नया आतंक, नई चुनौती
दिल्ली का हालिया धमाका यह स्पष्ट कर देता है कि आतंकवाद अब बारूद का पारंपरिक खेल नहीं रहा। इसमें रसायन, डिजिटल ट्रिगर और पेशेवर दिमागों की भूमिका ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। कट्टर...

दिल्ली धमाका बताता है अब विज्ञान और तकनीक के सहारे नई दिशा ले रहा है आतंकवाद
मणिमाला शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- दिल्ली धमाका बताता है अब विज्ञान और तकनीक के सहारे नई दिशा ले रहा है आतंकवाद
- धमाका और उसका वैज्ञानिक आधार
- डॉक्टरों की भूमिका: भरोसेमंद पेशे से खतरनाक ट्रेन्ज़िशन
- स्किल्ड रैडिकलाइजेशन: सुरक्षा एजेंसियों की नई चुनौती
- भारत में पहले के संदिग्ध प्रकरण
- बदलती रणनीति: नया आतंकवाद, नया मॉडल
- सुरक्षा-सिस्टम की दरारें
- आगे का रास्ता: पुनरावृत्ति नहीं, पुनरसंरचना
- बदलती मानसिकता, बदलती रणनीति
दिल्ली का हालिया ब्लास्ट यह साफ़ कर देता है कि आतंकवाद अब केवल बारूद का खेल नहीं रहा, यह हमला रसायन, डिजिटल ट्रिगर और पेशेवर कुशलता का संगम था। शुरुआती जांच में रिमोट-ट्रिगरिंग, उन्नत रासायनिक मिश्रण और डॉक्टरों समेत तकनीकी विशेषज्ञों के संभावित भागीदारी के सुराग मिले हैं, जिससे खतरे की दिशा ही बदल गई है। यह हिंसा अब सीमाओं से नहीं, बल्कि हमारे शहरों, प्रतिष्ठित संस्थानों और डिजिटल गलियारों से उठ रही है। इतना बड़ा बदलाव खामोशी से आया है कि समाज का भरोसा ही संदेह के घेरे में आ गया है। यह मोड़ भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को गंभीर सवालों के घेरे में खड़ा करता है कि क्या हम आतंक के इस नए विज्ञान को सचमुच पहचानने और रोकने के लिए तैयार हैं?
धमाका और उसका वैज्ञानिक आधार
जांचकर्ताओं का अनुमान है कि इस विस्फोट में पारंपरिक आईईडी (Improvised Explosive Device) से अलग, एक रासायनिक-साइंटिफिक मिश्रण इस्तेमाल किया गया था। रसायन की बारीक संरचना और मिश्रण की जटिलता यह संकेत देती है कि इसे तैयार करने वाले को प्रयोगशाला या मेडिकल सेटअप का गहरा ज्ञान था। टाइमिंग और ट्रिगर सिस्टम डिजिटल या रिमोट तरीकों पर आधारित लगते हैं, जो ऑपरेटर को दूर से हमला संचालित करने का विकल्प देते हैं। विस्फोट के बाद फोरेंसिक विश्लेषण में मिले अवशेष यह दिखाते हैं कि हमलावर ने तकनीकी दक्षता के साथ विस्फोट को डिज़ाइन किया था, जिसमें इफेक्ट और फ्यूरिंग का पूरा ध्यान रखा गया था।
डॉक्टरों की भूमिका: भरोसेमंद पेशे से खतरनाक ट्रेन्ज़िशन
यह हमला एक सामाजिक और नैतिक चक्रव्यूह खोलता है कि कैसे जीवन बचाने वाला पेशेवर वर्ग हिंसा की योजना में एक उपकरण बन सकता है। प्रारंभिक जांच में डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों की भागीदारी पर गहरे सवाल उठे हैं, क्योंकि विस्फोटक सामग्री की प्रकृति को केवल रसायन-ज्ञान में प्रशिक्षित व्यक्ति ही समझ सकते हैं। यह प्रवृत्ति भारत के पहले के आतंकवादी मामलों की याद दिलाती है, जहां चिकित्सा और इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले युवाओं की भूमिका सामने आई थी। एजेंसियां चिंतित हैं कि आतंकी समूह अब ‘उच्च-स्किलेड’ प्रोफेशनल्स को सक्रिय रूप से भर्ती कर रहे हैं। वे न केवल तकनीक और ज्ञान लाते हैं, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना के भीतर आराम से रहकर स्लीपर सेल के रूप में सक्रिय रह सकते हैं।
स्किल्ड रैडिकलाइजेशन: सुरक्षा एजेंसियों की नई चुनौती
भारत की खुफिया एजेंसियों के लिए यह खतरा सिर्फ़ विचारधारा का नहीं है, बल्कि ज्ञान और कौशल का दुरुपयोग है, जिसे ‘स्किल्ड रैडिकलाइजेशन’ कहा जाता है। कट्टर विचारधारा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पेशेवरों तक पहुंचती है, और उनका कौशल (जैसे केमिकल हैंडलिंग) हिंसक योजनाओं में इस्तेमाल किया जाता है। ये लोग छोटे, लो प्रोफ़ाइल और तकनीकी रूप से सक्षम माइक्रो मॉड्यूल बनाते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती यह है:
