अब मजबूरी का नाम महात्मा नहीं…ठाकरे बंधु कहिए
मानसून इस बार जल्दबाजी में हैं। अपना कोटा जल्द से जल्द पूरा करने पर मूसलाधार बरसने पर उतारू है। उधर संसद के मानसून सत्र में विपक्षी भी सवालों के नश्तर लेकर कमर कसे हुए हैं तो सरकार भी पूरी तरह से...

बोल हरि बोल
हरीश मलिक,
लेखक और व्यंग्यकार
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पता नहीं शिवसेना सुप्रीमो रहे बाला साहेब ठाकरे की आत्मा अपने बच्चों के कदम से खुश होगी या खफा…., लेकिन यह फिर साबित हुआ है कि सत्ता की निगोड़ी कुर्सी चीज ही ऐसी करामाती है, जो नेताओं से जो चाहे करा सकती है। क्योंकि सारी कोशिशों के बावजूद बाला साहेब अपने जीते-जी जो ना करा सके, वो अब हो गया। यानी दो दशक के बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का पुनर्मिलन! दोनों ने अलग-अलग कई दलों से दोस्ती गांठी, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात। दोनों को ही सत्ता दूर और दूर जाती नजर आ रही है। सो, अब दोनों मिलन को बेताब थे, लेकिन कोई बहाना नहीं सूझ रहा था। इनकी किस्मत से महाराष्ट्र में हिंदी का फव्वारा फूटा तो इन्हें आमची मराठी भाषा याद आ गई। जो बाला साहेब की मान-मनुहार और अस्मिता पर एक नहीं हुए, वे अब मराठी अस्मिता पर कंधे से कंधा मिलाने में लगे हैं। गुलाम भारत में एक मुहावरा बना था- मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। आजाद भारत में नेताओं की करतूतों से यह बदलकर हो गया है- मजबूरी का नाम ठाकरे बंधु!
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कर्नाटक के नाटक में इस बार पुत्र-मोह की सियासत
कर्नाटक के नाम में ही नाटक शब्द समाहित है। इसलिए यहां सरकार किसी की भी हो, नाटक होते रहना आम बात है। जब कभी सियासी नाटक नहीं होता तो ऐसा लगता है कि सरकार कोपभवन में है या फिर सियासत स्वर्ग सिधार गई है! लेकिन परम्परा कायम रखते हुए इस बार तो यहां राजस्थान की टक्कर का नाटक चल रहा है। दरअसल, गहलोत-पायलट की तरह कर्नाटक में भी ढाई साल के फार्मूले को लेकर सीएम सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार नाटक-नाटक खेलने में लगे हैं। सियासी शीत युद्ध में दोनों ही वार पर वार कर रहे हैं और दोनों ही हाईकमान को यह जताने की कोशिश में हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक है। इधर सीएम बदलने की चर्चाओं पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे बोल गए- ‘हाईकमान फैसला लेगा!’ अब कोई बताए कि अध्यक्ष के ऊपर भी कोई हाईकमान होता है क्या? असल में खरगे को दो बिल्लियों की लड़ाई की कहानी याद है। सियासी खींचतान में भी तीसरे का भला हो जाता है। इसलिए वो मन से चाहते हैं कि इन दोनों के बीच सियासत की यह अदावत इतनी बढ़ जाए कि उसमें से पुत्र प्रियांक खरगे को सीएम बनाने की गली निकल आए।
केजरीवाल बोले तो ‘अपने मुंह मियां मिठ्ठू’
नोबेल पुरस्कार की जितनी किरकिरी अब हो रही है, उतनी पहले कभी नहीं हुई। हर ऐरा-गेरा नत्थू खेरा नोबेल पर दावा ठोंक रहा है। इन्हें देख अल्फ्रेड नोबेल भी स्पेस में पुरस्कार शुरू करने को लेकर पछता रहे होंगे। पहले दुनिया के स्वयंभू दारोगाजी ने दावा ठोंका कि उनने इतनी क्रांति की है कि 4-5 बार नोबेल पीस प्राइज मिलना चाहिए। अब दिल्ली वाले अपने सर’जी ने ‘अपने मुंह मियां मिठ्ठू’ बनते हुए खुद के लिए ही नोबेल पुरस्कार की वकालत कर डाली है। वो दिल्ली में करारी हार के लिए नहीं, मोहल्ला क्लिनिक के लिए नोबेल पुरस्कार मांग रहे हैं। भाजपा को पता नहीं क्यों लगता है कि सर’जी अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं और उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल सकता था, अगर इसकी कैटेगरी में भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, कुशासन और अराजकता इत्यादि भी शामिल होते। मानसिक संतुलन खोने के दावे पर कांग्रेस भी तब भाजपा से सहमत हो गई, जब सर’जी ने बिहार में एकला चलो रे का राग अलापना शुरू किया!
राजस्थान तक आ पहुंचा शशि थरूर का सुरूर
कांग्रेस की ऐतिहासिक खामियों को गिनाने के लिए अब विपक्षी नेताओं की जरूरत नहीं रही है। कांग्रेस के अपने नेता ही पार्टी हाईकमान को गलतियों का आईना दिखाने में लगे हैं। कांग्रेस हाईकमान भले ही आंखों पर पट्टी बांधकर ‘दूध पीती बिल्ली’ बना रहे, लेकिन एक के बाद एक नेता तो कांग्रेस की ‘दादी’ और ’युवराज’ को निशाने पर ले ही रहे हैं। तिरुवनंतपुरम के कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने काला अध्याय बताकर इंदिरा गांधी की इमरजेंसी की पोल खोल दी। सीधे दिल पर चोट लगने के बावजूद कांग्रेस के अलंबरदार मन-मसोसकर रह गए और थरूर का कुछ नहीं बिगाड़ पाए। इसका असर ये हुआ कि थरूर की बगावत सुदूर राजस्थान तक आ पहुंची है। पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेंद्र व्यास ने अपनी किताब में इंदिरा की इमरजेंसी को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय बताया है। व्यास ने तो राहुल गांधी के विदेशों में जाकर देश की संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने पर भी सवाल उठा दिए हैं!
चलते-चलते..
केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने बिहार में अकेले चुनाव लड़ेगी।
करारी हार के बाद जब कोई साथ आने को तैयार ना हो तो ऐसा ही ऐलान करना पड़ता है…






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