सब्र की परीक्षा लेना अनुचित
भारत के भरोसेमंद पड़ोसी देश नेपाल में जेन-जी के हिंसक आंदोलन के बाद जब सरकार का तख्तापलट हुआ तो लोकतांत्रिक देशों में अलर्ट का सायरन बज उठा। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, राजनीति में भाई-भतीजावाद...

सोशल मीडिया की ताकत : नेपाल के हिंसक विद्रोह ने दुनिया में बजाया सायरन
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
Table Of Content
- सोशल मीडिया की ताकत : नेपाल के हिंसक विद्रोह ने दुनिया में बजाया सायरन
- लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय असंतुलन से जूझ रहा नेपाल
- भ्रष्टाचार-बेरोजगारी से फूटा युवाओं का गुस्सा
- भारत और चीन के बीच फंसा नेपाल
- पश्चिमी देशों की नेपाल में बढ़ती रूचि
- भारत को भी सावधान रहने की जरूरत
- पड़ोसियों की बुरी हालात से सीख लेनी होगी
भारत के भरोसेमंद पड़ोसी देश नेपाल में जेन-जी के हिंसक आंदोलन के बाद जब सरकार का तख्तापलट हुआ तो लोकतांत्रिक देशों में अलर्ट का सायरन बज उठा। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, राजनीति में भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) जैसे मुद्दों के साथ सरकार के खिलाफ असंतोष की भावना का भड़कना बड़े कारण रहे। पहले से गुस्से को दबाकर बैठे वहां के युवाओं के सब्र का बांध केपी ओली शर्मा सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाकर तोड़ दिया। युवाओं के आंदोलन के कुछ ही दिनों के भीतर ओली सरकार की ताकत को ढहाकर उनको सत्ता से बाहर कर दिया। नेपाल में सरकार के खिलाफ विद्रोह इतनी तेजी से असर दिखाएगा, इसकी कल्पना तक नहीं की होगी। सरकार और उसका इंटेलीजेंस नेटवर्क ये भांप तक नहीं पाया कि देश के युवाओं के दिलों में कितना आक्रोश दबा है, जबकि ओली सरकार के ऊपर लंबे समय से नेपोटिज्म के आरोप लग रहे थे। कई नेताओं और उनके परिवारों की शान-ओ-शौकत लगातार वहां के सोशल मीडिया पर उजागर हो रही थी। बकायदा नेपो बेबी नामक सोशल कैम्पेन भी नेपाल में ट्रेंड हुआ, इसके बावजूद सरकार युवाओं की नब्ज को पकड़ नहीं पाई। जनरेशन-जी के इस अभियान की तुलना भले बांग्लादेश, श्रीलंका, हांगकांग, थाइलैण्ड या सीरिया के आंदोलनों से की गई, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह आंदोलन बाहरी प्रभाव से कम प्रेरित और आंतरिक नेपाली नेताओं की ओर से छेड़ा गया आंदोलन ज्यादा था। सरकार का गिरना जनता की भारी हताशा की क्रांति था, जो अवसरों की कमी और पक्षपात वाली राजनीति से उपजा था।
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सोशल मीडिया ने इस विद्रोह को भड़काने का काम किया। प्रतिबंध लगने से काफी पहले युवा सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा सोशल प्लेटफॉर्म्स पर निकाल रहे थे। देखा जाए तो उन्होंने युवाओं को गंभीरता से ही नहीं लिया। उनको लगा कि इनकी अभिव्यक्ति की आजादी के कोई मायने नहीं हैं। लाखों युवाओं के मन में दबी इस चिंगारी को आखिर सोशल मीडिया पर लगाए गए बैन ने इतनी तेज हवा दी की सरकार का सिंहासन डोल गया। केवल दो दिन में प्रधानमंत्री और उनके बड़े मंत्रियों को इस्तीफा देकर जान बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों को तलाशना पड़ा। युवाओं के क्रोध का भाजक पूर्व राष्ट्रध्यक्षों और उनके परिवार को बनना पड़ा। नेपाल के इस विद्रोह ने दुनिया को भी चौंका दिया और बता दिया कि हवा का रुख बदलने में देर नहीं लगी।
लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय असंतुलन से जूझ रहा नेपाल
