दबाव, भरोसा और भारतीय संतुलन
दिसंबर में व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति में भारत की उभरती भूमिका का महत्वपूर्ण संकेत है। अमेरिका के दबाव, यूरोप की ऊर्जा संकट और...

भारत में पुतिन : बदलती विश्व राजनीति का नया संकेत
संजीव पांडेय,
वरिष्ठ पत्रकार
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दिसंबर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आ रहे हैं। यह दौरा इसलिए खास है क्योंकि पूरी दुनिया, विशेषकर अमेरिका, इस मुलाक़ात पर अपनी निगाहें टिकाए हुए है। पुतिन ऐसे समय भारत पहुंच रहे हैं जब अमेरिकी दबाव के चलते भारत ने रूसी तेल आयात में कटौती शुरू की है, और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह दावा कर चुके हैं कि भारत जल्द ही रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर देगा। बावजूद इसके, रूस के सर्वोच्च नेता का भारत आना इस बात का संकेत है कि वैश्विक दबावों के बीच भी भारत रूस के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहता।
क्यों महत्वपूर्ण है पुतिन का यह दौरा? दरअसल युक्रेन युद्ध ने वैश्विक राजनीति की दिशा बदल दी है। अमेरिका लगातार भारत पर यह दबाव बनाता रहा है कि वह रूस से तेल और हथियारों की खरीद कम करे। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच पिछले दो वर्षों में व्यापार रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया। 2023–24 में भारत–रूस द्विपक्षीय व्यापार 68.7 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारतीय निर्यात मात्र 4.88 अरब डॉलर था, जबकि अधिकांश हिस्सा रूस से सस्ते तेल के आयात का था। भारत के लिए यह यात्रा इसलिए अहम है क्योंकि पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच होने वाली वार्ता केवल औपचारिकता नहीं होगी। दोनों नेता रक्षा सहयोग, ऊर्जा साझेदारी, भुगतान प्रणाली, व्यापार संतुलन, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझा चुनौतियों पर गहन बातचीत कर सकते हैं।
अमेरिकी दबाव में इस समय फंसे भारत की रणनीतिक कदम महत्वपूर्ण होंगे। अमेरिका भारत के रूसी हथियार खरीद और तेल आयात से नाराज है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय निर्यात पर 50% टैरिफ लगाकर दबाव बढ़ाया, जिससे भारत के टेक्सटाइल्स और इंजीनियरिंग सेक्टर को भारी नुकसान हुआ। बताया जाता है कि इससे भारत का अमेरिकी बाजार में निर्यात 9–10% तक घट गया और हजारों लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ीं। तुलना करें तो चीन रूस से तेल खरीदने को लेकर कभी अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुका। चीन आज भी रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार है और उसने यूक्रेन युद्ध के बाद भी रूस से व्यापार कम नहीं किया। दूसरी ओर भारत को अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों और टैरिफ का सीधा असर झेलना पड़ा।
भारत-रूस संबंध से अमेरिका खुश नहीं
भारत–रूस संबंध भारत–अमेरिका व्यापार डील में एक महत्वपूर्ण बाधा बनकर उभरा हैं। वाशिंगटन चाहता है कि भारत रूस से तेल और हथियारों की निर्भरता कम करे, ताकि अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को और गहरा किया जा सके। लेकिन भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा क्षमता अभी भी भारत को मजबूर करती है कि रूस से संबंधों को मजबूत रखे। दूसरी तरफ अमेरिका भारत से अपेक्षाएं तो रखता है, परन्तु भारत की अनिवार्य जरूरतों की तरफ उसका ध्यान नहीं है। परिणामस्वरूप, अमेरिकी प्रशासन समय–समय पर उच्च टैरिफ, व्यापारिक दबाव और कूटनीतिक संकेतों के जरिए भारत पर रूस से दूरी बनाने का संदेश दे रहा है। इसलिए भारत–अमेरिका व्यापार समझौतों की रफ्तार कई बार भारत–रूस की रणनीतिक साझेदारी के कारण धीमी हो रही है।
तमाम उतार चढ़ाव के बीच भारत और रूस के बीच रक्षा संबंध पिछले पचास सालों से सफलतापूर्वक अच्छे बने हुए हैं। रूस–भारत रक्षा संबंध भविष्य के लिए भी निर्णायक है, क्योंकि भारत की रक्षा जरूरतें बढ़ेगी। भारत और रूस का रक्षा सहयोग दशकों पुराना है। भारत का 60–70% सैन्य हार्डवेयर रूस या सोवियत मूल के हैं, जिसमें टैंक, मिसाइलें, लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और स्पेयर पार्ट्स शामिल हैं। ऐसे में रूस से दूरी तत्काल संभव नहीं है। दिसंबर की बैठक में संभावना है कि पुतिन–मोदी बैठक में रक्षा मुद्दों पर बातचीत होगी। 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पर सहमति बन सकती है। चीन–पाकिस्तान संयुक्त रूप से जेएफ–17 और अन्य प्लेटफॉर्म विकसित कर रहे हैं। भारत को अपने वायुसेना की आधुनिक जरूरतें पूरी करने के लिए रूस के साथ संयुक्त विकास जरूरी है। रूस ने रक्षा उत्पादन और स्पेयर पार्ट्स के विकास के लिए ‘मेक इन इंडिया’ के तहत कई महत्वपूर्ण तकनीकें देने का संकेत पहले भी दिया है। ब्रहमोस, टी-90 टैंक, और सुखोई–30 इसका उदाहरण हैं। रूस भारत के साथ भविष्य में लॉजिस्टिक्स और साझा ट्रैनिंग, आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग, नौसैनिक अभ्यास और हिंद महासागर में सुरक्षा साझेदारी को तैयार है औऱ पुतिन के दौरे में ये मुद्दे शामिल हो सकते हैं।
