मेरे दीयों से रौशन सभी, मेरे घर अंधेरा क्यों?
मैं वह हाथ हूं जिसने आपके घर की दीपावली सजाई। मेरे बनाए लाखों दीयों ने आपके शहर को जगमग कर दिया। पर जब त्योहार की रात आई, तो मैंने देखा, मेरे घर के दरवाज़े पर सिर्फ़ मेरी ही थकी हुई छाया थी, और भीतर...

(एक श्रमिक की मार्मिक व्यथा)
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
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लोग मुझे जानते नहीं, पर मैं ही हूं, जिसने आपके घर में उजाला भरा है। मेरा नाम शायद आपको याद नहीं होगा, पर मेरी उंगलियों का स्पर्श आपके हर उत्सव में शामिल है। पिछले कई महीनों से, मैंने दिन-रात एक कर दिया। मेरे हाथों ने मिट्टी को गूंथा, उसे चाक पर चढ़ाया और एक-एक करके लाखों दीयों को आकार दिया। छोटे, बड़े, चौड़े, गहरे, रंगीन, हर तरह के दीये मेरी निगरानी में, मेरी मेहनत से बने। मेरी छोटी-सी कुटिया या नाम का कारखाना, जहां मैं काम करता हूं, वह हमेशा बिजली की तेज, सफ़ेद रोशनी में डूबी रहती थी। यह रोशनी इसलिए ज़रूरी थी ताकि दीयों में कोई कमी न रह जाए, ताकि हर दीया सही ढंग से पके और मज़बूत बने। मेरी हर सांस में मिट्टी की धूल भरी, मेरी आंखों ने लगातार उस तेज़, कठोर प्रकाश को सहा, और मेरे हाथों ने अनवरत काम किया, ताकि आप अपनी दिवाली धूमधाम से मना सकें।
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मैं जानता हूं, मेरे बनाए ये दीये बाज़ारों में कितनी शान से बिकते हैं। एक-एक दीया जैसे कोई छोटा-सा तारा हो। मैं जानता हूँ कि मेरी मेहनत का यह छोटा-सा टुकड़ा आपके घरों में प्रेम, समृद्धि और भाग्य का प्रतीक बनकर जाएगा। पर इस उत्पादन की भाग-दौड़ में मैंने अपने आपको पूरी तरह खपा दिया। मेरी उंगलियों में मिट्टी की खुश्की के अलावा कुछ नहीं बचा, मेरी पीठ अब सीधी नहीं हो पाती, और मेरी आंखों में अब हर वक़्त एक थकान का पर्दा पड़ा रहता है। मेरी मजबूरी यह है कि मालिक जो भी दाम देता है, मुझे उसी में काम करना पड़ता है, क्योंकि अगर मैं मना करूं तो मेरे पीछे लाइन लगी है काम करने वालों की। मैं फैक्ट्री की दूधिया, तेज़ रोशनी में काम करता रहा, और हर दीए में रोशनी भरता रहा, पर मुझे यह एहसास ही नहीं हुआ कि यह सारी रोशनी मुझे छोड़कर, मेरे ही हाथों से, कहीं और जा रही है, मेरे घर की ओर नहीं।
कर्ज़, थकान और टूटे सपने
और आज, वह रात आ गई है, दीपावली की रात। यह रात मेरे लिए काम ख़त्म होने की नहीं, बल्कि मेरी व्यथा के शुरू होने की रात होती है। मैं फैक्ट्री में अपनी आख़िरी, लंबी पाली पूरी करके बाहर निकलता हूं। शहर भर में पटाखों की गूंज है, हर तरफ़ पकवानों और मिठाइयों की सुगंध है। मेरी फैक्ट्री की बिजली अभी भी जल रही है, पर मैं जैसे ही उससे थोड़ा दूर होता हूं, मेरी कच्ची बस्ती का रास्ता और गहरा अंधेरा होता जाता है। मेरे पैर भारी हो चुके हैं और मन बोझिल। मैं जानता हूँ कि मेरे घर में मेरी पत्नी और बच्चों को मेरी राह देखते-देखते शायद आंख लग गई होगी।
