समझ आ गया महाशक्ति का महाखेल
हाल में पहलगाम आंतकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच भड़के तनाव के बाद भी अमेरिका ने यही चाल खेली थी। उसने पाकिस्तान को भरोसे में लेकर दुनियाभर के आश्वासन उसकी झोली में डाल दिए। पाकिस्तान को भी...

ईरान-इजरायल युद्ध में कौन जीता : दुनिया के एक और संघर्ष में अमेरिका की शातिर कूटनीति
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार
ईरान और इस्रायल के बीच उपजा तनाव जब अमेरिका के दखल से संघर्ष विराम के हालात तक पहुंचा तो एक चर्चित शायर का शेर ‘दुनिया में गूंजता सुनाई दिया- न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम, न इधर के रहे न उधर के हम।’ खरबों रुपए जंग में बहाने के बाद परिणाम शांति और सौहार्द से ही निकलना था तो 12 दिनों तक क्यों एक-दूसरे के खून का प्यासा बनकर ताकतवर मिसाइल, गोले और हथियार बरसाते रहे? इस सवाल का जवाब तो ईरान और इस्रायल को उनकी अवाम के समक्ष आगे-पीछे देना ही होगा। दो बिल्लियों के इस युद्ध में बंदर बनकर अमेरिका फिर बाजी मार ले गया। बिना किसी परवाह और डर के दुनिया की इस महाशक्ति ने ईरान के परमाणु स्थलों पर भारी-भरकम बमों से हमला किया। साबित कर दिया कि वह कहीं भी कुछ भी कर सकता है और कोई उसे रोकने-टोकने की हिमाकत नहीं कर सकता।
ईरान ने भी अमेरिका की कार्रवाई पर पलटवार करने के बजाय उसके कहने पर सीजफायर कर लिया। इसके बाद तीसरे विश्व युद्ध की भयावह आशंका उपजने से पहले फिर एक बार थम गई। भारत और पाकिस्तान के बीच सुलह कराने का श्रेय लेने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान-इजरायल के बीच भी संघर्ष विराम करने का नायक बनकर उभर गए। इजरायल के पक्ष में खड़ा होने के बाद जैसे ही युद्ध थमा, ईरान को 2.5 लाख करोड़ रुपए देने की पेशकश कर दी। इतना ही नहीं अमेरिका ने तो यहां तक मन बना लिया कि वह ईरान के सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम में भारी इन्वेस्टमेंट करेगा और उस पर बरसों से लगाए गए ज्यादातर प्रतिबंधों को भी हटा देगा। इसे क्या कहेंगे? गाल पर कसकर तमाचा मार दो, फिर उसे सहला कर दवा देने का भरोसा जता दो।
हाल में पहलगाम आंतकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच भड़के तनाव के बाद भी अमेरिका ने यही चाल खेली थी। उसने पाकिस्तान को भरोसे में लेकर दुनियाभर के आश्वासन उसकी झोली में डाल दिए। पाकिस्तान को भी लगा कि अमेरिका की गोद में बैठकर वह सुरक्षित रहेगा और भारत उस पर आगे काई कार्रवाई नहीं करेगा। अमेरिका ने भारत के साथ जो चालें चलीं, कमोबेश वैसा ही इस्रायल के साथ किया। ट्रम्प ने अपने दोनों अच्छे दोस्तों भारत और इस्रायल के साथ खड़े होने का ड्रामा भी रच दिया और अपना कूटनीतिक दांव भी खेल दिया।
इस्रायल को इस संघर्ष से क्या मिला?
इस्रायल लंबे समय से कहता रहा कि ईरान उसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है। लेकिन उसने पहले कभी ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं किया। 13 जून को उसने नतांज और इस्फहान परमाणु क्षेत्रों की सतह पर बमबारी कर ईरान के सब्र को तोड़ दिया। जवाब में ईरान ने इस्रायल पर जवाबी कार्रवाई की। इस्रायल ने पहले भी सीरिया और इराक में परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला किया था, लेकिन उसने यह साबित कर दिया कि वह बहुत दूर जटिल मिशन को अंजाम दे सकता है। इस दौरान इस्रायल ने अंतरराष्ट्रीय आरोपों का सामना किया कि उसका मिशन कानूनी नहीं था। हालांकि इस्रायल ने दावा किया कि यह पूर्वानुमानित आत्मरक्षा थी, लेकिन हर कोई इस बात से सहमत नहीं थे कि ईरान परमाणु बम विकसित कर रहा है। या इस्रायल के खिलाफ उसके इस्तेमाल की योजना बना रहा है। लेकिन इस संघर्ष के दौरान इस्रायल ने साबित कर दिया कि वह अमेरिका को सीमित मिडिल ईस्ट में आक्रमण में शामिल होने के लिए मना सकता है। साल 1967 और 1973 में हुए पिछले युद्धों में जब इस्रायल पर हमला हुआ था तो अमेरिका ने उसे सहायता प्रदान की थी, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में भागीदारी के साथ कभी नहीं उतरा था।
ईरान परमाणु कार्यक्रम की रक्षा में कितना कामयाब?