भारत और चीन के बीच बसा करीब तीन करोड़ की आबादी वाला नेपाल कई सालों से राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। साल 2015 में नया संविधान लागू होने के बाद से वहां आठ सरकारें बन चुकी हैं। सरकारें ज्यादातर सीपीएन-यूएमएल के ओली, नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा और सीपीएन (माओवादी केंद्र) के पुष्प कमल दहल के इर्द-गिर्द ही घूमती रहीं। नेपाल की राजनीति का बड़ा हिस्सा वामपंथी और राजतंत्र का समर्थन करने वाले दावा करते रहे हैं कि भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसी विदेशी ताकतें नेपाल के राजनीतिक बदलावों के पीछे हैं। हाल में चीन भी विदेशी ताकतों की इस सूची में शामिल हो गया और उसकी पारंपरिक शांत कूटनीति की छवि कमजोर पड़ गई। हालांकि नेपाल हमेशा से गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को अपनाता आया है। यह सिद्धांत राजा पृथ्वीनारायण शाह ने 1768 में आधुनिक नेपाल को एकजुट करने के लिए अपनाया था। इस नीति का सीधा-सा सिद्धांत है कि सबसे दोस्ती और दुश्मनी किसी से नहीं। देश के विकास कार्यों में सभी का कूटनीतिक सहयोग, खासतौर पर भारत और चीन का सहयोग सुनिश्चित करना इसकी मंशा है। अमेरिका के व्यापक वैश्विक प्रभाव के कारण नेपाल उसको अपना तीसरा पड़ोसी मानता आया है। भारत, चीन और अमेरिका तीनों की नेपाल में गहरी दिलचस्पी रहती है और वे देश की राजनीति में अचानक आने वाले बदलावों को लेकर चिंतित रहते हैं। राजनीतिक रूप से भी नेपाल की स्थिति जटिल है। जुलाई 2024 में केपी ओली सरकार बनने के बाद देश का झुकाव चीन की ओर बढ़ा, जबकि भारत के साथ सीमा विवाद की वजह से आर्थिक दबाव बढ़ा। इस रूख को लेकर जनता में गहरी नाराजगी बढ़ी। भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता के चलते नेपाल में लोकतंत्र खत्म कर राजशाही वापस लाने की मांग भी तेज हुई। पिछले पांच साल में तीन बार सरकार बदली जा चुकी है और हालिया हिंसा के बाद राजनीतिक संकट और बढ़ गया था।
भ्रष्टाचार-बेरोजगारी से फूटा युवाओं का गुस्सा
भ्रष्टाचार के ढेर सारे मामले युवाओं के गुस्से का बड़ा कारण बने। पिछले चार सालों में नेपाल में कई बड़े घोटाले सामने आए। इनमें गिरि बंधु भूमि स्वैप घोटाला (54,600 करोड़), ओरिएंटल कॉरपोरेटिव घोटाला (13,600 करोड़) और 2024 का कॉरपोरेटिव घोटाला (69,600 करोड़) जैसे संगीन मामले शामिल हैं। इन बड़े घोटालों ने आम जनता खासकर युवाओं का विश्वास सरकार से पूरी तरह तोड़ दिया। इसके साथ ही नेपाल में बेरोजगारी की समस्या भी विकराल बनी हुई है। वर्तमान में 10.71 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं, जबकि महंगाई दर 5.2 प्रतिशत तक पहुंच गई। कुल संपत्ति का 56 प्रतिशत हिस्सा केवल 20 प्रतिशत लोगों के पास है, जिनमें कई राजनेता शामिल हैं। 2022 में भारत के एक और पड़ोसी मुल्क श्रीलंका को इस उथल-पुथल का सामना करना पड़ा था। वहां खाने, ईंधन और बिजली की कमी हो गई थी। महंगाई बहुत बढ़ गई थी। लोगों का सब्र टूट गया और वे सड़कों पर उतर आए। राजपक्षे परिवार को सत्ता छोड़नी पड़ी, वहां भी भ्रष्टाचार और अवसरों की कमी मुख्य मुद्दे थे। इसके बाद साल 2024 में बांग्लादेश में भी कुछ ऐसा ही हुआ। सरकार ने 1971 की लड़ाई में मदद करने वाले लोगों के बच्चों के लिए 30 प्रतिशत कोटा फिर से शुरू कर दिया। लोगों को लगा कि यह गलत है, क्योंकि इन परिवारों के लोग पहले से अमीर थे। इससे आम लोगों के लिए नौकरी के अवसर कम हो गए। विरोध प्रदर्शन हुए और शेख हसीना की सरकार गिर गई, उन्हें देश भारत में शरण लेनी पड़ी।
