ट्रम्प का डॉलर डिवेल्यूएशन का डर्टी प्लान!
एक तरफ अपना एक्सपोर्ट को बढ़ाने के लिए उत्पाद आधारित नौकरियां पैदा करने का बोझ ट्रम्प पर है, दूसरी ओर वे ये भी नहीं चाहते हैं कि ब्रिक्स देश डॉलर के अलावा अन्य भुगतान के विकल्प पर...

मनोज वर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
मार्च के तीसरे सप्ताह में खबर आई कि रुपए ने डॉलर के विरुद्ध बड़ी छलांग लगाई हैं। इस साल रुपए ने डॉलर के मुकाबले उच्चतम स्तर हासिल कर लिया। एक मार्च को डॉलर का मूल्य 87.47 था, जो 21 मार्च को 85.97 हो गया। अब सवाल इस बात का है कि ट्रम्प के टैरिफ टेरर, सोने में तेजी के बीच ऐसा क्या हो गया कि डॉलर कमजोर हो गया। जबकि दूर- दूर तक डॉलर के कमजोर होने के कोई संकेत नहीं थे। क्या अमेरिका खुद ही डॉलर की मजबूती से परेशान है? अमेरिकी व्यवस्था को कमजोर डॉलर पंसद है? ऐसे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। कुछ बड़े अर्थशास्त्री पहले ही आशंका जता चुके हैं कि ऐसा संभव है कि आने वाले समय में अपना एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए अमेरिका खुद डॉलर को गिराएगा। दुनिया भर में ऐसी कई रिपोर्ट्स आई है कि अमेरिका चाहता है कि उसके डॉलर का डिवेल्यूएशन हो। डॉलर के इस खेल में कई पेच हैं। एक तरफ अपना एक्सपोर्ट को बढ़ाने के लिए उत्पाद आधारित नौकरियां पैदा करने का बोझ ट्रम्प पर है, दूसरी ओर वे ये भी नहीं चाहते हैं कि ब्रिक्स देश डॉलर के अलावा अन्य भुगतान के विकल्प पर सोचें। इसको लेकर धमाकने से भी ट्रंप नहीं चूके। कुल मिलाकर अमेरिका की अनिश्चितता सभी के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं।
बाॅण्ड की रेट को कम करना ही मकसद
दरअसल जब महंगाई के साथ ब्याज दर को कम नहीं किया जा सकता, उस समय डॉलर को गिराने का तरीक़ा सिर्फ़ टैरिफ़ बचता है। इस खेल को देखेंगे तो साफ़ दिखेगा कि किस तरह से टैरिफ़ एक रूप से इंफ़्लेशनरी है और दूसरी और से डिफ़्लेशनरी। ट्रम्प शेयर मार्केट को जब तक नहीं गिराते, तब तक ट्रेज़री बॉण्ड की रेट कम नहीं हो सकती। दस साल के बॉण्ड की रेट को कम करना ही एक मात्र मक़सद है। इससे ही सरकार को सस्ता डेब्ट मिलेगा और उस से डेब्ट स्पायरलिंग से बचा जाएगा। जब इंटरेस्ट रेट 4 प्रतिशत से कम आएगी तो शेयर मार्केट निचले स्तर पर होगा, सोना आसमान छुएगा। इस तरह की गणित से ही ट्रम्प फिर डॉलर को उच्चतम स्तर पर ले जाएंगे। इस खेल के पीछे अमेरिकी इंडस्ट्रीयल मिलिट्री कम्पलेक्स है, जिसके कहे अनुसार ट्रम्प चल रहे हैं। हो सकता है कि कम अवधि के इस खेल से भारत को फायदा हो और हम इसे अपनी नीति की जीत मान लें, लेकिन यह अस्थाई विकल्प ज्यादा लाभ नहीं लेने देगा।
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अमेरिकी आर्थिक व्यवस्था से जुड़ी एक रिपोर्ट कहती है कि मजबूत अमेरिकी डॉलर न केवल अमेरिका की वित्तीय ताकत का प्रतीक रहा है, बल्कि मुद्रास्फीति को कम रखने में भी मदद करता है। इससे वहां विदेशी निवेश प्रोत्साहित होता है। लेकिन टैरिफ बदलाव के साथ ट्रम्प के सलाहकार उनकी संरक्षणवादी व्यापार नीति की सहायता के लिए डॉलर को कमजोर करने के तरीकों की तलाश कर रहे हैं। क्योंकि मजबूत डॉलर अमेरिकी उत्पादों को विदेशों में अधिक महंगा बनाता है। अन्य देशों के उत्पादों के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है। ट्रम्प टैरिफ टेरर से अमेरिका का एक्सपोर्ट बढ़ाना चाहते हैं। ऐसे में अमेरिकी उत्पादों के लिए बाजार में सस्ता होना भी जरूरी है। इसमें कमजोर डॉलर की नीतियां अमेरिकी उत्पादों की सहायता कर सकती हैं। लेकिन दूसरा तथ्य यह है कि अमेरिका को वस्तु व्यापार में घाटा होता है, लेकिन सर्विसेज में वह शुद्ध लाभ कमा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि ट्रम्प के नारे अमेरिका को फिर महान बनाना है, के अनुरूप देश में नौकरियों के सृजन में उत्पाद व्यवस्था को मजबूत बनाकर एक्सपोर्ट बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन ट्रम्प ने अपने आर्थिक सलाहकार के रूप में स्टीफन मिरन को नामित किया हैं। जो अपने शोध में ऐसे तथ्यों को परिभाषित कर चुके हैं, जो दर्शाते हैं कि अमेरिका के लिए डॉलर की मजबूती भी बोझ हैं। बहरहाल भारतीय अर्थशास्त्री भी इस पर निगाएं जमाए बैठे हैं। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुरामन एक आलेख में लिख चुके हैं कि डॉलर की स्वीकार्यता घटती है तो यह उनके लिए बोझ बन जाएगा, लेकिन कोई अमेरिकी ऐसा नहीं चाहेगा।
इसलिए जन्म ले रही है आशंकाएं
अमेरिका में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में भी व्यापारिक घाटे से अमेरिका जूझ रहा था। उस दौर में 1980 में डॉलर बहुत मजबूत था। व्यापार घाटे को ठीक करने के लिए रीगन ने प्लाजा समझौते के माध्यम से डॉलर के डिवेल्यूशन पर काम किया। उस दौर में डॉलर में 40 फीसदी तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। यह समझौता सितंबर 1985 में, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और पश्चिम जर्मनी के बीच हुआ था। जिसमें पांच साल में डॉलर के 50 फीसदी बढ़ने पर अन्य करेंसी की वेल्यू मैनेज करने पर सहमति हुई थी। इससे डॉलर के मूल्य गिर गए थे। अमेरिका के एक्सपोर्ट में वृद्धि हुई थी। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि तब और अब की परिस्थितियां एक सी नहीं है। ऐसे विकल्प अर्थवयवस्था को डांवाडोल कर सकते हैं।






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