इस संघर्ष के दौरान इस्रायल ने ईरान के जमीनी लक्ष्यों को काफी नुकसान पहुंचाया। वहीं अमेरिका ने दावा किया कि उसने ईरान के भूमिगत परमाणु ठिकानों को नष्ट कर दिया। सेटेलाइट से मिली तस्वीरों में भी सामने आया कि अमेरिकन मिसाइलें तय लक्ष्यों पर गिरीं, लेकिन इसकी पुष्टि के कोई सबूत सामने नहीं आए कि परमाणु ठिकाने नष्ट हुए या नहीं। ये सच तो तभी सामने आएगा, जब मौके का निरीक्षण और परीक्षण होगा। हालांकि युद्ध ने ईरान की ताकत को भी दुनिया के सामने लाने काम किया। न तो उसने इस्रायल की कोई बात मानी और न ही अमेरिका के किसी दबाव में आया। इस्रायल की लगातार बमबारी के बावजूद इस्लामिक रिपब्लिक ने जवाबी हमले जारी रखे, जिससे इस्रायल को भारी नुकसान हुआ। इसके अलावा अमेरिका के अल उदीद एयर बेस पर हमले के जरिए ईरान ने दिखा दिया कि वह जवाब देने में सक्षम है।
सीजफायर कराकर अमेरिका को क्या मिला?
ईरान- इस्रायल संघर्ष के बीच अमेरिका के बी-2 बॉम्बर विमानों ने ईरान में तीन हमले किए। इसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि यह हमला बहुत सफल रहा और इसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। लेकिन पेंटागन के शुरुआती आकलन और अन्य विशेषज्ञों ने साफ कहा कि तीनों परमाणु स्थलों को हुआ नुकसान उतना बड़ा नहीं था, जितना दावा किया गया। ट्रम्प भले ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को खत्म करने में सफल नहीं हुए हों, लेकिन वे कम से कम कुछ हद तक शांति दूत की भूमिका निभाने में सफल दिखे। दो महीनों में एशिया और मिडिल ईस्ट के दो बड़े संघर्षों में शांतिदूत की भूमिका निभाने वाले ट्रम्प को पाकिस्तान के बाद खुद के देश से भी मिली-जुली सराहना मिली। अमेरिकी हाउस के प्रतिनिधि बडी कार्टर ने ट्रम्प को इस्रायल और ईरान के बीच युद्ध विराम कराने में उनकी असाधारण और ऐतिहासिक भूमिका के लिए वर्ष 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए बकायदा नामित भी कर दिया।
भारत ने पहले ही भांप लिया था हवा का रूख
भारत ने वर्ष 2025 में रोजाना 51 लाख बैरल तेल की खरीद की, जो उसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश बनाता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 86 फीसदी कच्चा तेल बाहर से आयात करता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर क्रूड की कीमतों या आपूर्ति को लेकर समस्या बढ़ती तो भारत की चिंता गहरा जाती। हालांकि वैश्विक हालात को देखते हुए भारत ने खाड़ी देशों पर निर्भरता पहले की कम करने की योजना पर काम कर शुरू कर दिया था। भारत सरकार को पता था कि मिडिल ईस्ट और यूरोपीय देशों के बीच तनातनी का व्यापक असर भविष्य में दिख सकता है। यही कारण रहा कि फरवरी 2022 से पहले भारत अपनी जरूरत का मुश्किल से आधा फीसदी तेल रूस से खरीदता था। आज देश के कुल आयात का 30 से 35 फीसदी तेल हर माह रूस से आ रहा है। सरकार के इस फैसले का असर इस रूप में भी दिखा कि पिछले तीन वर्षों के दौरान चाहे सीरिया विवाद हो, गाजा संघर्ष हो या मौजूदा ईरान- इस्रायल विवाद, भारत को रूस से तेल लेने में भारत को कोई परेशानी नहीं हुई। पेट्रोलियम मंत्रालय की मानें तो भारत का मकसद रूस, अमेरिका जैसे देशों से बड़े पैमाने पर क्रूड खरीदने के साथ नाइजीरिया, मैक्सिको, अंगोला, गुयाना जैसे देशों से तेल आयात बढ़ाने का है। इस समय मोटे तौर पर भारत रूस से 35 फीसदी, इराक से 19 फीसदी, सऊदी अरब से 14 फीसदी, यूएई से 10 फीसदी और अमेरिका से पांच फीसदी तेल खरीद रहा है।
ईरान- इस्रायल युद्ध में क्यों दूर रहा रूस?