भारत और चीन के बीच फंसा नेपाल
नेपाल और भारत के बीच गहरे सांस्कृतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध रहे हैं। भारत का नेपाल के साथ 1751 किलोमीटर लंबा खुला बॉर्डर भी है। देश के पांच राज्यों उत्तरप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और सिक्किम की सीमाएं नेपाल से मिलती हैं। इन राज्यों में नेपाल के साथ कई छोटे-बड़े बॉर्डर प्वाइंट्स हैं, जिनसे लोग रोज आना-जाना करते हैं। भौगोलिक और सांस्कृतिक नजदीकी की वजह से नेपाल में अस्थिरता का असर सबसे पहले भारत पर पड़ता है। इधर, नेपाल का उत्तरी बॉर्डर चीन के स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत से लगता है और चीन लगातार इस बात पर जोर देता आया कि नेपाल वन चाइना पॉलिसी का पालन करे और अपने यहां किसी तरह की चीन-विरोधी गतिविधियों को रोकें। नेपाल भी हमेशा से इस सिद्धांत की पुष्टि करता आया और तिब्बत, हांगकांग, मकाओ और ताइवान को चीन का अभिन्न हिस्सा मानता रहा।
पश्चिमी देशों की नेपाल में बढ़ती रूचि
नेपाल साल 2017 में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से जुड़ा। इसका उद्देश्य रेल, सड़क, डिजिटल और ऊर्जा नेटवर्क के जरिए दोनों देशों के बीच हिमालय पार करने वाले बहुआयामी संपर्क बनाना था। इसके पीछे नेपाल की विदेश नीति का मकसद यही रहा कि वह तीनों क्षेत्रीय और वैश्विक ताकतों के साथ संतुलन बनाए रख सके। चीन के लिए स्थिर और शांत नेपाल के दो फायदे हैं। पहला तिब्बत की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दूसरा छोटे देशों को चीन की वैश्विक नीतियों के साथ खड़ा करना। इधर, नेपाल अपने नीतिगत सिद्धांत के तहत अमेरिका और उसके सहयोगी देशों, यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी रिश्ते मजबूत रखना चाहता है। ये देश नेपाल की नीतियों को सरकारी कार्यक्रमों और सिविल सोसायटी फंडिंग के जरिए समर्थन देते हैं। हाल में अमेरिका ने नेपाल को 530 मिलियन डॉलर की मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन ग्रांट दी ताकि देश की ऊर्जा व्यवस्था और सड़क ढांचे को बेहतर बनाया जा सके।
भारत को भी सावधान रहने की जरूरत
नेपाल के आंदोलन से भारत समेत बाकी देशों को सीखने के लिए यह है कि देश की जनता की उम्मीदों को मत कुचलो। उनके मौलिक अधिकारों का हनन मत करो। वरना नेपाल जैसा आंदोलन कभी भी भड़क सकता है। हालांकि आंदोलनकारियों पर जिस तरह की हिंसा हुई और बाद में प्रदर्शनकारियों ने जिस तरह की हिंसा की, उसका कोई समर्थन नहीं कर सकता, लेकिन यह आंदोलन सबके लिए बड़ा सबक है। हालांकि भारत में सत्ताधारी और उनके समर्थकों को लग रहा है कि नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देश उनकी तुलना में अपेक्षाकृत छोटे देश हैं। वहां आंदोलन खड़ा कर सरकारें बदली जा सकती हैं, लेकिन भारत में नहीं। लेकिन ऐसा सोचने वाले बड़ी भूल कर रहे हैं। इसी देश ने अंग्रेजों जैसी ताकतवर शक्ति को इस देश से भगाया। ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इमरजेंसी हटाने पर विवश किया। आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में अपने-अपने हकों के लिए आंदोलन हो रहे हैं। लेह-लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने को लेकर हाल ही बड़ा बवाल हुआ है। इसमें चार युवाओं की मौत हो गई तो कई गंभीर घायल हो गए। इस हिंसक आंदोलन की अगुवाई भी युवाओं ने की। ये अलग बात है कि इसके पीछे कोई राजनीतिक षड्यंत्र था या देश को अस्थिर करने की साजिश। पर ये बात साफ है कि युवाओं को आगे करकर आग भड़काने का काम तो