ऊर्जा की राजनीति में भारत: ट्रम्प की चाल, मोदी का जवाब
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इस बयान ने कि “मोदी ने रूस से तेल न खरीदने का वादा किया है”, दुनिया की कूटनीति में हलचल मचा दी है। भारत के लिए यह सिर्फ तेल का सवाल नहीं, बल्कि नीति की स्वतंत्रता...

बयान जिसने मौन तोड़ा, और नई बहस शुरू की
हर बार की तरह इस बार भी ट्रम्प ने कहा कुछ ऐसा, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। व्हाइट हाउस में पत्रकारों के बीच बैठकर उन्होंने आत्मविश्वास से कहा
Table Of Content
- बयान जिसने मौन तोड़ा, और नई बहस शुरू की
- भारत का तेल-समीकरण: जरूरत और रणनीति का संगम
- ट्रम्प की राजनीति: बयान नहीं, दबाव की घोषणा
- मोदी के लिए यह ‘तेल’ नहीं, ‘नीति’ की परीक्षा है
- रूस और भारत: भरोसे के रिश्ते में दरार का खतरा
- अमेरिका का रवैया: मित्रता के नाम पर नियंत्रण
- ऊर्जा की अर्थव्यवस्था: विकल्प आसान नहीं
- मौन कूटनीति: मोदी का संतुलन
- अगर भारत झुका तो…
- अगर भारत डटा रहा तो…
- तेल अब युद्ध का नया चेहरा है
- जनता की दृष्टि से
- भारत को अपने रास्ते पर रहना होगा
- अंत में
“प्रधानमंत्री मोदी ने वादा किया है कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा।”
और फिर मुस्कराते हुए जोड़ा,
“अब मेरा अगला लक्ष्य है—चीन को भी इसके लिए तैयार करना।”
इतना कहना था कि ऊर्जा बाज़ार में लहरें उठ गईं। तेल के दाम ऊपर गए, विश्लेषकों ने ग्राफ़ पलट दिए, और भारत में सवाल उठ खड़ा हुआ— क्या सचमुच मोदी ने यह वादा किया है? और अगर किया है, तो भारत की दशकों पुरानी “रणनीतिक स्वायत्तता” कहाँ रह गई? दिलचस्प यह कि भारत सरकार ने इस पर न “हाँ” कही, न “ना”। विदेश मंत्रालय चुप रहा, प्रधानमंत्री कार्यालय मौन। और यह मौन, शब्दों से कहीं अधिक बोलता है।
भारत का तेल-समीकरण: जरूरत और रणनीति का संगम
भारत ऊर्जा के बिना नहीं चल सकता। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देश के रूप में, हम अपनी जरूरत का 88% तेल आयात करते हैं। हर बैरल की कीमत हमारे बजट, महंगाई और विकास पर असर डालती है। 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तब पश्चिमी देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। तेल बाज़ार से रूस लगभग बाहर कर दिया गया। यही वह पल था जब भारत ने रणनीतिक अवसर देखा— रूस अब सस्ते दामों पर तेल बेचने को तैयार था। भारत ने उस मौके को साधा। रूस से आने वाले तेल ने न केवल ऊर्जा सुरक्षा दी, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था को महंगाई की मार से भी बचाया। भारत के रिफाइनरियों ने इस तेल को खरीदकर फिर से निर्यात किया, जिससे डॉलर आया और राजकोष को राहत मिली। कहा जा सकता है— रूस से सस्ता तेल केवल व्यापार नहीं, भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की कुंजी बन गया।
ट्रम्प की राजनीति: बयान नहीं, दबाव की घोषणा
