
बोल हरि बोल
हरीश मलिक,
लेखक और व्यंग्यकार
एक शाम रेलवे स्टेशन पर श्वेत वस्त्रधारी और खादी की नेहरू जैकेट पहने नेताजी के दर्शन का सौभाग्य मिला। ऊंचे, गोरे और तगड़े। आंखों पर रे-बैन का चश्मा और पैरों में एयर जॉर्डन के महंगे जूते। उनके साथ एक छोटे साइज का वयस्कनुमा बंदा। वह ना भक्त, ना ही चमचा। वह सेवक था, जो पूरे मनोयोग और सेवाभाव से नेताजी के अद्भुत गुणों का बखान करने में लगा रहता था। उसके हाथ में लाल रंग का ब्रीफकेस था, क्योंकि नेताजी तो ‘माया’ को हाथ ना लगाते थे। उनकी जोड़ी दिलचस्प लगी तो हम उनके पास बैठ गए। सेवक भी नीचे पालथी मारकर बैठा। हमने पूछा– नेता जी, कहां जाना हो रहा है? वे बोले– दिल्ली से हम अपना टिकट पक्का करा लिए हैं। अब बिहार जा रहे हैं। छठ के बाद वहां पर चुनाव का महापर्व जो है।
हम बोले कि इस बार तो चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। दोनों गठबंधन में टक्कर है? वो बहुत बेफिक्री से बोले कि चुनाव तो हम जीत ही जाएंगे। उसकी हमको चिंता नहीं ना है। मसला तो चुनाव के बाद मंत्री बनने का है। हम चौंककर बोले- लेकिन सिर्फ आपके जीतने से क्या होगा? आपकी पार्टी-गठबंधन जीतेगा, तभी ना मंत्री बन पाएंगे! नेताजी बोले, कौनसी पार्टी या गठबंधन जीतेगा, इससे हमको कौने फर्क नहीं पड़ता। एक डाल से उड़कर दूसरी डाल पर जाने में समय ही कित्ता लगता है। तुम तो जानते हो कि ये जो माया, महाठगनी है, वही सब कुछ तत्काल करा देती है। हम तो उसी के साथ हैं, जिनके पास सरकार बनाने का बहुमत है और हमें शिक्षा मंत्री बनाने पर सहमत हैं।
इतने बड़े-बड़े और भी मंत्रालय हैं तो आप शिक्षा मंत्री बनने की जिद पर ही क्यों अड़े पड़े हैं? लगता है आपका पढ़ाई से बहुत जुड़ाव रहा है और आपने बहुत सारी डिग्रियां ली हैं। नेताजी बोले- अरे तुमने तो पत्रकारों की तरह दो-तीन सवाल एक साथ ही ठेल दिए। सुनो, पहली बात तो यह है कि जितना स्कोप शिक्षा मंत्रालय में है, उतना हमें कहीं और नजर नहीं आता। दूसरे ये डिग्रियों की का बात करते हो जी। जब नवीं फेल भी सीएम बनने के सपने देख सकता है तो हम काहे नहीं। थर्ड डिवीजन ही सही, लेकिन पूरा इंटर पास किए हैं। पढ़ाई से जुड़ाव इतना रहा कि एक-एक क्लास में दो-दो साल लगाए हैं!
सेवक वाह-वाह के अंदाज में खैनी रगड़े जा रहा था। नेताजी ने बड़ी नजाकत से खैनी निचले होंठ के बीच दबाई और अपनी रौ में बोलने लगे। देखो भाई, तुम्हारे पहले सवाल का जवाब यूं समझो। मान लो कि कहीं पे ट्रेन पलट जाए तो विपक्ष नैतिक आधार पर रेल मंत्री का इस्तीफा मांग लेता है। ऐसे ही अपराध बढ़ने पर गृहमंत्री का इस्तीफा। भीषण हादसा हो जाए तो परिवहन मंत्री का इस्तीफा। और भी कई इस्तीफे हैं, लेकिन शिक्षा में नैतिक शिक्षा जरूर है, पर ऐसा कोई नैतिक आधार नहीं है, जिसके आधार पर आपसे विपक्ष इस्तीफा मांग ले। यानी की पद पांच साल तक पक्का। और पांच साल तक ही मलाई…
हमने टोका, आप जो यह स्कोप की बात कहे हैं, इसे भी जरा विस्तार से बताइए। जवाब से पहले नेताजी ने ही सवाल दाग दिया। अच्छा ये बताओ, तुम किस स्कूल में पढ़े हो। हम बोले, सरकारी में। और तुम्हारे बच्चे। कांन्वेंट स्कूल में…अब नेताजी ने बीच में ही टोका। बस यहीं से ‘स्कोप’ की शुरुआत होती है। सरकार के बड़े-बड़े अफसरों से लेकर मंत्री तक, बिजनेसमैन से लेकर कंपनियों के बड़े-बड़े सीईओ और मैनेजर। नेताओं से लेकर उनके पीए तक। वे खुद तो सरकारी स्कूल में पढ़कर इतने ऊंचे स्तर तक पहुंचे हैं, लेकिन अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम बोले तो कांन्वेंट में ही पढ़ाएंगे। प्राइवेट का ‘स्टेट्स सिंबल’ ऐसा बिजूका बना है कि ये अमीर विभूतियां सरकारी स्कूलों की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखतीं। इसलिए प्राइवेट स्कूल अब स्कूल नहीं रहे, बल्कि बड़े-बड़े मॉल्स बन चुके हैं। इतना हाई-फाई स्टैंडर्ड की बस पूछो मत। और ऐसे ही मॉल से मनचाहा माल मिलना बहुत आसान होता है। उनको ना जाने कितनी परमीशन और अंट-शंट फीसें चाहिए। हम वो सारी परमीशन देंगे तो ‘माल’ से और अधिक मालामाल हो ही जाएंगे।
और मेरे भाई, ये तो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। असली माल तो शिक्षा उद्योग में है। हमने कहा- अब ये उद्योग का बला है। नेताजी हंसकर बोले- अरे बुड़बक, शिक्षा विभाग में लाखों कर्मचारी होते हैं। इनमें से अधिकतर मनचाहे तबादले की सिफारिश के लिए थैली पर थैली लिए घूमते हैं। कुछ भी ले लो, बस मनचाही जगह पर पोस्टिंग मिल जाए। और शिक्षा मंत्रालय का तो काम ही है तबादले करना। यही ऐसा काम है, जिसमें आम के आम और गुठलियों के दाम हैं। और हम भी तो दाम के दम पर टिकट लाए हैं। दाम की बात पर नेताजी के सेवक की आंखें भी लट्टू की तरह चमकीं और गोलमटोल पेट पर हाथ फैरते हुए बोला- नेताजी की किरपा से इतने आम आते हैं कि अपना पेट को गुठलियों से ही भर जाता है!






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