यूनुस का चीन दौरा: भारत के लिए चिंताजनक संकेत
यूनुस ने दौरे के दौरान चीन को बांग्लादेश में अपना निवेश और सहयोग बढ़ाने के लिए आमंत्रित किया, साथ ही कहा की भारत के सात पूर्वोत्तर राज्य—अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, और...

आज़ाद सिंह राठौड़ लेखक, सामरिक मुद्दों के जानकार
विश्व के किन्हीं दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों की औपचारिक मुलाक़ात दोनों देशों के आपसी संबंधों के लिए अनिवार्य भी है लेकिन यह प्रायः सामान्य बात भी मानी जाती है। विकासशील देश, विकसित देशों से नए उद्योग, मूलभूत ढाँचागत विकास और स्वास्थ्य एवं नई टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र में निवेश व सहयोग की अपेक्षा रखना भी इन मुलाक़ातों का अहम हिस्सा होता है।
बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस और चीन के राष्ट्रपति शी जिपिंग का मिलना भी इसी तरह से एक सामान्य घटना है। परंतु इस दौरे पर यूनुस द्वारा दिए गए बयान ने इसे असामान्य और भारत के बेहद चिंताजनक बना दिया है। यूनुस ने दौरे के दौरान चीन को बांग्लादेश में अपना निवेश और सहयोग बढ़ाने के लिए आमंत्रित किया, साथ ही कहा की भारत के सात पूर्वोत्तर राज्य—अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, और सिक्किम समेत समुद्री तट से वंचित है। इन राज्यो तक पहुँचने का समुद्री रास्ता बांग्लादेश से होकर गुजरता है ऐसे में चीन और बांग्लादेश के संबंधों में यह बिंदु महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित होगा वहीं भारत की यह भौगोलिक सीमितता चीन को इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने का अनूठा अवसर प्रदान करती है। यह बयान भारतीय राजनयिक व कूटनीतिक हलकों में चौंकाने वाला है।
यूनुस भारत को कूटनीतिक झटका देने में यहीं तक नहीं रुकते। वह भारत-बांग्लादेश संबंधों में महत्वपूर्ण कड़ी तीस्ता नदी विकास परियोजना जिस पर भारत लंबे अरसे से सहयोग कर रहा है के लिए चीन से सहयोग की गुहार लगाते हैं । यूनुस एक तरह से इस परियोजना में भारत का स्थान चीन को देना चाहते दिख रहे हैं।
इसके इतर इस दौरे के दौरान दोनों देशों के उच्च स्तर के प्रतिनिधियों ने चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना पर भी परस्पर सहयोग में अत्यंत तेजी व उत्सुकता दिखायी है। निसंदेह यह परियोजना दो देशों के आपसी संबंधों और जरूरतों पर निर्भर करती है परंतु इसके परिप्रेक्ष्य में एक लंबे समय से सहयोगी और ऐतिहासिक साथी भारत को बिल्कुल दरकिनार कर दिया जाना भी बेहद चिंताजनक है। यह परियोजना अगर धरातल पर आती है तो भारत के पूर्वी क्षेत्र में संप्रभुता के लिए चुनौती साबित होगी।
यह दोनों मुद्दे मात्र कूटनीतिक नहीं, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से भी संबंधित है।
भारत के लिहाज से यूनुस की यह यात्रा विदेशी निवेश लाने तक तो ठीक थी परंतु इस यात्रा में चीन को बांग्लादेश में भारत के सापेक्ष स्थान देने और चीन को बांग्लादेश का उपयोग भारत के पूर्वी क्षेत्र में पकड़ बढ़ाने के लिए पेशकश करना हमारे लिए बेहद चिंताजनक है।
वर्तमान घटनाक्रम के मध्येनजर भारत को दो दृष्टिकोण से आगे बढ़ना होगा, अगर यह बयानबाजी मोहम्मद यूनुस की राजनीतिक और कूटनीतिक परिपक्वता मात्र का नतीजा है तो यूनुस प्रशासन से नए सिरे से वार्ता प्रारम्भ करनी चाहिए, और अगर ऐसा नहीं है, जिसके आसार अधिक नजर आते है तो बांग्लादेश में भारत से सहानुभूति रखने वाले बड़े तबके और राजनेताओं को साथ लेकर आगे की रणनीति तय करनी चाहिए। बांग्लादेश की जनता अभी तक उसे आज़ाद कराने में भारत के ऐतिहासिक सहयोग को भूली नहीं है।






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