राजस्थान में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल: सुधांश पंत की विदाई के पीछे क्या है असली वजह ?
राजस्थान के मुख्य सचिव सुधांश पंत की केंद्र में प्रतिनियुक्ति ने राज्य की नौकरशाही और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन और नेतृत्व नियंत्रण के नए...

राजनीति में जो दिखता है, वही हमेशा सच नहीं होता — और जो सच होता है, वह अक्सर पर्दे के पीछे घटता है। राजस्थान में मुख्य सचिव सुधांश पंत का केंद्र में भेजा जाना भी कुछ ऐसा ही मामला है। सतह पर यह एक सामान्य प्रशासनिक आदेश दिखाई देता है, लेकिन असल में यह राज्य की सत्ता-संरचना के भीतर बदलते समीकरणों की गूंज है।
जब सरकार ने 10 नवंबर को आदेश जारी किया कि आईएएस सुधांश पंत को मुख्य सचिव पद से हटाकर केंद्र में प्रतिनियुक्त किया जा रहा है, तो यह खबर अचानक आई। लेकिन इस “अचानकपन” के पीछे महीनों की राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान छिपी थी। पंत पिछले एक साल से राजस्थान सरकार में सबसे प्रभावशाली नौकरशाहों में गिने जाते थे। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार में उनकी भूमिका इतनी केंद्रीय हो गई थी कि अफसरशाही में कहा जाने लगा — “राजस्थान में मुख्यमंत्री बदलते हैं, लेकिन असली फैसले मुख्य सचिव के इशारे पर चलते हैं।”
यही बात धीरे-धीरे राजनीतिक असहजता का कारण बन गई। भाजपा के अंदर ही कई मंत्री और विधायक पंत की कार्यशैली से असंतुष्ट थे। कई बार विधायकों को मुख्य सचिव के कक्ष के बाहर इंतजार करते देखा गया, जबकि आम तौर पर ऐसा मुख्यमंत्री के दफ्तर के बाहर होता है। यह दृश्य संकेत था कि अफसरशाही का पलड़ा राजनीतिक नेतृत्व पर भारी पड़ने लगा है।
पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वन-टू-वन मुलाकात की थी। उस समय इसे शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन अब पंत की विदाई के बाद इस मुलाकात का अर्थ नया रूप ले चुका है। माना जा रहा है कि उस मुलाकात में मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक नियंत्रण और राजनीतिक संदेश दोनों को लेकर चर्चा की थी।
भाजपा के लिए यह ज़रूरी था कि राज्य सरकारें एक समान कार्यशैली में काम करें — जहां राजनीतिक नेतृत्व शीर्ष पर रहे और ब्यूरोक्रेसी नीति-कार्यान्वयन तक सीमित रहे। भजनलाल शर्मा के मुख्यमंत्री बनने के बाद दिसंबर 2023 में सुधांश पंत को केंद्र से बुलाकर राजस्थान भेजा गया था। पंत एक कुशल और अनुभवी अधिकारी माने जाते हैं, जिनका प्रशासनिक अनुभव केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर रहा है। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, पंत की भूमिका केवल मुख्य सचिव तक सीमित नहीं रही — वे सरकार के चेहरे और आवाज़ के रूप में भी दिखने लगे।
यही वह बिंदु था जहां से टकराव शुरू हुआ। विपक्ष ने इसे हथियार बना लिया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि “राजस्थान में मुख्यमंत्री नहीं, मुख्य सचिव शासन चला रहे हैं।” कई बार विधानसभा में भी यह मुद्दा उठा कि भाजपा सरकार की नीतियों में जनता से ज़्यादा ब्यूरोक्रेसी की झलक दिखाई देती है।
यह धारणा जब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगी, तो सरकार के लिए यह असुविधाजनक स्थिति बन गई।राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह निर्णय एक ‘कंट्रोल रिस्टोर’ कदम था। हर मुख्यमंत्री चाहता है कि उसके शासन की पहचान उसके फैसलों से बने, न कि किसी नौकरशाह के नाम से।