किया ही जा रहा है। इसके अलावा बिहार में चुनावी सर्वे को लेकर, महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन को लेकर, असम में आंदोलन चल रहा है। मणिपुर के हालात छुपे नहीं है। दक्षिण के राज्यों में जनगणना को लेकर अलग तरह की बेचैनी है। इसलिए भारतीय सत्ता पक्ष को नेपाल के आंदोलन से सबक लेने की जरूरत है। लोगों के अधिकारों का सम्मान करने की जरूरत है। अभी हालत यह है कि आप अपनी मांगें सरकार के सामने रखते हैं तो आपकी उपेक्षा कर दी जाती है। सवाल पूछते हैं तो देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। शांतिपूर्ण ढंग से धरना प्रदर्शन करना चाहते हैं तो इजाजत नहीं दी जाती। दी जाती है तो ऐसी जगह जहां लोगों का पहुंचना ही मुश्किल होता है। प्रधानमंत्री का कहीं दौरा होता है तो पूरे शहर को बंधक बना लिया जाता है और विपक्षी नेताओं को हाउस अरेस्ट कर लिया जाता है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अपने चुनावी क्षेत्र वाराणसी में पहुंचे तो कांग्रेस के सारे नेताओं को हाउस अरेस्ट कर लिया गया, ताकि वे उनका विरोध न कर सकें। आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह कश्मीर में प्रेस कांफ्रेंस करना चाहते थे, उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी गई। उन्हें हाउस अरेस्ट कर दिया गया। सरकार के खिलाफ अगर कोई पत्रकार या आम आदमी सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखता है तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे जेल के सीखचों के भीतर कर दिया जाता है। भारत सरकार को विपक्ष और आम लोगों को भी उनकी बात कहने का अवसर देना चाहिए, ताकि उनके मन का गुबार निकलता रहे। कुछ ऐसा न हो कि सब्र का बांध टूट जाए और लद्दाख के बाद कोई और आंदोलन खड़ा हो जाए।
पड़ोसियों की बुरी हालात से सीख लेनी होगी
भारत के तीन मजबूत साथी और पड़ोसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश या नेपाल में हुए हिंसक आंदोलना में एक बात समान दिखी। यानी तीनों पड़ोसियों के यहां बवाल तभी चरम पर आया, जब वहां के दैनिक जीवन को छूने या बिगाड़ने का दुस्साहस सरकारों की ओर से किया गया। लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के प्रभावित होते ही विरोध की आग भड़क गई। भारत की बड़ी अर्थव्यवस्था है और लोगों की जीवनशैली पड़ोसी और दूसरे देशों से बेहतर है। हमारे पास अपनी बात कहने के कई तरीके हैं, जैसे चुनाव, सोशल मीडिया और अदालतें। खाने-पीने की चीजों की कमी होने की आशंकाएं भी कम हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर दिक्कतें हो सकती हैं। अगर नॉर्थ-ईस्ट के लोगों को लगेगा कि उनकी कोई परवाह नहीं कर रहा है तो वहां भी विरोध हो सकता है। जैसा लद्दाख में अचानक घटा। अहिंसक आंदोलन हिंसक हो गया। ऐसे में सरकार को सबसे ज्यादा देश को आर्थिक मोर्चे पर सशक्त रखना होगा। भारत की जीडीपी ग्रोथ 6 प्रतिशत से ऊपर रहनी चाहिए, ताकि लोगों को ज्यादा मौके मिलें। इसके साथ ही विकास के साथ ये भी समझना आवश्यक है कि आम लोगों की आय भी बढ़ रही है या नहीं। समानता के अवसर आम आदमी को मजबूत करने का करेंगे। इसके अलावा खाने-पीने की चीजें और इंटरनेट हमेशा उपलब्ध रहने चाहिए। अस्थिर पड़ोसी भारत के लिए अच्छे नहीं हैं। क्षेत्र की सबसे बड़ी शक्ति होने के नाते भारत को पड़ोसी मुल्कों में स्थिर रहने का प्रयास करना चाहिए। हमें अपने पड़ोसियों की मदद करनी चाहिए और उनसे सीखना चाहिए, ताकि भारत में कभी ऐसी स्थिति न आए।






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