विधानसभा का विषैला होता वातावरण
राजस्थान विधानसभा का इतिहास स्वस्थ संसदीय परम्पराओं का गवाह रहा है, लेकिन मौजूदा सत्र ने इस गौरवशाली परम्परा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पक्ष और विपक्ष की तल्खियों, हंगामों और आरोप-प्रत्यारोप के बीच...

अहम की लड़ाई में जनता के मुद्दे बलि चढ़े
मनीष गोधा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- अहम की लड़ाई में जनता के मुद्दे बलि चढ़े
- बजट सत्र में यह हुआ था विवाद
- इस बार शुरुआत से ही तल्ख माहौल
- हर रोज नए मुद्दे पर प्रदर्शन
- हंगामे के बीच पास हुए अहम विधेयक
- कैमरा विवाद बना समापन का केंद्रबिंदु
- निम्नस्तरीय आरोपों से और बिगड़ा माहौल
- खल रही है अनुभवी नेताओं की कमी
- कांग्रेस के भीतर खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई
राजस्थान विधानसभा में आमतौर पर एक सत्र की छाया दूसरे सत्र पर पड़ने का इतिहास नहीं रहा है। अब तक होता यही दिखा है कि कोई सत्र यदि किसी अवांछनीय या कड़वे अध्याय के साथ समाप्त होता भी है तो अगले सत्र की शुरूआत में ही उस पर भूल-चूक माफ कर कदम आगे बढ़ा लिए जाते हैं। लेकिन इस बार ऐसा लगा कि पिछले सत्र की कड़वाहट खत्म होने के बजाए कई गुना बढ़ गई। इस सत्र का वातावरण ना सिर्फ पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा विषैला रहा, बल्कि बहुत ही कसैले अनुभव के साथ खत्म भी हुआ, जिसकी कड़ुवाहट अगले वर्ष फरवरी-मार्च में होने वाले बजट सत्र में भी बनी रहने की संभावना है।
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राजस्थान विधानसभा का इतिहास बहुत ही स्वस्थ संसदीय परम्पराओं वाला रहा है, जहां पक्ष और विपक्ष के बीच वाद-विवाद और हंगामा तो होता रहा है, लेकिन माहौल इतना खराब कभी नहीं हुआ कि विधानसभा अध्यक्ष और विपक्ष के विधायकों के बीच विवाद स्तरहीन आरोपों तक पहुंच जाएं। इस विधानसभा में परसमराम मदेरणा जैसे खुर्राट विधानसभा अध्यक्ष और भैंरोंसिंह शेखावत जैसे दिग्गज नेता प्रतिपक्ष रहे, जिनके बीच मतभेद कितना भी था, लेकिन मनभेद नहीं था। इसी सदन में पिछली सरकार के दौरान सीपी जोशी स्पीकर और गुलाबचंद कटारिया नेता प्रतिपक्ष रहे और दोनों के बीच एक-दूसरे के प्रति आदर की वो मिसाल भी दिखी कि जब कटारिया राज्यपाल बनाए गए तो सीपी जोशी ने उनका अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित किया और समारोहपूर्ण विदाई दी।
पक्ष और विपक्ष के बीच विवाद और इसके शांतिपूर्ण समाधान के तो सैंकड़ों किस्से हैं। ऐसा कई बार होता देखा गया है कि विपक्ष ने विभिन्न मु्द्दो को लेकर सदन में ही रात-रात भर धरना दिया और अगले दिन बातचीत से ही समाधान निकाल कर दोनों पक्ष आगे बढ़ गए। लेकिन इस बार ऐसा लग रहा है कि पक्ष और विपक्ष दोनों ही विधानसभा की स्वस्थ परम्पराएं और इतिहास भूल गए हैं। कोई भी झुकने को तैयार नहीं है और इनके अपने अहम के आगे जनता के मुद्दे गौण हो गए हैं। मौजूद विधानसभा में पहला और दूसरा सत्र तो फिर भी ठीक-ठाक निकला, लेकिन पिछले बजट सत्र से सदन के वातावरण में जिस तरह की विषाक्तता घुलनी शुरू हुई उसका असर चौथे सत्र में भी पूरे समय बना रहा।
बजट सत्र में यह हुआ था विवाद
विधानसभा के इस वर्ष के बजट सत्र के दौरान किसी हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा ने स्पीकर वासुदेव देवनानी के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। मीडिया आमतौर पर सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद विधायकों के बीच होने वाली अनौपचारिक चर्चा को रिपोर्ट नहीं करता है, लेकिन ये टिप्पणी मीडिया में रिपोर्ट हुई और इसके बाद मामला डोटासरा सहित कांग्रेस के छह विधायकों के निलम्बन तक जा पहुंचा। ये निलम्बन वापस तो हुआ, लेकिन डोटासरा की टिप्पणी से स्पीकर वासुदेव देवनानी आहत हो कर सदन में भावुक होते दिखे और उनकी ओर से भी डोटासरा के लिए एक अवांछनीय टिप्पणी हो गई। इसका नतीजा यह निकला कि विवाद के बाद से पूरे बजट सत्र और हाल में हुए मानसून सत्र में भी डोटासरा विधानसभा नहीं आए।
