आग में जलती जवाबदेही
राजस्थान की सड़कों पर चलती ‘लक्ज़री बसें’ अब लक्ज़री नहीं, मौत की सवारी बन चुकी हैं। जयपुर से जैसलमेर तक आग, धुआं और चीखें अब हादसों की नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी की गवाही दे रही हैं। हर बार की तरह...

विवेक श्रीवास्तव,
वरिष्ठ पत्रकार
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राजस्थान की धरती इन दिनों झुलस रही है, सिर्फ़ तापमान से नहीं, बल्कि हादसों से। जयपुर के पास गैस सिलेंडर से भरा ट्रेलर धधक उठा। कुछ ही दिनों बाद जैसलमेर मार्ग पर एक निजी बस सैकड़ों डिग्री की लपटों में समा गई। दर्जनों जिंदगियां जलकर राख हो गईं, और बाकी बची सिर्फ़ एक आवाज़ कि ‘सिस्टम कहां था?’
हर बार की तरह इस बार भी वही हुआ, अफसर हरकत में आए, मंत्री पहुंचे, मुआवजा घोषित हुआ, जांच कमेटी बनी और सबकुछ फिर से ठंडा पड़ गया। राज्य की सड़कों पर रोज़ हजारों निजी बसें दौड़ती हैं। इनमें से अधिकांश का ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ एक कागजी मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं। जो वाहन कबाड़खाने में होने चाहिए, वे यात्रियों की ज़िंदगी से खिलवाड़ करते हुए ‘लक्ज़री’ टैग लेकर सड़क पर दौड़ रहे हैं।
यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित प्रशासनिक अपराध है, जहां रिश्वत, मिलीभगत और बेफिक्री तीनों मिलकर मौत का सौदा करते हैं।
‘लक्ज़री बस’ के नाम पर मौत की गाड़ी
जैसलमेर हादसे के बाद जांच में खुलासा हुआ कि बस की बॉडी बिना किसी सुरक्षा मानक के मॉडिफाई की गई थी। अतिरिक्त सिलेंडर, तंग एग्जिट गेट और सीटों के नीचे ज्वलनशील सामग्री यह सब उस सिस्टम की तस्वीर है जहां ‘परमिट’ पैसे से मिलते हैं और ‘फिटनेस’ रिश्वत से।
राजस्थान में बस बॉडी मॉडिफिकेशन का कारोबार खुलेआम चल रहा है। बस मालिक डिज़ाइन बदलते हैं, सीटें बढ़ाते हैं, और गैस सिलेंडर लगा देते हैं, ताकि बस लक्ज़री लगे। पर हक़ीक़त में यह लक्ज़री नहीं, लपटों में बदलने वाला ट्रैप है।
सुरक्षा मानक सिर्फ़ रिपोर्टों में, सड़कों पर नहीं
राज्य के ज्यादातर वाहनों में न तो फायर एक्सटिंग्विशर हैं, न इमरजेंसी एग्जिट। ड्राइवरों को न आपातकालीन प्रशिक्षण मिलता है, न यात्रियों को सुरक्षा की कोई गारंटी।
फिटनेस जांच महज़ औपचारिकता बन गई है, जैसे ‘फोटो खिंचवाओ, दस्तखत कराओ और बस सड़क पर दौड़ाओ।’ जब हादसा होता है, तो पूरा वाहन चंद मिनटों में आग का गोला बन जाता है और लोग बाहर निकलने की जगह मौत ढूंढने लगते हैं।
हादसे के बाद की रस्म : कमेटी, मुआवजा और मौन
हर आगजनी के बाद वही स्क्रिप्ट चलती है। ‘मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए हैं…’, ‘प्रशासन मौके पर मौजूद है…’, ‘पीड़ित परिवारों को पांच लाख का मुआवजा दिया जाएगा…’ फिर?
फिर वही सन्नाटा। न जांच रिपोर्ट आती है, न किसी अफसर का नाम सामने आता है। जनता का ग़ुस्सा ठंडा होता है, और सरकार राहत की सांस लेती है।
राजस्थान में बीते एक दशक की लगभग हर जांच समिति का यही हाल रहा। रिपोर्टें फाइलों में गुम, और हादसे दोहराए जाते रहे।
जनता की बेबसी और प्रशासन की नींद
यह विडंबना ही है कि आम आदमी खुद जानता है कि वह मौत की सवारी कर रहा है, फिर भी मजबूर है। क्योंकि विकल्प नहीं हैं। ट्रेनें भर चुकी हैं और निजी बसें ही सहारा हैं। यह जनता की बेबसी है, पर उससे भी बड़ी सरकार की संवेदनहीनता।
जब तक कोई बड़ी त्रासदी न हो जाए, तब तक किसी विभाग को फर्क नहीं पड़ता। जैसे प्रशासन हादसों के इंतजार में बैठा हो, ‘कुछ बड़ा हो जाए, फिर दिखावा कर लेंगे।’
अब वक्त है जवाबदेही तय करने का
सरकारों को अब ‘जांच’ और ‘मुआवजे’ की रट से आगे बढ़ना होगा।
– हर हादसे के लिए जिम्मेदार अधिकारी की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाए।
– फिटनेस सर्टिफिकेट से लेकर मॉडिफिकेशन की अनुमति तक हर दस्तखत का डिजिटल रिकॉर्ड बने।
– GPS-आधारित फिटनेस ट्रैकिंग, ड्राइविंग डेटा, और हर वाहन का सेफ्टी लॉग अनिवार्य किया जाए।
– और सबसे ज़रूरी, अगर कोई वाहन सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करता है, तो उसका परमिट स्थायी रूप से रद्द किया जाए।
जो अधिकारी रिश्वत लेकर फिटनेस पास करते हैं, उन्हें सिर्फ़ सस्पेंड नहीं, बल्कि दंडित किया जाए, ताकि अगली बार ‘फाइल पर साइन’ करने से पहले वे सौ बार सोचें।
मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका
मीडिया अगर हादसे को ‘न्यूज़ बुलेटिन’ नहीं, बल्कि जवाबदेही का अभियान बनाए, तो असर होगा। जनता को भी अपनी भूमिका निभानी होगी, जैसे असुरक्षित बसों का बहिष्कार, स्थानीय प्रशासन से सवाल, और सोशल मीडिया पर लगातार दबाव। सड़क सुरक्षा सिर्फ़ सरकारी मुद्दा नहीं, यह नागरिक चेतना का भी इम्तिहान है।
– हर आग की एक कहानी होती है, हर जलती बस, हर झुलसी देह एक कहानी कहती है। कहीं मालिक का लालच, कहीं अफसर की लापरवाही, कहीं सिस्टम की सुस्ती। इन तीनों का मिलाजुला रूप ही त्रासदी है।
अब वक्त है कि प्रशासन सिर्फ़ ‘हादसे के बाद’ नहीं, ‘हादसे से पहले’ जागे। सड़क सुरक्षा कोई ‘पोस्ट-इवेंट रेस्पॉन्स’ नहीं, बल्कि एक ‘प्रीवेंशन पॉलिसी’ होनी चाहिए।
वरना हम बार-बार यही सुनेंगे —
‘आग लगी थी… पर सिस्टम सो रहा था।’






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