एक भरोसेमंद विकल्प है रूस
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रूस भारत की ऊर्जा सुरक्षा का आधार है। भारत अपनी 80% से अधिक ऊर्जा जरूरतें आयात करता है। रूस से सस्ते तेल ने भारत का अरबों डॉलर का आयात बिल कम किया। रूस ने भारत को तीन बड़े लाभ दिए हैं। वैश्विक बाजार की तुलना में 20–30% सस्ता तेल दिए, लंबी अवधि के क्रेडिट विकल्प दिए और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था का इंतजाम किया, जिससे डॉलर प्रतिबंधों का असर कम हुआ। इसी से भारत को राहत मिली, क्योंकि मध्यपूर्व में युद्ध, ईरान–सऊदी तनाव और इज़रायल–गाज़ा संकट ने वैश्विक तेल सप्लाई को अस्थिर कर दिया है। रूस इस अनिश्चितता के बीच भारत के लिए एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है।
दरअसल यूरोप की मुश्किलें और अमेरिकी हित आपस में टकरा रहे हैं। रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के दुष्प्रभाव यूरोप ने सबसे ज्यादा झेले। यूरोप का 40–45% गैस रूस से आता था। प्रतिबंधों से यूरोप में तेल–गैस महंगे हो गए, उद्योगों की लागत बढ़ी और महंगाई चरम पर पहुंची। वहीं अमेरिका की जनता पर इसका सीधा असर कम पड़ा, लेकिन अमेरिकी तेल कंपनियों के हित प्रभावित हुए, क्योंकि उनके रूस की कंपनी रोसनेफ्ट में बड़े निवेश थे। यहीं से अमेरिका–रूस–भारत त्रिकोणीय तनाव भी पैदा हुआ। इधर रूस के महत्वपूर्ण सहयोगी चीन और भारत के बीच संबंध अच्छे नहीं है। इसलिए यह देखने वाली बात है कि भारत–रूस–चीन त्रिकोण क्या नई भू–राजनीति विकसित करेगी, क्योंकि चीन से भारत के संबंध अभी अच्छे नहीं हुए हैं। भारत और चीन दोनों रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार हैं, लेकिन दोनों की नीतियों में बड़ा अंतर है। चीन ने रूस से दूरी नहीं बनाई। चीन ने रूस से व्यापार बढ़ाया। लेकिन भारत अमेरिकी दबाव में तेल खरीद कम करने लगा। भारत रूस का सुरक्षा साझेदार है। भारत के कम्युनिस्ट ब्लॉक में न रहने के बावजूद भारत को रूस ने मदद की। दूसरी तरफ चीन और रूस के बीच संबंध उतार चढ़ाव वाले रहे। माओ के समय रूस और चीन के संबंध बहुत अच्छे नहीं थे। लेकिन बाद में चीन-रूस संबंध अच्छे हो गए। चीन रूस का आर्थिक साझेदार बन गया। इस आर्थिक साझेदारी पर भारत ने गहनता से विचार नहीं किया। चीन और रूस के बीच आर्थिक संतुलन भारत के लिए चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि भारत को एक साथ सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति तीनों संभालनी हैं।
व्यापार संतुलन सुधारने के नए रास्ते खुलना संभव
पुतिन के भारत दौरे से कई संभावित लाभ भारत को मिल सकते हैं। व्यापार संतुलन सुधारने के नए रास्ते खुल सकते हैं। भारत के लिए फार्मा, आईटी, कृषि, हीरा उद्योग, और ऑटो–पुर्जों में भारत के लिए बड़े अवसर खुल सकते हैं। ऊर्जा कूटनीति में नई समझौते हो सकते हैं। एलएनजी, कोयला, आर्कटिक ऊर्जा परियोजनाओं में भारत नई हिस्सेदारी पर वार्ता कर सकता है। रक्षा सहयोग का उन्नत संस्करण पर विचार हो सकता है। नए हथियार प्लेटफॉर्म, स्पेयर पार्ट्स लोकलाइजेशन और संयुक्त उत्पादन योजनाओं का ऐलान संभव है। भुगतान प्रणाली पर नई सहमति बन सकती है। डॉलर–निर्भरता कम करने के लिए रुपये–रूबल व्यापार या डिजिटल भुगतान समाधान पर बात आगे बढ़ सकती है। मीडिया–सहयोग भी बढ़ सकता है। रूस का चैनल आरटी का भारत के लिए नया चैनल लॉन्च करने वाला है और इससे दोनों देशों की कोमल कूटनीति को मजबूत करेगा।
पुतिन की यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण
पुतिन की भारत यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों की औपचारिकता नहीं है। वहीं एक सच्चाई यह है कि भारत-रूस गहन संबंध भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में एक बड़ी बाधा है। यह वैश्विक ताकतों के बीच भारत के बढ़ते महत्व, ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक साझेदारी और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका का संकेत है। अमेरिकी दबाव, चीन की बढ़ती उपस्थिति, यूरोप की ऊर्जा चुनौतियां और मध्यपूर्व की अस्थिरता, इन सभी के बीच भारत को अपने हितों की रक्षा करते हुए संतुलित विदेश नीति अपनानी है। पुतिन का यह दौरा उसी संतुलन को साधने का भारत का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यह यात्रा आने वाले वर्षों में भारत–रूस संबंधों को नई दिशा दे सकती है और भारत की ऊर्जा एवं सुरक्षा रणनीति में निर्णायक मोड़ आ सकती है।






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