इस बार शुरुआत से ही तल्ख माहौल
इस बार सत्र की शुरूआत से ही दोनों पक्षों के बीच तल्खी नजर आई। मौजूदा स्पीकर वासुदेव देवनानी ने सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने की एक स्वस्थ परम्परा शुरू की है। अब तक हर बार नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस विधायक दल के सचेतक, उप सचेतक इस बैठक में आते रहे हैं, लेकिन इस बार सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार किया गया। सदन के नेता मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा बैठक के लिए विधानसभा पहुंच गए और इंतजार भी किया, लेकिन नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली बैठक में नहीं आए और बाद में उनका बयान आया कि वहां एकतरफा फैसले होते हैं, इसलिए हमने बहिष्कार किया है। विपक्ष की इस तल्खी से ही अंदाजा हो गया था कि इस बार सत्र हंगामेदार रहने वाला है, लेकिन मामला सिर्फ हंगामे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि काफी आगे बढ़ा और पहली सदन के नेता यानी मुख्यमंत्री के वक्तव्य के दौरान हंगामा और बहिष्कार जैसी घटना भी होती दिखी।
हर रोज नए मुद्दे पर प्रदर्शन
कांग्रेस ने इस बार विपक्ष के रूप में अपना दम दिखाने के लिए हर रोज एक नए मुद्दे पर सदन के बाहर और अंदर प्रदर्शन की रणनीति तय की थी। कांग्रेस के विधायक पोस्टर बैनर लेकर आते और सदन के बाहर प्रदर्शन करने के बाद अंदर जाते। प्रश्नकाल में तो हिस्सा लेते, लेकिन शून्यकाल शुरू होने के साथ ही अपने मुद्दे पर हंगामा करते और बाद में इसी हंगामे के बीच विधानसभा की कार्यवाही पूरी हो जाती। इसका नतीजा यह हुआ कि एक भी दिन शून्यकाल में ढंग से चर्चा नहीं हो पाई। जनता के मुद्दे सदन में उल्लेखित तो होते रहे, लेकिन इन पर चर्चा नहीं हो पाई। कांग्रेस की यह रणनीति बहुत हद तक संसद में कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन जैसी रही। जिस तरह वहां कांग्रेस किसी ना किसी मुद्दे पर हंगामा करती नजर आती है, कुछ वैसा ही यहां भी होता दिखा।
हंगामे के बीच पास हुए अहम विधेयक
इस सत्र के दौरान प्रदेश में धर्मातरण पर रोक, कोचिंग संस्थाओं के नियमन, भूजल संरक्षण के लिए ट्यूबवैल की खुदाई पर सरकार के नियंत्रण और राजस्थान इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंसेज यानी रिम्स की स्थापना जैसे अहम विधेयक पारित किए गए है, लेकिन ये सभी हंगामे के बीच पारित हुए। धर्मांतरण पर रोक और कोचिंग संस्थानों के नियमन जैसे अहम विधेयकों पर भी जैसी लम्बी और सार्थक चर्चा की उम्मीद थी, वह नहीं हो पाई।
कैमरा विवाद बना समापन का केंद्रबिंदु
विधानसभा सत्र का समापन विपक्ष की सीटों की ओर कथित तौर पर लगाए गए दो अतिरिक्त कैमरों के विवाद के साथ हुआ। विपक्ष ने यह मुद्दा नौ सितम्बर को उठा कर हंगामा किया और दस सितम्बर यानी अंतिम दिन तो पूरा ही इस मुद्दे पर हंगामे में निकाल दिया। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली का आरोप था कि विपक्ष की ओेर दो अतिरिक्त कैमरे विपक्ष की जासूसी के लिए लगाए गए हैं और यह सदस्यों की निजता हनन है। स्पीकर यह स्पष्ट करें कि कैमरे क्यों लगाए गए हैं और इनका एक्सेस किसके पास है? उधर स्पीकर ने आरोपों को पूरी तरह आधारहीन बताया और कहा कि कैमरे अपग्रेड किए गए हैं, ताकि सुरक्षा को और पुख्ता किया जा सके और पारदर्शिता रहे। सदन के नेता यानी मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी सदन में अपनी बात रख मुद्दे को खत्म करने का प्रयास किया, लेकिन विपक्ष उनके भाषण का बहिष्कार कर चला गया। बहरहाल इसी मुद्दे पर सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के स्थगित हो गई।
