ईरान अमेरिका संघर्ष और भारत पर आर्थिक प्रभाव
ईरान अमेरिका तनाव ने तेल कीमतों और वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ाई है। आयात निर्भर भारत में महंगाई चालू खाता और बाजार पर दबाव दिख सकता...

ऊर्जा बाजार में उथल पुथल
सीए अनिल के. जैन
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संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच जारी भू राजनीतिक तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। दीर्घकालिक संघर्ष सामान्यतः आर्थिक जोखिम बढ़ाता है पर भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर समग्र प्रभाव मिश्रित रहने की संभावना है। इसमें चुनौतियां भी होंगी और चुनिंदा अवसर भी।
भारत के लिए सबसे तात्कालिक चिंता कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ी है। भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग पचासी प्रतिशत आयात करता है। पश्चिम एशिया के आपूर्ति मार्गों या समुद्री परिवहन में किसी भी व्यवधान से वैश्विक तेल कीमतें बढ़ जाती हैं। ऊंची कीमतें भारत का आयात व्यय बढ़ाती हैं। रुपया कमजोर होता है। परिवहन उर्वरक उड्डयन और विनिर्माण क्षेत्रों में महंगाई का दबाव बनता है। बढ़ती महंगाई के कारण केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कमी टाल सकता है जिससे ऋण वृद्धि और उपभोग मांग धीमी होती है। इन कारकों से अल्पकाल में शेयर बाजार में अस्थिरता बढ़ती है।
सीमित संघर्ष से राहत की उम्मीद
फिर भी यदि संघर्ष सीमित रहता है और वैश्विक व्यापार पूरी तरह बाधित नहीं होता तो भारतीय अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्र लाभान्वित हो सकते हैं। भारतीय रिफाइनर भू राजनीतिक अवरोधों के दौरान विविध स्रोतों से रियायती कच्चा तेल खरीदने में लचीलापन दिखा चुके हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी जैसी बड़ी रिफाइनिंग कंपनियां सस्ता कच्चा तेल खरीद कर अंतरराष्ट्रीय दरों पर परिष्कृत उत्पाद निर्यात कर बेहतर मार्जिन प्राप्त कर सकती हैं। इससे विदेशी मुद्रा आय बढ़ सकती है और चालू खाते के संतुलन को सहारा मिल सकता है।
व्यापक आर्थिक दृष्टि से संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में अस्थिरता वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के विविधीकरण को तेज करती है। स्थिरता की खोज में बहुराष्ट्रीय कंपनियां राजनीतिक रूप से विश्वसनीय विनिर्माण स्थलों में निवेश बढ़ाती हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स औषधि रसायन और रक्षा विनिर्माण को प्रोत्साहित करने वाली भारत की नीतियां अतिरिक्त पूंजी प्रवाह आकर्षित कर सकती हैं। बढ़ती विनिर्माण गतिविधि समय के साथ रोजगार सृजन और निर्यात प्रतिस्पर्धा को मजबूत करती है।
युद्ध उपकरणों की मांग से मिल सकता है लाभ
रक्षा क्षेत्र को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। भू राजनीतिक तनाव सामान्यतः वैश्विक रक्षा व्यय बढ़ाता है। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसी भारतीय कंपनियां विमान घटक निगरानी प्रणालियां और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों की बढ़ती निर्यात मांग से लाभ उठा सकती हैं क्योंकि मित्र देश विविध आपूर्तिकर्ता तलाशते हैं।
शेयर बाजार के संदर्भ में निवेशक भावना भू राजनीतिक जोखिम पर तीव्र प्रतिक्रिया देती है। अनिश्चितता के समय विदेशी संस्थागत निवेशक उभरते बाजारों में निवेश घटाते हैं जिससे प्रमुख सूचकांकों में अस्थायी गिरावट आ सकती है। जिन क्षेत्रों पर अधिक प्रभाव पड़ता है उनमें उड्डयन पेंट टायर लॉजिस्टिक्स और उपभोक्ता वस्तु उद्योग शामिल हैं क्योंकि ईंधन और परिवहन लागत बढ़ने से लाभांश दबाव में आते हैं। विमानन कंपनियों को विशेष रूप से महंगे विमानन ईंधन और वायु क्षेत्र प्रतिबंधों के कारण लंबी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की चुनौती झेलनी पड़ती है।
इसके विपरीत ऊर्जा उत्पादक तेल अन्वेषण कंपनियां शिपिंग फर्म रक्षा निर्माता और कुछ सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम ऐसे दौर में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। बैंकिंग क्षेत्र प्रारंभ में सतर्क रह सकता है क्योंकि महंगाई जोखिम उधारी मांग को प्रभावित करता है पर यदि सरकारी व्यय या निर्यात वृद्धि मजबूत होती है तो बाद में ऋण विस्तार को समर्थन मिल सकता है।
अंततः यह संघर्ष भारत के लिए अल्पकालिक अस्थिरता के साथ मध्यम अवधि के चुनिंदा अवसर प्रस्तुत करता है। यदि तेल आपूर्ति मार्ग खुले रहते हैं और तनाव सीमित रहता है तो रियायती ऊर्जा खरीद विनिर्माण निवेश रक्षा निर्यात और रिफाइनिंग क्षमता के माध्यम से भारत आर्थिक दबाव के एक हिस्से की भरपाई कर सकता है। पर यदि युद्ध लंबा या व्यापक होता है और तेल आपूर्ति बाधित होती है तो नकारात्मक प्रभाव इन संभावित लाभों से अधिक होगा और विकास तथा वित्तीय बाजारों पर गंभीर दबाव पड़ेगा।





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