परम्पराओं की लौ से रोशन मेवाड़
मेवाड़ की धरती केवल इतिहास की गवाही नहीं देती, बल्कि परम्पराओं की आत्मा भी संजोए हुए है। यह वह भूमि है जहां हर त्योहार एक कहानी सुनाता है— आस्था, सादगी और लोक संस्कारों की कहानी। दीपावली जब आती है,...

मधुलिका सिंह,
पत्रकार व लेखिका
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यहां दिवाली पर बिकते हैं होली के रंग, बिना बिजली जगमगाते हैं घर-आंगन। उदयपुर जिले के आदिवासी बहुल इलाके कोटड़ा की दीपावली बाकी दुनिया से अलग है। यहां चकाचौंध नहीं, बल्कि मिट्टी की सादगी का उजाला दिखता है। दीपावली से पूर्व कोटड़ा के सदर बाजार में रंगों की बिक्री होती है। ये जानकर आपको आश्चर्य होगा, लेकिन ये सच है। दरअसल, दीपावली के एक दिन बाद मनाए जाने वाला खेंखरा पर्व के लिए ये खरीदारी की जाती है। सैकड़ों रंगों की स्टॉलें सजी होती हैं— लाल, पीला, हरा, नीला, सुनहरा। पर ये रंग घर सजाने के लिए नहीं, बल्कि मवेशियों को सजाने के लिए खरीदे जाते हैं। आदिवासी परिवार अपने पशुओं को देवता मानते हैं। वे मानते हैं कि मवेशी ही उनकी आमदनी का आधार और जीवन का साथी हैं।
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इसलिए दिवाली पर सबसे पहले उन्हीं का शृंगार किया जाता है— सींगों पर रंग चढ़ाए जाते हैं, शरीर पर “छापे मांडी” जाती हैं, और गले में चमकीले बेड़े बांधे जाते हैं। शाम तक पूरा कोटड़ा घंटियों और खुशियों से गूंज उठता है। वहीं दिवाली के पांचों दिन रात को जब मिट्टी के दीये जलते हैं, तो बिना बिजली वाला यह इलाका भी सबसे ज्यादा उजला दिखता है। यहां चाइनीज लाइटें नहीं बिकतीं, क्योंकि कई गांव अब भी बिजली से वंचित हैं। फिर भी, मिट्टी के दीयों की लौ और लोगों के चेहरे की मुस्कान इस अंधेरे को हमेशा मात दे देती है।
यहां होती है बैलों की दौड़, गोवर्धन पूजा की अनूठी परम्परा
मेवाड़ के ही वल्लभनगर क्षेत्र में दीपावली के बाद वाला दिन खेंखरा विशेष महत्व रखता है। यहां इस दिन बैलों की दौड़ आयोजित करने की परम्परा पीढ़ियों से चली आ रही है। इसे किसानों की दीपावली का दिन माना जाता है। गांव के चौक या खेतों में सुबह से ही लोग इकट्ठा होने लगते हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे बैल, उनके माथे पर टीका और सींगों पर चमकीले रंग— मानो सज-धज कर उत्सव का हिस्सा बनते हैं। गांव के युवक अपने- अपने बैलों को दौड़ाने की तैयारी करते हैं। ढोल-ढमाकों और लोकगीतों के बीच जब दौड़ शुरू होती है, तो पूरा मैदान उत्साह और जोश से भर जाता है। यह परम्परा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति का सम्मान है। गांव वाले मानते हैं कि इस दिन बैलों की पूजा और दौड़ उनके स्वास्थ्य, शक्ति और खेतों की समृद्धि के प्रतीक हैं। इस आयोजन के बाद सामूहिक भोजन और लोकनृत्य होता है और खेंखरे का यह दिन पूरे इलाके में आनंद और अपनत्व का पर्व बन जाता है।
यहां थाली बजाकर लक्ष्मी के स्वागत की परम्परा
दीपावली पर उदयपुर शहर में भट्टमेवाड़ा समाज की महिलाएं भी खेंखरे की सुबह एक अनोखी रस्म निभाती हैं। वह रस्म है थाली बजाकर लक्ष्मी का स्वागत करने की। भोर होते ही महिलाएं उठकर घर की सफाई करती हैं। फिर दीपक और थाली लेकर घर के बाहर निकलती हैं, कचरा एक तय स्थान पर डालती हैं, वहां दीपक जलाती हैं और थाली बजाती हुई कहती हैं—
“लक्ष्मी आई, लक्ष्मी आई!”
इसके बाद वे घर लौटकर हर कमरे में थाली बजाती हैं— ताकि घर के हर कोने में देवी लक्ष्मी का आगमन हो। इस रस्म के बाद महिलाएं स्नान कर महालक्ष्मी मंदिर में दर्शन करने जाती हैं। यह परम्परा आज भी वैसी ही जीवित है। उदयपुर के कई समाजों में महिलाएं इस दिन बिना झाड़ू-पोंछा लगाए घर की दहलीज और जलस्रोतों पर दीपक जलाती हैं। मान्यता है कि इस समय देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जहां उजाला होता है, वहां उनका आशीर्वाद ठहरता है।






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