रुपया बनाम डॉलर: भारत की वैश्विक मुद्रा रणनीति
भारत ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना के साथ एक ऐसी विश्व व्यवस्था की ओर अग्रसर है, जिसमें एकमात्र मुद्रा का प्रभुत्व नहीं, बल्कि बहुध्रुवीयता और न्याय संगत लेनदेन को महत्व मिले। रुपया इस यात्रा में...

अमेरिका की चिंता और भारत की चतुर रणनीति
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
“भारत का डिजिटल भुगतान मॉडल और रुपये को वैश्विक व्यापार में शामिल करने की नीति विकासशील देशों के लिए प्रेरणा है।”
— क्रिस्टालिना जॉर्जीवा, आईएमएफ प्रमुख, जी-20 सम्मेलन 2024
दशकों से वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व रहा है, लेकिन अब यह एकाधिकार चुनौती के घेरे में है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और डिजिटल नवाचार में उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है। अब रुपये को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के निर्णायक प्रयास कर रहा है। जून 2025 तक की घटनाएं इस बदलाव की ठोस मिसाल हैं।
देखें पूरा अंक..
राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
ब्रिक्स भुगतान नेटवर्क में भारतीय तकनीक
जून 2025 की ब्रिक्स बैठक में ‘ब्रिक्स भुगतान नेटवर्क’ के पहले चरण का उद्घाटन हुआ, जिसमें भारत की यूपीआई तकनीक को केंद्रीय भूमिका दी गई। भारत ने सदस्य देशों से आग्रह किया कि आपसी व्यापार का कम से कम 25 प्रतिशत भुगतान स्थानीय मुद्राओं में किया जाए। इस प्रस्ताव को रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका का समर्थन मिला। अप्रैल 2025 में भारत ने इंडोनेशिया और थाईलैंड के साथ रुपये में व्यापार के लिए सहमति-पत्रों पर हस्ताक्षर किए। वहीं, ‘इंडिया-अफ्रीका समिट 2025’ में 17 अफ्रीकी देशों ने भारत के डिजिटल ढांचे से जुड़ने और रुपये को अपनाने की इच्छा जताई।
नीतिगत नींव और तकनीकी शक्ति
भारत का यह रुख अचानक नहीं, बल्कि एक योजनाबद्ध रणनीति का परिणाम है। जुलाई 2022 में रिजर्व बैंक आफ इण्डिया ने विशेष रुपया वोस्ट्रो खाता (एसआरवीए) प्रणाली लागू की, जिससे रूस, श्रीलंका, नेपाल, मॉरीशस और जर्मनी से रुपये में व्यापार संभव हुआ। खासतौर पर रूस से 2023 में भारत ने 45 प्रतिशत तेल का आयात रुपये में किया। भारत और यूएई के बीच 2023 में रुपये-दिरहम व्यापार समझौता भी एक मील का पत्थर साबित हुआ। डिजिटल रुपया (सीबीडीसी) के आगमन ने इस दिशा को और गति दी है।
अंतर्विरोध और अवसर
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 2024 आंकड़ों के अनुसार रुपये की अस्थिरता दर 3.6 प्रतिशत है, जो वैश्विक निवेशकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। भारत एसडीआर टोकरी में रुपये को शामिल करने के प्रयास कर रहा है। इसके लिए तकनीकी दक्षता के साथ-साथ पारदर्शिता और नियामकीय मजबूती की आवश्यकता है। यह प्रयास केवल मुद्रा प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि ‘विचार बनाम वर्चस्व’ की टक्कर है। भारत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के पक्ष में है, जहां आर्थिक प्रभुत्व नहीं, समावेशी विकास और साझी समृद्धि प्राथमिकता हो।
सकारात्मक परिणाम
डॉलर निर्भरता में कमी
