जागे मन का आलोक
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में त्रिगुण सिद्धांत दिया है। इसे गुण डायनामिक्स मॉडल भी कहते हैं। एस का अर्थ है सात्विक, आर अर्थात राजसिक और टी अर्थात तामसिक। इस सिद्धांत के अनुसार तमस से प्रेरित...

डॉ. गौरव बिस्सा,
मोटिवेशनल स्पीकर, जीवन प्रबंध प्रशिक्षक
– क्या आप सदा अपने मित्र बंधुओं में बुराइयां या हर चीज़ का चीज़ का नकारात्मक पक्ष ढूंढते रहते हैं?
– क्या आप सोचते हैं कि “येन केन प्रकारेण” धन का अर्जन और वर्धन करना ही जीवन है?
– क्या आप अन्यों को परेशानी में देख कर अन्दर ही अन्दर आनंदित होते हैं?
– क्या आप सदा यह जताने में लगे रहते हैं कि “मैं हूं और मैं बहुत कुछ हूं?”
यदि इन प्रश्नों का उत्तर हां है तो निश्चित रूप से “तमस” प्रेरित मनुष्य हैं। तमस का अर्थ है अंधकार। सिर्फ धन कमाने की सोचना, दूसरों को पीड़ा देना, अहंकारी होने आदि से तात्पर्य है कि आप मानुष राक्षस ही हैं। आपमें सिर्फ तामसिक या राक्षसी प्रवृत्तियां विद्यमान हैं। मन में छिपी आसुरी प्रवृत्तियों के अंधकार को अपने अंतर्मन के ज्ञान रूपी दीपक की रोशनी से समाप्त करना ही दीपावली है।
सम्पूर्ण दीपावली विशेषांक देखें-
Online Flipbook
एसआरटी या त्रिगुण सिद्धांत
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में त्रिगुण सिद्धांत दिया है। इसे गुण डायनामिक्स मॉडल भी कहते हैं। एस का अर्थ है सात्विक, आर अर्थात राजसिक और टी अर्थात तामसिक। इस सिद्धांत के अनुसार तमस से प्रेरित तामसिक मनुष्य अत्यंत अहंकारी, अज्ञानी और निम्न स्तरीय होते हैं। इसे मानसिक तमस भी कहा जा सकता है। भीतर के तमस को नष्ट करके सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश फैलाना ही शायद वास्तविक दीपावली है। राजसिक गुणों से युक्त व्यक्ति अहम् प्रधान, राजा जैसे शक्ति बढ़ाने वाले गुणों से युक्त होते हैं। त्रिगुण सिद्धांत हमें सतोगुणी अर्थात सात्विक व्यक्ति बनने का सन्देश देता है। सात्विक व्यक्ति संग असंग के असर से मुक्त, अहंकार से रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त, और सभी विकारों से दूर होता है। सात्विक करता बनना ही दीपावली का उद्देश्य है।
अंतस का आलोक
शास्त्रों के अनुसार ज्ञान ही प्रकाश है। हमारे भीतर अज्ञान का, अहंकार का, मोह का, तमस या अंधकार छाया हुआ है। यह अंदर का मैल या कालिमा हमें उत्तम मनुष्य या सात्विक व्यक्ति बनने से रोकती है। इसे दूर करना ही जीवन माना गया है। इस अवस्था में आवश्यकता अंतर्मन के ज्ञान को जगाकर तामसिक के स्थान पर सात्विक व्यक्ति बनने की है। जब सात्विक गुण आता है तो ज्ञान का प्रकाश फैलता है और उसी पल अज्ञान, अहं, ईर्ष्या, जलन और बुराई स्वतः नष्ट हो जाती है। ज्ञान का दीपक या अंतर्मन के ज्ञान का पुंज जलने से लोभ, मोह, आसक्ति और अनैतिक आचरण जैसे तामसिक गुण स्वतः नष्ट हो जाते हैं। दीपावली का वास्तविक मर्म बाहर करोड़ों दीपक जलाना मात्र नहीं है। दीपावली का वास्तविक मर्म है अन्दर के प्रकाश का जागरण। अंदर का प्रकाश ही तो ईश्वरीय तत्त्व है। इसका अर्थ है कि अंतर्मन के ईश्वरीय भाव को प्रकट कर उत्तम बनना ही वास्तविक दीपावली है।
मन का दीपक बाळ;
ज्योति अन्दर की जागे तो
मिटे जगत अंधियार,
मन का दीपक बाळ।
दीपावली और आभासी दुनिया
आभासी दुनिया या सच पूछो तो इस वर्चुअल वर्ल्ड ने संपर्क तो बढ़ाया है, लेकिन हृदय के मानवीय रिश्तों को कम भी किया है। दीपावली पर होने वाला मेल- जोल कम हो चुका है। जिससे कोई काम नहीं है उससे मिलना बेमानी होता प्रतीत हो रहा है। सोशल मीडिया पर संदेशों की बाढ़ है। हम दिन से लेकर रात तक सोशल मीडिया द्वारा एक दूसरे को शुभकामना देने में व्यस्त हैं। यह वास्तविक व्यस्तता नहीं है। यह छद्म व्यस्तता है। यह खुद से लड़ाई है, खुद से होने वाला द्वंद्व है। अंतर्मन बार- बार कह रहा है कि सोशल मीडिया फेसबुक पर क्या लिखते हो, ज़रा फेस-टू-फेस मिलो तो सही! तभी अहंकार आड़े आता है। अहंकार को कम कीजिये जनाब वरना अकेले ही रह जाएंगे।
मिर्ज़ा ग़ालिब कहते हैं:
मसरूफ रहने का अंदाज़, तुम्हें तन्हा न कर दे ग़ालिब,
रिश्ते फुर्सत के नहीं, तवज़्ज़ो के मोहताज़ होते हैं।
अब दुनिया एक स्क्रीन और अंगूठे तक सीमित है। किसी से कोई मतलब नहीं। एक अकेला बुज़ुर्ग है और उसे भी सन्देश मिल रहा है कि आप सभी को, आपके परिवार को शुभकामना। कोई कस्टमाइज्ड मैसेज नहीं। ऐसी भी क्या व्यस्तता? सोशल मीडिया पर फोटो डालने की प्रतियोगिता है। लक्ष्मी पूजन, गोवेर्धन पूजा, यम द्वितीया के महत्त्व से ज़्यादा ज़रूरी हो चला है स्टेटस अपडेट और डिस्प्ले पिक्चर! ये मनोरोग का संकेत है।
क्या कहता है शोध?
जर्नल ऑफ़ ग्लोबल इन्फॉर्मेशन मैनेजमेंट और सिडनी यूनिवर्सिटी की रिसर्च के अनुसार सोशल मीडिया पर होने वाली फ़ोटोज़, डिस्प्ले पिक्चर और स्टेटस की प्रतियोगिता; अवसाद, उत्पीड़न, साइबर बुलिंग, और आत्महत्या की प्रवृत्तियों तक के लिए उत्तरदायी है।
त्यौहार और मेल मिलाप
त्यौहार खुल के मनाइये। जज़्बात के साथ मनाइये। प्रत्येक जानकार से फेस-टू-फेस मिलिये। उनके परिवार का हाल पूछिये। समाज के उस व्यक्ति से मिलिये जो आपकी सेवा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। और तो और, ज़रा खुद से भी मुलाक़ात कीजिये। स्वयं को जानिये। उत्सव मनाने का कोई मौक़ा न चूकिये। यही जीवन है।






No Comment! Be the first one.