आर्थिक झटका और आगे की राह
रत-अमेरिका व्यापारिक रिश्ते तनावपूर्ण मोड़ पर पहुंच गए हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प ने 27 अगस्त से भारत के निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है, जिससे वस्त्र, आभूषण और समुद्री भोजन उद्योगों पर...

अमेरिका के दंडात्मक टैरिफ़ के लिए तैयार भारत
राजस्थान टुडे,
न्यूज डेस्क
पिछले दो दशकों में भारत और अमेरिका ने रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और निवेश जैसे क्षेत्रों में अच्छी प्रगति की है। यह सहयोग दोनों को एक-दूसरे के लिए अहम साझेदार भी बनाता रहा, लेकिन इसी माह यह रिश्ते अचानक तनावपूर्ण हो गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के निर्यात पर पचास प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ़ का ऐलान कर आर्थिक हलकों में हलचल मचा दी। यह कदम सिर्फ़ व्यापारिक असहमति का परिणाम नहीं है, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिकी चुनावी राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी व्यापक वैश्विक परिस्थितियों का मिला-जुला असर है।
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गत वर्ष अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य रहा था। लगभग 87 अरब डॉलर का माल भारत ने अमेरिका को बेचा, जो कुल निर्यात का करीब 18 प्रतिशत था। ऐसे में दंडात्मक टैरिफ़ का सीधा असर उन क्षेत्रों पर होगा, जो अमेरिका के बाज़ार पर सबसे अधिक निर्भर हैं। वस्त्र और परिधान उद्योग को गहरा धक्का लगेगा, क्योंकि इस क्षेत्र में बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को बढ़त मिल जाएगी। समुद्री भोजन निर्यात प्रभावित होने से तटीय राज्यों की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है, जबकि पहले से ही वैश्विक मंदी से जूझ रहे सूरत व मुंबई के आभूषण उद्योग पर भी दबाव बढ़ेगा। सिर्फ फ़ार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों को आंशिक राहत मिल पाई है। विशेषज्ञों की मानें तो इतने भारी शुल्क के बाद भारतीय उत्पादों का अमेरिकी बाज़ार में प्रतिस्पर्धा में बने रहना कठिन होगा।
ऐसा अनुमान है कि भारत की वृद्धि दर 70 से 100 आधार अंकों तक घट सकती है और विकास दर 6 प्रतिशत से नीचे आ सकती है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसी एस एंड पी के अनुसार, भारत की जीडीपी का लगभग 1.2 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर प्रभावित होगा। इससे नौकरियों पर संकट खड़ा हो सकता है। वस्त्र, आभूषण और समुद्री भोजन जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों में पहले से ही ऑर्डर रद्द होने लगे हैं, जिससे असुरक्षा बढ़ रही है।
इस विवाद की वजह भारत द्वारा रूस से तेल ख़रीदना है। अमेरिका का आरोप है कि भारत सस्ता रूसी तेल खरीदकर मास्को को युद्ध जारी रखने में मदद कर रहा है और इस तरह “रूस का वैश्विक क्लियरिंगहाउस” बन गया है। हालांकि भारत ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट कहा है कि भारत की खरीद ने वैश्विक तेल बाज़ार को स्थिर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है और यही तेल अमेरिका और यूरोप भारत से परिष्कृत रूप में ख़रीद रहे हैं। साथ ही यह आलोचना महज़ दोहरे मानदंड का प्रतिबिंब है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और घरेलू ऊर्जा मांग पूरी करने के लिए सस्ता रूसी तेल उसके लिए आवश्यक है। अमेरिका चाहता है कि भारत पश्चिमी प्रतिबंधों का पालन करे, जबकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने पर अडिग है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच वार्ता लंबे समय से अटकी हुई है। इस पर घरेलू राजनीति का दबाव भी है। अमेरिका में कृषि और डेयरी लॉबी भारत में बाज़ार पहुंच चाहती है और चुनावी वर्ष में राष्ट्रपति ट्रम्प का सख़्त रुख़ अपनाना “अमेरिकी हितों की रक्षा” के संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं भारत में प्रधानमंत्री मोदी किसानों के वोट बैंक को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते और कृषि-डेयरी पर कोई समझौता नहीं करना चाहते।
भारत ने इस संकट से निपटने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। एक ओर वह ब्रिक्स साझेदारी को मज़बूत कर डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं रूस के साथ द्विपक्षीय व्यापार बाधाएं कम करने पर सहमति बनी है। चीन के साथ भी रिश्ते सुधारने की कोशिश की जा रही है, भले ही सीमा विवाद अब भी कायम है। घरेलू स्तर पर सरकार ने 2.8 अरब डॉलर का निर्यात सहायता पैकेज और उपभोक्ता मांग को बढ़ाने के लिए कर कटौती जैसी पहलें की हैं।
आगे के परिदृश्य तीन तरह के हो सकते हैं। पहला, टकराव गहराता है और दोनों देश एक-दूसरे पर प्रतिशोधी टैरिफ़ लगाते हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित होती है। दूसरा, सीमित समझौते के तहत कृषि और डेयरी पर कुछ रियायतें दी जाती हैं और अमेरिका आंशिक रूप से टैरिफ़ हटाता है। तीसरा और सबसे व्यावहारिक विकल्प है कि भारत निर्यात का विविधीकरण करे और यूरोप, अफ्रीका व एशिया-प्रशांत की ओर अधिक झुके, जिससे मध्यम अवधि में अधिक आत्मनिर्भर बने।
इतिहास गवाह है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक विवाद नए नहीं हैं। 1990 के दशक में बौद्धिक संपदा और औषधियों को लेकर बड़े मतभेद हुए थे। 2019 में अमेरिका ने भारत को सामान्य तरजीही प्रणाली (जीएसपी) से बाहर कर दिया था। हर बार कूटनीतिक संवाद से समाधान निकला और रिश्ते आगे बढ़े। यह तथ्य मौजूदा संकट में भी उम्मीद जगाता है। इस टकराव का वैश्विक असर भी स्पष्ट है। वियतनाम, बांग्लादेश और मेक्सिको जैसे देश प्रतिस्पर्धा में आगे निकल सकते हैं। ग्लोबल साउथ में यह धारणा और गहराएगी कि अमेरिका व्यापार में राजनीति थोप रहा है। यूरोप स्वयं दुविधा में है क्योंकि वह भारत से परिष्कृत तेल ख़रीद रहा है।
आख़िरकार भारत और अमेरिका दोनों के पास खोने को बहुत कुछ है। अमेरिका भारत जैसे विशाल बाज़ार और रणनीतिक सहयोगी को खोना नहीं चाहेगा, वहीं भारत भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से टकराव का जोखिम नहीं उठा सकता। समाधान केवल संवाद, लचीलापन और संतुलन से संभव है। भारत को निर्यात विविधीकरण और आत्मनिर्भरता पर ध्यान देना होगा, जबकि अमेरिका को समझना होगा कि भारत अब केवल सहयोगी नहीं बल्कि समान साझेदार है। इस संकट का सकारात्मक पहलू यह है कि भारत अपनी आर्थिक कूटनीति और रणनीतिक स्वायत्तता को और मज़बूत करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।






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