है। पड़ौसी मुल्कों से आए इन घुसपैठियों का पासपोर्ट भूख और राशन है। वीजा राजनीति और चुनाव है। इन्हें राशन चाहिए, नेताओं को वोट बैंक। सौदा एकदम खरा है। देश को समझाया जा रहा है कि सरहदें लकीरें हैं, मिट सकती हैं, लेकिन वोट बैंक ईश्वर की तरह है अमर और अडिग। यह घुसपैठ नहीं, लोकतंत्र का छेद है, जिसमें से देश रिस रहा है। और दुख ये नहीं कि रिस रहा है। दुख ये है कि कुछ लोग नीचे बाल्टी रखकर उसे जमा करने में लगे हैं।
(हरिशंकर परसाई की शैली से प्रेरित)
घुसपैठ की सुविधा निरंतर चालू आहे
हमारी सरहदें अब केवल भूगोल नहीं रही, वह एक प्रशासनिक भ्रम बन चुकी है। घुसपैठिए आते हैं, रुकते हैं और फिर धीरे-धीरे व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं। आश्चर्य की बात यह नहीं कि वे आ रहे हैं, बल्कि यह है कि उनके आने पर कुछ राजनीतिक दलों के चेहरों पर वही चमक दिखती है, जो किसान को फसल देखकर आती है। वोट बैंक की खेती में घुसपैठिया अब बीज नहीं, पूरी फसल है। सवाल देश का नहीं, गणित का है कि कितने आए, कितने जुड़े और कितनों से सत्ता सुरक्षित रही। सरहदी राज्यों में यह समस्या इसलिए नहीं बढ़ी कि सीमा लंबी है, बल्कि इसलिए बढ़ी क्योंकि इन्हें रोकने की राजनीतिक इच्छाशक्ति छोटी है। इसीलिए चुनाव पास आते ही घुसपैठ ‘मानवीय मुद्दा’ बन जाती है और चुनाव बीतते ही वही लोग कानून की नजर में खटकने लगते हैं। राष्ट्र यहां भावनात्मक विषय है, लेकिन वोट ठोस यथार्थ। इसलिए सरकारें बदलती हैं, घोषणाएं बदलती हैं, मगर घुसपैठ की सुविधा चालू रहती है। क्योंकि इस देश में सबसे सुरक्षित चीज सीमा नहीं, बल्कि सत्ता के लिए किया गया समझौता है।
(प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल शैली)
मानो दुर्भिक्ष में किसी भूखे को अनाज मिला
भारतवर्ष की सीमा अब तलवार से नहीं, शब्द-वाणों से लांघी जाती है। जो कल तक घुसपैठिया था, वह आज करुणा का पात्र है और कल का मतदाता बनेगा। यह प्रगति की सतत प्रक्रिया है, पतन की नहीं। कुछ राजनेता इन्हें देख ऐसे प्रसन्न होते हैं मानो दुर्भिक्ष में किसी भूखे को अनाज मिल गया हो। चुनाव का नगाड़ा बजते ही मानवता जाग उठती है और सत्तालोलुप नेता इस ओर से पीठ करके गहरी नींद में सो जाते हैं। देश पूछता है कि ‘ये कौन हैं?’ उत्तर मिलता है, ‘अभी मत पूछो, अभी पर्व चल रहा है।’ चुनाव बीतने के बाद सरकारें इन्हें ढूंढने का आश्वासन देती हैं, ठीक उसी तरह जैसे सरकारी फाइलों में खोई हुई जिम्मेदारी को ढूंढा जाता है, पूरी निष्ठा के साथ, लेकिन बिना किसी जल्दी के। ये चाहे किसी भी देश से आए हों, इनका एक ही उद्देश्य है- पेट की शांति और राजनीति की क्रांति। शासन इन्हें पैसा और अन्न देकर प्रसन्न करता है और ये शासन को जरूरी संख्या देते हैं। यह परस्पर विनिमय की नीति है। राष्ट्र हित को ताक पर रखकर वोट हित की पूजा हो रही है। जब देश की चौखट पर पहरा नहीं रहता, तब सभ्यता भी सत्ता की गोद में जाकर सो जाती है।
(अमर साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चन्द्र की शैली)






No Comment! Be the first one.