निम्नस्तरीय आरोपों से और बिगड़ा माहौल
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा और स्पीकर देवनानी के बीच हुए विवाद का असर इस मुद्दे पर भी दिखा और डोटासरा ने देवनानी पर कांग्रेस महिला विधायकों को कैमरे के जरिए देखने जैसा निम्नस्तरीय आरोप लगा दिया। इसी आरोप को बाद में कांग्रेस की महिला विधायकों ने भी दोहराया। इस बेहूदा आरोप का जवाब स्पीकर ने ‘जाकी रही भावना..’ जैसी पंक्ति के साथ संयमित ढंग से दिया।
खल रही है अनुभवी नेताओं की कमी
विधानसभा के मौजूदा वातावरण को देखते हुए यहां अनुभवी नेताओं की कमी बहुत खल रही है। कहने को तो दोनों पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत भी सदन के सदस्य हैं, लेकिन दोनो ही सदन में नहीं आते है और आते भी हैं तो सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेते। सदन सुचारू ढंग से चलाने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की होती है और इस दृष्टि से देखें तो गुलाबचंद कटारिया, घनश्याम तिवाड़ी, राजेन्द्र राठौड़ जैसे अनुभवी नेताओं के सदन में नहीं होने का असर भाजपा के फ्लोर मैनेजमेंट और पक्ष-विपक्ष के बीच विवादों को सुलझाने की रणनीति में साफ दिख रहा है। इन नेताओं का अनुभव सदन का माहौल स्वस्थ बनाए रखता था और विवाद की स्थिति में बातचीत से रास्ता निकालने में भी इनका संसदीय अनुभव पूरे प्रदेश ने देखा है।
कांग्रेस के भीतर खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई
कांग्रेस की बात करें तो इनके पास सचिन पायलट, शांति धारीवाल, हरिमोहन शर्मा, राजेन्द्र पारीक जैसे अनुभवी चेहरे तो हैं, लेकिन पार्टी के विधायक दल में खींचतान बहुत है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा की धारीवाल और राजेन्द्र पारीक से नहीं बनती। वहीं डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के बीच भी वर्चस्व की लड़ाई है। वहीं सचिन पायलट सदन की कार्यवाही में बहुत कम हिस्सा लेते हैं। ऐसे में कांग्रेस हंगामा खड़ा तो कर देती है, लेकिन हंगामा शांत करवा पाना आसान नहीं रह जाता।
कुल मिला कर इस बार जिस तरह से विधानसभा की कार्यवाही चली, उसने यह तो साफ कर दिया कि इस विधानसभा की स्वस्थ संसदीय परम्पराएं अब वास्तव में इतिहास की बात ही रह गई है। नेताओं के अहम जनता के मुद्दों के मुकाबले ज्यादा अहमियत रखने लगे हैं, इसीलिए प्रश्नकाल तक में हंगामा और सदन की कार्यवाही स्थगित होती नजर आती है। वाद-विवाद की इस सबसे बड़ी पंचायत में अब विवाद ही महत्व पाता दिख रहा है।
आंकड़ों में देखें सत्र की गतिविधियां
आंकड़ों की बात की जाए तो छह दिन चले इस सत्र में बहुत कुछ हुआ है जैसे-
– 6 बैठकें हुई और 18 घंटे 40 मिनट कार्यवाही चली।
– कुल 3008 प्रश्न प्राप्त हुए, जिनमें से तारांकित प्रश्न 1237, अतारांकित प्रश्न 1770 एवं अल्प सूचना प्रश्न एक था।
– कुल 120 तारांकित प्रश्न सूचीबद्ध हुए, जिनमें से 53 प्रश्न मौखिक रूप से पूछे गए और उनके उत्तर भी दिए गए। इसी तरह 119 अतारांकित प्रश्न भी सूचीबद्ध हुए।
– प्रक्रिया के नियम-131 के अंतर्गत 437 प्रस्तावों की सूचनाएं प्राप्त हुई।
– मंत्रीगण का ध्यान आकर्षित करने के लिए दो प्रस्ताव कार्य-सूची में सूचीबद्ध किए गए।
– प्रक्रिया के नियम 50 के अंतर्गत कुल 134 स्थगन प्रस्तावों की सूचना प्राप्त हुई। इनमें से 21 स्थगन प्रस्तावों पर सदन में बोलने का अवसर दिया गया तथा 17 विधायकों ने अपने विचार रखे।
– प्रक्रिया के नियम-295 के अंतर्गत 95 विशेष उल्लेख के प्रस्ताव प्राप्त हुए। इनमें से 78 विशेष उल्लेख की सूचनाएं सदन में पढ़ी गई या पढ़ी हुई मानी गई।- सत्र में कुल 7 विधेयक रखे गए तथा प्रवर समिति द्वारा प्रस्तुत 3 विधेयकों समेत कुल 10 विधेयक सदन द्वारा पारित किए गए और एक विधेयक वापस लिया गया।






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