ट्रंप का एशियाई दौरा: राजा की वापसी या वैश्विक शक्ति की परीक्षा ?
डोनाल्ड ट्रंप का पूर्वी एशिया दौरा भले ही वैभव और स्वागत से भरा रहा हो, पर असली परीक्षा चीन से मुलाकात में हुई। जहां जापान, मलेशिया और दक्षिण कोरिया ने ट्रंप को 'राजा' की तरह सम्मान दिया, वहीं शी...
अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्राएँ अक्सर अपने साथ कूटनीतिक औपचारिकता, व्यापारिक समझौते और सैन्य संदेश लेकर आती हैं। परंतु डोनाल्ड ट्रंप का यह पाँच दिवसीय पूर्वी एशिया दौरा केवल दौरा नहीं था — यह एक वैश्विक संदेश था कि अमेरिका अब पारंपरिक सहयोगियों के सहारे नहीं, बल्कि अपने आर्थिक दबाव और राजनीतिक व्यक्तित्व के दम पर नया समीकरण गढ़ना चाहता है।
यह यात्रा अमेरिका की “राष्ट्रीय शक्ति” से अधिक ट्रंप की “व्यक्तिगत शक्ति” का प्रदर्शन बन गई। लेकिन इसके भीतर छिपा संकेत कहीं गहरा था — दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही, और चीन अब अमेरिका के सामने “बराबरी का खिलाड़ी” बनकर खड़ा है।
अमेरिकी नेतृत्व की थकान
शीत युद्ध के बाद से विश्व राजनीति अमेरिकी नेतृत्व पर टिकी रही। पर पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान, इराक, और यूक्रेन जैसे युद्धों ने अमेरिका को आर्थिक और सामरिक रूप से थका दिया है। ट्रंप इस थकान को पहचानते हैं, और इसी कारण उनकी विदेश नीति “अमेरिका फर्स्ट” के नारे पर आधारित है।
इस नीति का अर्थ है —“जहां लाभ नहीं, वहां नेतृत्व नहीं।” ट्रंप का मानना है कि अमेरिका ने दशकों तक अपने सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित की, पर बदले में पर्याप्त आर्थिक लाभ नहीं मिला। इसलिए अब वे उन रिश्तों को व्यापारिक सौदों में बदलना चाहते हैं — चाहे वह जापान हो, दक्षिण कोरिया या नाटो देश।
यह दृष्टिकोण पारंपरिक अमेरिकी कूटनीति से अलग है, जो साझेदारी को लोकतांत्रिक मूल्य और सुरक्षा संतुलन के आधार पर परिभाषित करती थी।
दक्षिण-पूर्व एशिया में अमेरिकी पुनर्प्रवेश
मलेशिया ट्रंप की यात्रा का पहला पड़ाव था। दक्षिण-पूर्व एशिया लंबे समय तक चीन के आर्थिक प्रभाव में रहा है। लेकिन ट्रंप ने यहां क्रिटिकल मिनरल्स (जैसे कोबाल्ट, निकेल और लिथियम) की आपूर्ति पर समझौता किया — ये वे धातुएँ हैं जिन पर भविष्य की टेक्नोलॉजी आधारित है। यह कदम अमेरिका की उस नई रणनीति का हिस्सा है जिसमें वह “सप्लाई चेन” को चीन के नियंत्रण से बाहर निकालना चाहता है।
इसके साथ ही थाईलैंड-कंबोडिया सीमा विवाद पर मध्यस्थता कर ट्रंप ने खुद को “शांति निर्माता” के रूप में पेश किया — जो घरेलू राजनीति में उन्हें ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ के योग्य साबित करने की रणनीति भी है।
जापान — पुराने मित्र से नई पूंजी