भजनलाल शर्मा के लिए यह और भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि वे भाजपा के अपेक्षाकृत नए चेहरे हैं और उन्हें अभी अपना नेतृत्व स्थिर करना है। ऐसे में यह बदलाव दिखाता है कि अब सरकार “मुख्यमंत्री केंद्रित” स्वरूप में लौट रही है।सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस बदलाव के पीछे एक और व्यावहारिक वजह भी थी।
जयपुर में सरकार की दूसरी वर्षगांठ की तैयारियां चल रही थीं और मुख्यमंत्री चाहते थे कि आयोजन सरकार की उपलब्धियों को “राजनीतिक नेतृत्व” के रूप में पेश करे। पंत का हटना उसी समय हुआ, जब यह तैयारी अंतिम चरण में थी। इसे एक तरह से “मैसेज टाइमिंग” कहा जा सकता है — कि अब आगे सरकार की दिशा मुख्यमंत्री तय करेंगे, नौकरशाही नहीं।
राज्य की अफसरशाही में इस फेरबदल के बाद हलचल है। वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि इससे भविष्य की नियुक्तियों का पैटर्न बदल सकता है। अब मुख्यमंत्री की पसंद और राजनीतिक तालमेल को प्राथमिकता दी जाएगी, भले ही इसके लिए वरिष्ठता क्रम को लांघना पड़े। आने वाले दिनों में नया मुख्य सचिव वही होगा, जो मुख्यमंत्री की सोच और कार्यशैली के साथ तालमेल बिठा सके।
यह पूरा घटनाक्रम राजस्थान में “सत्ता बनाम सिस्टम” की पुरानी बहस को फिर जीवित कर देता है। क्या एक सक्षम अफसर की भूमिका सीमित होनी चाहिए? क्या राजनीतिक नेतृत्व को ब्यूरोक्रेसी पर पूरी पकड़ रखनी चाहिए? ये सवाल लोकतंत्र की स्थायी चर्चा का हिस्सा रहे हैं।
लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है, इसलिए राजनीतिक नेतृत्व को निर्णय प्रक्रिया में प्राथमिकता मिलना स्वाभाविक है। लेकिन जब कोई अफसर जनता से जुड़ी योजनाओं को कुशलता से लागू करता है, तो उसका प्रभाव भी बढ़ता है — और यही कभी-कभी टकराव की जड़ बन जाता है। सुधांश पंत का मामला इसी द्वंद्व का उदाहरण है। वे प्रशासनिक दृष्टि से सक्रिय, तेज़ और निर्णयक्षम अधिकारी रहे। उनके नेतृत्व में कई योजनाओं की मॉनिटरिंग डिजिटल हुई और नीति निर्माण प्रक्रिया अधिक तकनीकी और पारदर्शी बनी। लेकिन राजनीति में तकनीकी दक्षता से ज़्यादा अहम होती है ‘संतुलन की कला’।
और यही जगह अक्सर सबसे नाजुक होती है — जहां नीति, अहंकार, और नियंत्रण की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं।राज्य और केंद्र के रिश्तों की दृष्टि से देखें तो यह बदलाव एक बड़े राजनीतिक ढांचे की दिशा भी दिखाता है। केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार चाहती है कि राज्य सरकारें नीतिगत और प्रशासनिक स्तर पर पार्टी की कार्यशैली से मेल खाती रहें। इसलिए ऐसे अधिकारी जो स्वतंत्र निर्णयों के लिए जाने जाते हैं, उन्हें कभी-कभी स्थानांतरण के रूप में संकेत मिल जाता है कि “नीति की एकरूपता ज़रूरी है।”
अब सभी की निगाहें इस पर होंगी कि नया मुख्य सचिव कौन बनता है और वह किस प्रकार की कार्यशैली लाता है। क्या यह बदलाव मुख्यमंत्री को अधिक नियंत्रण देगा या प्रशासनिक प्रक्रिया को धीमा करेगा — इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा।राजस्थान की राजनीति में यह बदलाव आने वाले समय की दिशा तय करेगा।
सुधांश पंत की विदाई यह साफ़ करती है कि राजनीति में शक्ति का असली केंद्र वही होता है जिसके पास अंतिम निर्णय की कलम होती है। और यह कलम अब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के हाथों में पूरी तरह लौट चुकी है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय राजनीति में अफसरशाही और सत्ता के बीच की खींचतान केवल पदों की लड़ाई नहीं, बल्कि नियंत्रण और पहचान की जंग होती है। और हर बार विजेता वही होता है, जिसके पास जनता का जनादेश और राजनीतिक इच्छा-शक्ति दोनों मौजूद हों।





No Comment! Be the first one.