– डॉलर की मजबूती अक्सर भारत जैसे देशों की आयात लागत और मुद्रास्फीति को प्रभावित करती है। रुपये में व्यापार से इस असंतुलन में कमी आ सकती है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटेगा
– जब लेन-देन रुपये में होंगे, तो भारत को डॉलर जैसे बाहरी मुद्रा भंडार की उतनी ज़रूरत नहीं होगी, जिससे मुद्रा भंडार का प्रबंधन अधिक कुशल होगा।
डिजिटल भुगतान और तकनीकी नेतृत्व
– यूपीआई और डिजिटल रुपया जैसे मॉडल के प्रसार से भारत दुनिया को सुरक्षित, तेज़ और सस्ती भुगतान प्रणाली उपलब्ध कराने वाला अग्रणी बन सकता है।
कूटनीतिक प्रभाव में वृद्धि
– मुद्रा स्वीकृति का सीधा संबंध राष्ट्र की साख और प्रभाव से होता है। रुपया को यदि क्षेत्रीय या वैश्विक मुद्रा का दर्जा मिलता है, तो भारत की कूटनीतिक पकड़ मजबूत होगी।
विकासशील देशों को वैकल्पिक मॉडल
– भारत का यह मॉडल अन्य विकासशील देशों के लिए प्रेरणा बन सकता है, जो डॉलर आधारित एकाधिकार से परेशान हैं।
नकारात्मक परिणाम
विनिमय दर अस्थिरता का खतरा
– रुपये की अस्थिरता (3.6 प्रतिशत) अभी भी चिंता का विषय है। यदि वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ेगी, तो यह अस्थिरता और अधिक आर्थिक झटकों का कारण बन सकती है।
अमेरिका जैसे देशों की प्रतिक्रिया
– डॉलर को चुनौती देना अमेरिका के लिए भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा हो सकता है। इसके चलते भारत को अप्रत्यक्ष आर्थिक या कूटनीतिक दबाव झेलना पड़ सकता है।
वैश्विक व्यापारिक जाल में जटिलता
– एकीकृत वैश्विक प्रणाली में स्थानीय मुद्राओं की बहुतायत व्यापारिक प्रक्रिया को जटिल बना सकती है, विशेषकर बहुपक्षीय व्यापार में।
भरोसे और पारदर्शिता की चुनौती
– जब तक भारतीय बैंकिंग प्रणाली और नियामक ढांचा अंतरराष्ट्रीय मानकों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता, तब तक वैश्विक निवेशक और देश संकोच कर सकते हैं।
चीन की प्रतिस्पर्धा
– चीन अपनी मुद्रा युआन (आरएमबी) को पहले ही वैश्विक बनाने में जुटा है। भारत को एक समानांतर प्रयास के लिए अधिक सजग और रणनीतिक होना होगा, जिससे कहीं यह संघर्ष न बन जाए।
नई मुद्रा राजनीति की भूमिका में भारत
रुपये की वैश्विक उड़ान अभी प्रारंभिक है, लेकिन भारत जिस संयमित वैचारिक दृष्टिकोण, तकनीकी कौशल और नीति संतुलन के साथ आगे बढ़ रहा है, वह इसे सिर्फ मुद्रा नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व के प्रतीक के रूप में स्थापित कर सकता है। यह प्रतिस्पर्धा महज़ डॉलर को चुनौती देने की नहीं, बल्कि एक न्यायसंगत और बहुध्रुवीय वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के निर्माण की है, जिसमें भारत की भूमिका अब परिधि की नहीं, केंद्र की है।
वैश्विक मंचों से मिले समर्थन
“भारत की मुद्रा नीति ने व्यापार को लोकतांत्रिक बनाने की दिशा दिखाई है।”
– अलेक्सेई ओवेरचुक, रूस
“भारत इस विचार का नेतृत्व कर रहा है कि हम डॉलर के बिना भी व्यापार कर सकते हैं।”
– लूला डा सिल्वा, ब्राज़ील
“डिजिटल रुपया अफ्रीका के लिए आदर्श बन सकता है।”
– नाना अकुफो-अड्डो, घाना
“डॉलर विकल्प का प्रयास पारदर्शी हो, तो यह सहयोग योग्य है।”
– जेनेट येलेन, अमेरिका






No Comment! Be the first one.