ट्रम्प की भाषा जितनी तेज़, उनकी रणनीति उतनी सीधी होती है। वह जो कहते हैं, वह किसी न किसी एजेंडे का हिस्सा होता है। उनका यह बयान भी कोई संयोग नहीं। रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका ने लगातार दो मोर्चे खोले हैं— एक सैन्य, दूसरा ऊर्जा का। वह जानता है कि रूस की सबसे बड़ी ताकत उसका तेल है। अगर उसे वैश्विक बाज़ार से काट दिया जाए, तो रूस की युद्ध क्षमता कमजोर पड़ेगी, लेकिन इस योजना में भारत और चीन बाधा हैं। क्योंकि दोनों न केवल रूस से तेल खरीदते हैं, बल्कि उसे स्थायी बाजार भी देते हैं। इसलिए ट्रम्प का बयान वस्तुतः एक चेतावनी है— “या तो हमारे साथ रहो, या रूस के साथ।” उनकी “एनर्जी डिप्लोमेसी” अब खुलकर सामने आ चुकी है।
मोदी के लिए यह ‘तेल’ नहीं, ‘नीति’ की परीक्षा है
भारत की विदेश नीति दशकों से “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित रही है। हमने कभी किसी गुट का हिस्सा नहीं बने। न शीत युद्ध में अमेरिका के साथ खड़े हुए, न रूस के खिलाफ गए। हमने कहा—“हम अपने हित में निर्णय लेंगे।”रूस से तेल खरीदना भी इसी नीति का विस्तार था। भारत ने साफ कहा था— “हम अपने नागरिकों की जरूरतें देखते हैं, न कि किसी देश की नाराज़गी।”पर अब जब ट्रम्प दावा करते हैं कि मोदी ने वादा किया है, तो यह भारत की नीति-स्वतंत्रता पर सीधा सवाल बनता है। क्या भारत अमेरिकी दबाव में अपने हित से समझौता करेगा? या फिर अपनी परंपरा के अनुरूप स्वतंत्र रहेगा? यही वह क्षण है जहाँ मोदी की “विकास और वैश्विक संतुलन” की नीति की असली परीक्षा शुरू होती है।
रूस और भारत: भरोसे के रिश्ते में दरार का खतरा
रूस के साथ भारत का रिश्ता भावनात्मक भी है और रणनीतिक भी। सत्तर के दशक से लेकर आज तक, रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा—हर क्षेत्र में रूस भारत का प्रमुख सहयोगी रहा है। हमारी 60% से अधिक रक्षा तकनीक रूसी मूल की है। ब्रहमोस मिसाइल से लेकर परमाणु सबमरीन तक—रूस की छाप हर जगह है। अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद करता है, तो यह केवल व्यापारिक निर्णय नहीं होगा, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी होगा— कि भारत अब पश्चिमी खेमे की ओर झुक गया है। रूस के लिए यह झटका विश्वास का होगा। क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद जब पूरी पश्चिमी दुनिया उससे मुंह मोड़ चुकी थी, तब भारत और चीन ही दो मित्र थे जिन्होंने उसके साथ व्यापार जारी रखा। अगर भारत भी मुंह मोड़ेगा, तो रूस को यह संकेत मिलेगा कि “भारत अब अमेरिकी दबाव से मुक्त नहीं।”
अमेरिका का रवैया: मित्रता के नाम पर नियंत्रण
अमेरिका का इतिहास बताता है — वह कभी भी “मित्रता” को निःस्वार्थ नहीं रखता। उसकी हर साझेदारी का एक एजेंडा होता है— आर्थिक लाभ, रणनीतिक पकड़ या शक्ति संतुलन का नियंत्रण। ट्रम्प की यह नीति भी उसी परंपरा की कड़ी है। वह चाहते हैं कि रूस की आर्थिक कमर टूटे। इसके लिए वे तीसरे देशों को भी अपने दबाव में लाने को तैयार हैं।भारत पर यह दबाव पहले भी दिखा था— जब उसने ईरान से तेल आयात बंद कराया था। अब वही कोशिश रूस के साथ हो रही है। ट्रम्प जानते हैं कि रूस से भारत का व्यापार जितना घटेगा, अमेरिकी तेल और हथियार बाज़ार उतने बढ़ेंगे। इसलिए उनका उद्देश्य स्पष्ट है— “भारत को रूस से दूर करो, और अमेरिका के करीब लाओ।” लेकिन सवाल है— क्या भारत अपनी आत्मनिर्भर नीति को छोड़कर यह सौदा करेगा?
