शक्ति के भ्रम में बिखरता पश्चिम
क्या किसी देश की महानता सिर्फ उसकी दौलत और हथियारों से तय होती है। पश्चिमी दुनिया जिस चमक को तरक्की मान रही है उसके पीछे रिश्तों की टूटन और मानसिक खालीपन छिपा है। वहीं भारत और एशियाई समाज आज भी...

वैश्विक नजरिया भौतिक चकाचौंध बनाम जीवन मूल्य
कहते हैं कि जो अंदर से कमजोर होता है वही सबसे ज्यादा शोर मचाता है। आज अमेरिका की वैश्विक भूमिका कुछ ऐसी ही नजर आती है। अपनी सैन्य ताकत और पैसों के दम पर वह पूरी दुनिया को प्रभावित करना चाहता है। लेकिन इस चमक के पीछे उसका समाज अंदर से कमजोर होता जा रहा है।
आज अमेरिका खुद को आधुनिकता और ताकत का सबसे बड़ा केंद्र मानता है। ऊंची इमारतें बड़ी कंपनियां और नई तकनीक उसके गर्व की पहचान बन चुकी हैं। वह दुनिया को बताना चाहता है कि वही सबसे आगे है। लेकिन अगर जमीन पर उतरकर देखें तो सच्चाई कुछ और ही है।पश्चिमी देशों में आजादी का मतलब रिश्तों से दूर होना बन गया है। वहां माना जाता है कि जितना जल्दी घर छोड़ दो उतना बेहतर। इसी सोच ने परिवार को कमजोर कर दिया है। इसके उलट भारत और एशियाई देशों में परिवार आज भी सबसे बड़ी ताकत है। यहां मुश्किल समय में परिवार ढाल बनकर खड़ा रहता है।
पश्चिम में युवा 18 साल की उम्र में ही घर छोड़ देता है। यह आजादी कई बार उसे अकेलेपन नशे और तनाव की ओर ले जाती है। वहीं बुजुर्ग अपने आखिरी दिन नर्सिंग होम में बिताते हैं। उनके बच्चे साल में एक बार मिलने आना भी बोझ समझते हैं। क्या ऐसे समाज को हम सच में सभ्य कह सकते हैं। आज पश्चिमी समाज का बड़ा हिस्सा डिप्रेशन और मानसिक बीमारियों से जूझ रहा है। इसकी एक बड़ी वजह वहां की उपभोक्तावादी सोच है। वहां इंसान की कीमत उसके पैसों और क्रेडिट स्कोर से तय होती है। भावनाओं की कोई अहमियत नहीं रह गई है।
इसके उलट भारतीय समाज आज भी भावनाओं और रिश्तों को सबसे ऊपर रखता है। हमें बचपन से सिखाया जाता है कि कम में भी खुश रहो और दूसरों की मदद करो।
एक भारतीय युवा चाहे आर्थिक संघर्ष कर रहा हो लेकिन उसे भरोसा रहता है कि उसका परिवार उसके साथ है। यही भरोसा उसे मजबूत बनाता है। यह ताकत किसी भी डॉलर से नहीं खरीदी जा सकती।
पश्चिमी देशों में कर्ज लेकर ऐश करना आम बात है। आज का मजा लेने के लिए लोग कल की चिंता नहीं करते। वहीं भारत जैसे देशों में लोग भविष्य के बारे में सोचते हैं। बच्चों की पढ़ाई और शादी के लिए पैसे बचाते हैं। हम संयम और बचत की संस्कृति से आते हैं। वहीं पश्चिम दिखावे और फिजूलखर्ची की संस्कृति में जी रहा है। आज दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम का युवा खुद अपनी जीवनशैली से ऊब चुका है। अब वह योग ध्यान और भारतीय जीवन दर्शन की ओर आकर्षित हो रहा है। ऋषिकेश और वाराणसी जैसे शहरों में हजारों विदेशी शांति की तलाश में आते हैं।
वे मानते हैं कि उनकी चमकदार दुनिया ने उन्हें सिर्फ तनाव दिया है। उन्हें भारतीय परिवारों का अपनापन बहुत अच्छा लगता है। ‘अतिथि देवो भव’ की परंपरा उन्हें हैरान करती है। उनके लिए यह सोचना भी मुश्किल है कि कोई अजनबी बिना किसी मतलब के मदद कर सकता है क्योंकि उन्होंने रिश्तों को सिर्फ फायदे से जोड़कर देखा है।
असल ताकत बम और मिसाइलों में नहीं होती। असली ताकत उस समाज में होती है जो मुश्किल समय में एक दूसरे का साथ दे। अमेरिका भले ही आज आर्थिक ताकत दिखा रहा हो लेकिन समाज के स्तर पर वह कमजोर पड़ता जा रहा है। भारत जैसे देशों की असली पूंजी हमारा परिवार और हमारी संस्कृति है। हमारी जड़ें गहरी हैं इसलिए हम हर मुश्किल का सामना कर सकते हैं।
जिस दिन दुनिया दिखावे की चमक से बाहर निकलकर देखेगी उसे समझ आएगा कि असली सुख न्यूयॉर्क की सड़कों पर नहीं बल्कि भारत के उन घरों में है जहां आज भी तीन पीढ़ियां एक साथ बैठकर एक ही थाली में खाना खाती हैं।






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