जापान में ट्रंप का स्वागत किसी राजा की तरह हुआ। टोक्यो टॉवर अमेरिकी रंगों में जगमगा उठा, और प्रधानमंत्री सनाई ताकाइची ने 550 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की। यह केवल आर्थिक सौदा नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था — कि जापान अब अमेरिका को “संतुलनकारी शक्ति” के रूप में बनाए रखना चाहता है, क्योंकि चीन का बढ़ता प्रभाव उसके लिए सुरक्षा चुनौती बन चुका है।
ट्रंप ने भी इसे अपने व्यक्तिगत आकर्षण की जीत के रूप में देखा, लेकिन जापान के लिए यह आत्मरक्षा की रणनीति थी। जापान जानता है कि अमेरिका अब स्थायी रक्षक नहीं, बल्कि मांग के अनुसार सहयोगी बन चुका है।
‘राजा’ का स्वागत और सौदे की राजनीति
सियोल में ट्रंप का स्वागत शाही अंदाज़ में हुआ। सैन्य बैंड ने “Hail to the Chief” और “YMCA” की धुनें बजाईं, राष्ट्रपति ली जे म्यंग ने सर्वोच्च सम्मान दिया, और “पीसमेकर डेज़र्ट” परोसा गया। लेकिन इसके पीछे का सच आर्थिक था — ट्रंप ने 200 अरब डॉलर के निवेश की मांग रखी, जिसके बदले उन्होंने दक्षिण कोरियाई निर्यात पर अमेरिकी टैरिफ 25% से घटाकर 15% कर दिया।
यह आर्थिक सौदेबाज़ी आधुनिक अमेरिकी कूटनीति की नई परिभाषा है — जहाँ न दोस्त स्थायी हैं, न दुश्मन। केवल राष्ट्रीय हित और तत्काल लाभ तय करते हैं कि किसे गले लगाना है।
ट्रंप बनाम शी जिनपिंग
यात्रा का सबसे अहम क्षण था बसान में शी जिनपिंग से मुलाकात। यहाँ न कोई स्वागत संगीत था, न भोज, न कैमरों की चकाचौंध। केवल एक लंबी सफेद मेज़, दो राष्ट्राध्यक्ष और उनके शीर्ष सलाहकार।
यह मुलाकात दो सामर्थ्यशाली अर्थव्यवस्थाओं की शक्ति-परीक्षा थी। ट्रंप ने महीनों से चीन को ऊँचे टैरिफ की धमकी दी थी ताकि वह अमेरिकी बाजार के लिए रास्ता खोले और फेंटानिल जैसी ड्रग्स के उत्पादन पर लगाम लगाए।
लेकिन चीन ने झुकने के बजाय जवाबी कदम उठाए — अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बंद की और “दुर्लभ खनिजों” (rare earths) के निर्यात पर नियंत्रण की घोषणा की। यह स्पष्ट संकेत था कि चीन अब दबाव झेलने वाला नहीं, बल्कि दबाव डालने वाला देश बन चुका है।
तनाव से समझौते तक
मुलाकात के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे के प्रति कुछ नरमी दिखाई।अमेरिका ने टैरिफ घटाए। चीन ने अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद और तेल-गैस के आयात बढ़ाने पर सहमति दी। साथ ही “क्रिटिकल मिनरल्स” की आपूर्ति फिर से खोलने का वादा किया।
यह कोई ऐतिहासिक सफलता नहीं थी, परंतु यह मान्यता थी कि टकराव दोनों के लिए हानिकारक है। शी जिनपिंग ने कहा —
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच मतभेद होना सामान्य है, पर सहयोग ज़रूरी है।
यह संवाद भले शालीन लगे, पर इसमें भविष्य का संकेत छिपा था —
मतभेद स्थायी रहेंगे, लेकिन खेल अब बराबरी का होगा।
एशिया में शक्ति का नया संतुलन
इस यात्रा ने एशिया को नया संदेश दिया — अमेरिका अब सहयोगी नहीं, सौदागर की भूमिका में है। वहीं चीन विस्तारवादी लेकिन व्यावहारिक नीति के साथ आगे बढ़ रहा है।
दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश अब इस दोराहे पर हैं कि किसके साथ जाएँ। अमेरिका के पास सैन्य ताकत है, पर चीन के पास आर्थिक जाल (Belt & Road Initiative) है। मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे देश अब दोनों शक्तियों के बीच “संतुलन की राजनीति” खेल रहे हैं।
भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों
भारत के लिए इस नई विश्व-व्यवस्था में दोनों पक्षों से अवसर भी हैं और खतरे भी। चीन और अमेरिका दोनों भारत को अपनी रणनीति में महत्वपूर्ण मानते हैं — पर भारत को संतुलन साधना होगा।
1. अवसर: अमेरिका की “सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन” रणनीति भारत को औद्योगिक केंद्र बना सकती है।
चीन पर टैरिफ से अमेरिकी कंपनियाँ भारत की ओर झुक रही हैं।
क्वाड (Quad) समूह भारत को एक रणनीतिक सह-नेता की भूमिका देता है।
2. चुनौती: चीन के बढ़ते प्रभाव से पड़ोसी देशों पर दबाव है।
अमेरिका का व्यवहार अब अस्थायी है, वह लाभ के हिसाब से रुख बदल सकता है।
यदि भारत अमेरिका की नीति के बहुत करीब जाता है, तो रूस और ईरान जैसे पारंपरिक साझेदार दूर जा सकते हैं।
भारत को इस नए परिदृश्य में “रणनीतिक स्वायत्तता” बनाए रखनी होगी — न तो चीन के खेमे में, न पूरी तरह अमेरिका के।
वैश्विक राजनीति की नई पटकथा
ट्रंप की यह यात्रा वास्तव में “नए विश्व-क्रम” की पटकथा लिखने जैसा कदम थी। अब युद्ध बंदूक से नहीं, टैरिफ और सप्लाई चेन से लड़े जा रहे हैं। जहाँ पहले अमेरिका लोकतंत्र फैलाने का संदेश देता था, अब वह लाभ केंद्रित व्यवहारवाद की नीति पर चला गया है। चीन इसका उल्टा कर रहा है — वह आर्थिक सहायता और बुनियादी ढांचे के ज़रिए प्रभाव फैला रहा है। यह प्रतिस्पर्धा केवल शक्ति की नहीं, विश्वास की लड़ाई है।
जब ट्रंप लौटे और शी पहुंचे
ट्रंप के दक्षिण कोरिया छोड़ते ही शी जिनपिंग उसी भूमि पर उतरे — और उन्हें भी उतना ही भव्य स्वागत मिला। यह दृश्य प्रतीक था — “एक दौर जा रहा है, दूसरा आ रहा है।” ट्रंप भले इस यात्रा को “10 में से 12” अंक दें, पर सवाल यह है कि क्या उन्होंने वह पाया जो “अमेरिका को चाहिए”? क्योंकि जिस खाली जगह अमेरिका छोड़ रहा है, उसे भरने के लिए चीन पूरी तरह तैयार है।
शक्ति का संक्रमण और भारत का रास्ता
ट्रंप की एशिया यात्रा अमेरिकी नेतृत्व की सीमाओं और एशिया की नई आत्मविश्वासपूर्ण राजनीति का प्रतीक थी। दुनिया अब बहुध्रुवीय है — और भारत, अपनी स्थिरता, लोकतंत्र और जनसंख्या के बल पर, इस नए शक्ति-संतुलन का तीसरा स्तंभ बन सकता है। पर इसके लिए भारत को “वैश्विक मंच का श्रोता” नहीं, बल्कि “निर्माता” बनना होगा। अमेरिका और चीन के बीच की इस आर्थिक-दौड़ में भारत को अपनी नीतियों को स्वतंत्र, व्यावहारिक और दीर्घदृष्टि पर आधारित रखना होगा।
अंततः यह यात्रा बताती है
“ट्रंप को जो चाहिए वह शायद मिल गया — पर अमेरिका को जो चाहिए, उसकी खोज अभी जारी है। और इस खोज में भारत जैसे देशों की भूमिका अब निर्णायक होगी।”
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