ऊर्जा की अर्थव्यवस्था: विकल्प आसान नहीं
भारत चाहे तो अमेरिका से तेल खरीद सकता है, पर कीमत 12–15% अधिक पड़ेगी। मध्यपूर्व से आयात महंगा है, और भुगतान डॉलर में करना पड़ता है— जो रूपये पर अतिरिक्त दबाव डालता है। रूस से तेल खरीद में भारत “रुपया–रूबल व्यवस्था” का उपयोग करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार बचता है। साथ ही रूस लगातार स्थिर सप्लाई देता है— जो वैश्विक अस्थिर बाजार में एक भरोसा है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो महंगाई, राजकोषीय घाटा और ईंधन संकट—तीनों एक साथ सिर उठाएँगे। इसलिए यह केवल कूटनीति नहीं, जनजीवन का प्रश्न भी है।
मौन कूटनीति: मोदी का संतुलन
ट्रम्प के बयान पर मोदी का मौन रणनीतिक है। वह जानते हैं—इस समय कोई भी बयान या तो अमेरिका को नाराज़ करेगा, या रूस को। इसलिए उन्होंने चुना मौन का कूटनीतिक हथियार। यह वही रणनीति है जिसे भारतीय कूटनीति “संतुलित अस्पष्टता” कहती है— जहाँ आप न किसी को ठुकराते हैं, न किसी से झुकते हैं। मोदी का यही मौन आज भारत की विदेश नीति की रीढ़ है। पर सवाल यह है—क्या यह मौन अनिश्चितता को जन्म देगा क्योंकि ट्रम्प की राजनीति शब्दों से नहीं, दबाव और सौदों से चलती है। अगले कुछ महीनों में यह दिखेगा कि भारत यह संतुलन बनाए रख सकता है या नहीं।
अगर भारत झुका तो…
1. ऊर्जा संकट: सस्ता तेल बंद होते ही कीमतें बढ़ेंगी। पेट्रोल-डीज़ल महंगे होंगे, महंगाई का दबाव बढ़ेगा।
2. रूस से दूरी: सैन्य और तकनीकी सहयोग पर असर पड़ेगा। रूस चीन की ओर और झुकेगा।
3. अमेरिकी निर्भरता: भारत को पश्चिमी तेल पर निर्भर रहना पड़ेगा। डॉलर की मांग बढ़ेगी, मुद्रा पर दबाव बढ़ेगा।
4. भू-राजनीतिक असंतुलन: एशिया में भारत की “स्वतंत्र शक्ति” की छवि कमजोर होगी।
अगर भारत डटा रहा तो…
तो यह केवल नीति नहीं, संदेश भी होगा— कि भारत किसी का उपग्रह नहीं है। वह दुनिया से व्यापार अपने हित में करेगा, ना कि किसी की अनुमति से। यह कदम भारत को “ग्लोबल साउथ” का नैतिक नेता बना सकता है— वह आवाज़ जो कहती है कि हर राष्ट्र को अपने नागरिकों की भलाई के लिए निर्णय लेने का अधिकार है। अमेरिका असंतुष्ट रहेगा, पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ेगी। रूस भरोसे में रहेगा और विश्व भारत को “संतुलन की शक्ति” के रूप में देखेगा।
तेल अब युद्ध का नया चेहरा है
आज युद्ध गोलियों से नहीं, तेल के टैंकरों से लड़े जा रहे हैं। एक देश सप्लाई रोकता है, दूसरा प्रतिबंध लगाता है। ऊर्जा अब हथियार है, और भारत इस युद्ध का केन्द्र बिंदु बन चुका है। भारत की स्थिति अनोखी है— वह न अमेरिका का दुश्मन है, न रूस का विरोधी। वह दोनों से लाभ लेकर अपने नागरिकों का हित साधना चाहता है। पर यही “मध्य मार्ग” अब सबसे कठिन हो गया है।
जनता की दृष्टि से
आम भारतीय के लिए यह बहस भले अंतरराष्ट्रीय लगे, पर इसका असर उसकी जेब में सीधा उतरता है। तेल के दाम बढ़ेंगे तो ट्रांसपोर्ट, खाद्य सामग्री, बिजली—सब महंगे होंगे। महंगाई का बोझ बढ़ेगा और विकास की गति धीमी पड़ेगी। इसलिए यह प्रश्न केवल कूटनीति का नहीं, रोज़मर्रा की ज़िंदगी का भी है। जब पेट्रोल पंप पर कीमत बढ़ेगी, तो लोगों को याद नहीं रहेगा कि कारण ट्रम्प थे या मॉस्को।
भारत को अपने रास्ते पर रहना होगा
भारत को किसी एक खेमे की परिभाषा में बंधना नहीं चाहिए। हमारा हित है—शांति, सस्ता ऊर्जा स्रोत और स्थिर अर्थव्यवस्था। अमेरिका और रूस दोनों को यह समझना होगा कि भारत का निर्णय किसी के खिलाफ नहीं, अपने नागरिकों के पक्ष में है। मोदी सरकार के सामने यह समय है जब “मित्रता” से ज्यादा “स्वतंत्रता” की कीमत समझनी होगी। क्योंकि जो राष्ट्र अपने निर्णय दूसरों से करवाता है, वह आर्थिक रूप से कभी आत्मनिर्भर नहीं बन पाता।
अंत में
“भारत की ताकत उसकी नीति में है, न कि किसी की मंज़ूरी में। तेल तो बस बहाना है—सवाल है, क्या हम अपनी दिशा खुद तय करेंगे?”






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