अमेरिका ने इस्रायल के साथ मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया तो रूस ने निंदा की। ईरान के शीर्ष राजनयिक राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से समर्थन मांगने भी पहुंचे। लेकिन निंदा से ज्यादा रूस ने ईरान को कोई मदद नहीं दी। न ही ईरान के पक्ष में युद्ध में उतरने के कोई संकेत दिए। विश्व युद्ध की मंडराती आंशकाओं के बीच भी रूस ने अपने फायदे का गणित पूरा लगाया। उसे लग गया कि युद्ध में किसी का साथ देने के बजाय वह कुछ अल्पकालिक लाभ प्राप्त कर सकता है। जैसे कि तेल की कीमतों में वृद्धि, इससे रूस की डूबती अर्थव्यवस्था को मदद मिले या यूक्रेन में तीन साल से जारी युद्ध से विश्व का ध्यान हट सके। साथ ही वह इस्रायल के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है। दोनों देशों की सेनाएं सीरिया में सक्रिय हैं और वे सीधे टकराव नहीं चाहते। इधर, इस्रायल यूक्रेन युद्ध के दौरान काफी तटस्थ रहा, क्योंकि वह रूस को नाराज करने से बचना चाहता था। रूस में यहूदियों की आबादी बड़ी संख्या में है। यही कारण रहा कि ईरान- इस्रायल के संघर्ष में रूस ने मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभाई।
इस तनाव से बढ़ी भारत की आर्थिक चिंताएं
ईरान और इस्रायल के बीच यदि तनाव और बढ़ता तो भारत के व्यापार पर गंभीर असर पड़ता। इस्रायल- हमास युद्ध और हूती विद्रोहियों के कारण पहले से शिपिंग मार्ग बाधित रहे थे। ऐसे में होरमुज जलडमरूमध्य भी प्रभावित होता तो पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत का आयात-निर्यात प्रभावित होता। ईरान के साथ इस इलाके में भारत के जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और यमन के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध हैं। इन देशों से भारत 33.1 बिलियन डॉलर (2.75 लाख करोड़) का आयात और 8.6 बिलियन डॉलर (74.5 हजार करोड़) का निर्यात करता है। ये संकट बढ़ता तो भारत को ज्यादातर सामान केप ऑफ गुड होप (दक्षिण अफ्रीका) के रास्ते मंगाना पड़ता। वहीं होरमुज का रास्ता ठप होने से तेल लाने को नए रास्ते खोजने पड़ते। इससे भारत में कच्चे तेल के साथ पेट्रोल और डीजल के दामों में भी उछाल का संकट आता।
ईरान से भारत के निर्यात और आयात
ईरान में भारत का निर्यात : 1.24 बिलियन डॉलर (1.07 लाख करोड़ रुपए)
ईरान से भारत के आयात : 441.8 बिलियन डॉलर (38.25 लाख करोड़ रुपए)
भारत से ईरान को निर्यात की जाने वाली चीजें
निर्यात की जाने वाली वस्तु-व्यापार (मिलियन डॉलर)-कीमत (रुपयों में)
बासमती चावल – 753.2 6.52 – हजार करोड़
केले – 53.2 – 461 करोड़
सोया मील – 70.6 – 611.59 करोड़
काबुली चना – 27.9 – 241.56 करोड़
चायपत्ती – 25.5 – 220.93 करोड़
भारत और इस्रायल के बीच व्यापार
इस्रायल में भारत के निर्यात : 2.1 बिलियन डॉलर (1.82 लाख करोड़ रुपए)
इस्रायल से भारत के आयात : 1.6 बिलियन डॉलर (1.39 लाख करोड़ रुपए)
ट्रेड वॉर से वैश्विक व्यापार में गिरावट
व्यापार के लिहाज से लाल सागर बेहद अहम है। दुनिया का 12 फीसदी व्यापार इसी मार्ग से होता है। विश्व व्यापार संगठन के अनुसार ट्रेड वॉर के कारण पहले ही वैश्विक व्यापार में 0.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। ऐसे में मिडिल ईस्ट का तनाव और लंबा चलता तो भारत समेत दुनिया के कई देशों के व्यापार पर खराब असर पड़ता।
ऊर्जा सुरक्षा पर ज्यादा खतरा
सबसे बड़ी चिंता हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर थी। यहां से भारत के 60-65 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति होती है। यह मार्ग इतना अहम है कि यह अकेले वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत संभालता है। यह जलडमरू मध्य ईरान और ओमान/संयुक्त अरब अमीरात के बीच स्थित है। इसके जरिए सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत और कतर से तेल और एलएनजी का निर्यात होता है। भारत 80 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में यहां आपूर्ति बाधित होती तो देश में ईंधन महंगा होता, मुद्रास्फीति बढ़ती, रुपए पर दबाव बनता और राजकोषीय संतुलन बिगड़ जाता।






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