जब मैं दरवाज़े पर पहुंचता हूं, तो दिल बैठने लगता है। भीतर सिर्फ़ एक छोटी-सी तेल की कुप्पी जल रही है, वह भी पत्नी ने पास के मंदिर या किसी पड़ोसी से थोड़ा-सा मांगकर जलाई होगी। मेरी बेटी पास के आंगन से आती रौशनी को टकटकी लगाए देख रही है। मेरा बेटा मुझे देखते ही मेरे गले से लिपट गया, और उसका पहला सवाल था, “बापू, हमारे लिए पटाखे क्यों नहीं लाए? और हमारे घर में बिजली की इतनी सारी रंगीन झालरें क्यों नहीं हैं, जैसा आपने बनाया था?” उसके सवाल मेरे कलेजे में तीर की तरह चुभते हैं। उस मासूम को कैसे समझाऊं कि जिस बिजली से ये झालर बनी हैं, उसके उत्पादन में मेरी पूरी जवानी खप गई, पर उस बिजली का बिल चुकाने की ताक़त मेरे पास नहीं है। उस बच्चे को कैसे बताऊं कि जिन हज़ारों दीयों को मैंने अपने हाथों से आकार दिया, उनमें से एक भी दीया अपनी मज़दूरी से खरीदने का पैसा मेरी जेब में नहीं बचा। मेरी सारी कमाई, जो मुझे बोनस के नाम पर मिली, वह पिछले महीने की बीमारी या छोटे-मोटे कर्ज़ को चुकाने में चली गई।
मेरी खुशियां छीनकर वे मना रहे हैं उत्सव
मुझे सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है, जब मैं मालिक के घर की ओर देखता हूं। उनके महलनुमा घर की हर खिड़की रौशन होगी। मेरे हाथों से बनाए दीयों की पंक्तियां उनके आंगन में सजी होंगी। वे लक्ष्मी-गणेश की पूजा कर रहे होंगे, ताकि उनका व्यापार और लाभ कई गुना बढ़ जाए। उस लाभ का सबसे बड़ा हिस्सा, जो मेरी अनवरत और कम दाम वाली मेहनत से पैदा हुआ है। मेरी आंखों की नींद और मेरी खुशी छीनकर, वे अपनी समृद्धि का उत्सव मना रहे हैं।
मैं मालिक की समृद्धि पर खुश हूं। पर इस रात, इस सबसे बड़े त्योहार की रात, मुझे यह सोचकर बहुत पीड़ा होती है कि मैंने पूरे देश को रौशन करने के लिए अपना जीवन खपा दिया, पर मुझे अपने बच्चों के चेहरों पर खुशी का एक छोटा-सा दीया जलाने का भी मौक़ा नहीं मिला। मेरे बच्चों की आंखों में जो खालीपन है, वह फैक्ट्री के मशीनी शोर से भी ज़्यादा भयानक सन्नाटा पैदा करता है। यह मेरे घर का अंधेरा, केवल तेल या दीये की कमी का अंधेरा नहीं है, यह मेरे अस्तित्व के मूल्य का अंधेरा है। यह मेरी गरीबी नहीं, बल्कि उस सामाजिक अन्याय की काली छाया है जो फैक्ट्री की तेज़ रोशनी के बावजूद मेरे जीवन पर पड़ती है। मेरा श्रम इतना सस्ता क्यों है कि मैं अपने श्रम का फल भी न खरीद सकूं?
एक पल को याद कर लेना मुझे
आज रात मैं अपनी झोपड़ी के अंधेरे में बैठा हूं। मैं बस इतना ही चाहता हूं। जब आप अपने घर में मेरा बनाया दीया जलाएं, जब उस दीये की रौशनी आपके परिवार को घेरे, तो बस एक पल के लिए याद कर लेना उस श्रमिक को, जिसने इसे बनाया। मुझे आपके दान की नहीं, मेरे श्रम के सही मूल्य की ज़रूरत है। मैं बस इतना चाहता हूं कि अगली दिवाली पर मेरे काम के बदले मुझे इतना मिल जाए कि मैं भी सम्मान से जी सकूं, अपने बच्चों को ठीक से पढ़ा सकूं, और हां, बाज़ार से थोड़े रंगीन बल्ब खरीदकर अपने घर को भी रौशन कर सकूं।
मैं उम्मीद करता हूं कि अगली दीपावली पर, जब मैं फैक्ट्री की रौशनी से बाहर निकलूं, तो मेरे घर के दरवाज़े पर मेरी अकेली थकी हुई छाया न खड़ी हो, बल्कि मेरे घर के अंदर से आती खुशी की रौशनी उसका स्वागत करे। तभी मेरा श्रम सार्थक होगा, और तभी देश का यह प्रकाश पर्व हम सबके लिए, बिना किसी छाया के, सचमुच शुभ होगा।






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