– ऐसे लोग सामान्य नागरिक की तरह दिखते हैं, इसलिए प्रोफाइलिंग कठिन होती है।
– उनका पेशा और नेटवर्क उनकी पहचान छुपाने में मदद करते हैं।
– उनकी क्षमता और पहुंच आतंक को एक नए स्तर पर ले जाती है जिसे पुरानी इंटेलिजेंस पद्धतियां पकड़ नहीं पातीं।
भारत में पहले के संदिग्ध प्रकरण
इस धमाके से पहले भी भारत ने कुछ ऐसी घटनाओं की जांच की है जो इस ट्रेंड की ओर इशारा करती थीं, जैसे कि इंजीनियरिंग और मेडिकल छात्रों की गिरफ्तारी, जिन पर कट्टर विचारधारा के समर्थन का आरोप था। सुरक्षा रिपोर्टों में उल्लेख किया गया कि आतंकवादी नेटवर्क में शामिल कुछ व्यक्तियों ने लैब-ग्रेड रसायन उपलब्ध करने में मदद की। शैक्षणिक संस्थानों ने भी स्वीकार किया है कि कुछ छात्र लाइब्रेरी और लैब संसाधनों का ग़लत उपयोग कर रहे थे। ये उदाहरण दिखाते हैं कि स्किल्ड रैडिकलाइजेशन भारत में एक नए प्रकार की सेल के रूप में उभर रहा है, जिसे रोकने के लिए केवल पुलिसिंग पर्याप्त नहीं है।
बदलती रणनीति: नया आतंकवाद, नया मॉडल
आज का आतंकवाद बड़ा, स्पष्ट और स्थिर नेटवर्क नहीं है। अब माइक्रो सेल मॉडल अधिक आम हो गया है, जहां दो-तीन सदस्य ही ऑपरेशन चला सकते हैं। माध्यम के रूप में उच्च तकनीक का उपयोग, जैसे रिमोट ट्रिगर और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म, बढ़ चुका है। प्रशिक्षण अब भौतिक कैंपों के बजाय ऑनलाइन, विचार आधारित समूहों में हो रहा है। आतंकवादी संगठन अब विशेषज्ञ पेशेवरों की तलाश कर रहे हैं। यह रणनीतिक बदलाव भारत के सुरक्षा तंत्र को चुनौती देता है, क्योंकि पारंपरिक खुफिया मॉडल अब उतना प्रभावी नहीं रहा।
सुरक्षा-सिस्टम की दरारें
दिल्ली धमाके ने हमारे सुरक्षा तंत्र की बड़ी कमजोरियों को उजागर किया है:
– इंटेलिजेंस समन्वय: राज्य और केंद्र की एजेंसियां अभी भी डेटा साझा करने में असहयोग दिखाती हैं।
– लोकल थ्रेट असेसमेंट: छोटे शहरों में सुरक्षा कवरेज अपर्याप्त है।
– तकनीकी क्षमता: बहुत से फॉरेंसिक इकाइयां आधुनिक जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं हैं।
– पेशेवर निगरानी गेप: मेडिकल/टेक स्टूडेंट्स या कर्मचारियों के संदिग्ध नेटवर्क पर निगरानी सीमित है।
आगे का रास्ता: पुनरावृत्ति नहीं, पुनरसंरचना
इस खतरे का सामना करने के लिए हमें अधिक सक्रिय, सामूहिक और आधुनिक कदम उठाने होंगे। इसमें पेशेवर संस्थानों (मेडिकल, इंजीनियरिंग, टेक कॉलेज) में संदिग्ध गतिविधि की पहचान के लिए प्रणाली बनाना, एक इंटीग्रेटेड इंटेलिजेंस प्लेटफार्म की स्थापना करना, और फोरेंसिक संस्थाओं की रसायन-विश्लेषण क्षमता को अपग्रेड करना शामिल है। इसके अतिरिक्त, डिजिटल कट्टरता की पहचान और रोकथाम के लिए साइबर-सेल का विस्तार और सामुदायिक जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
बदलती मानसिकता, बदलती रणनीति
दिल्ली धमाके ने हमारे सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद अब सिर्फ अस्त्रों का खेल नहीं है। यह उन दिमागों का खेल है, जहां पेशेवर ज्ञान और कट्टर विचारधारा मिलकर हिंसा को एक नए विज्ञान में बदलते हैं। अगर हम इसे सिर्फ सुरक्षा एजेंटों की समस्या मानें और शिक्षित पेशेवरों की जिम्मेदारी को नजरअंदाज करें, तो भविष्य में और भी खतरनाक हमलों का रास्ता खुला रहेगा। हमें अब एक सुरक्षित भारत बनाने के लिए न सिर्फ हमलावरों का सामना करना होगा, बल्कि उन विचारों और क्षमताओं का भी, जो छुपकर हमला कर सकते हैं।






No Comment! Be the first one.