हर उजाले की वजह है घर की लक्ष्मी
सिर्फ घर नहीं, भावनाओं को भी चमकाने का नाम है दीपावली। महिलाएं इसे एक त्योहार नहीं, बल्कि घर के विकास का संकल्प बनाती...

पूनम अस्थाना,
लेखिका
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दीपावली भारत का सबसे उजला और उल्लासपूर्ण त्योहार है। लेकिन इस रोशनी के पीछे जो सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति होती है, वह अक्सर हमारे घर की महिलाएं होती हैं। वे न केवल इस पर्व को साज-संवार से जीवंत करती हैं, बल्कि इसके माध्यम से पूरे घर में सकारात्मकता, नई ऊर्जा और विकास की भावना भी भर देती हैं। दीपावली को ‘लक्ष्मी पूजन’ का पर्व कहा जाता है, लेकिन सच पूछा जाए तो हर घर में पहले से ही एक लक्ष्मी होती है, वह है घर की महिला। वही दीपावली से पंद्रह–बीस दिन पहले से अपने घर-आंगन को संवारने में जुट जाती है। पुराने कपड़े, बेकार सामान हटाती है, घर को नएपन से सजाती है। यह केवल सफाई नहीं होती, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया होती है, जैसे जीवन से नकारात्मकता को हटाकर उजाले के लिए जगह बनाई जा रही हो।
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एक मिशन है दीपावली की तैयारी
अक्सर देखा जाता है कि महिलाएं दिवाली से पहले हर छोटी चीज़ पर ध्यान देती हैं। परदे धोने से लेकर दीवारों की धुलाई, मंदिर की सफाई से लेकर दरवाजे पर बंदनवार तक। वे चाहती हैं कि लक्ष्मीजी के स्वागत में कोई कमी न रह जाए। इस तैयारी में उनका उत्साह केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के ‘विकास मिशन’ का हिस्सा होता है।
कई बार वे घर की जरूरतें पहचानती हैं, नए बर्तन, सजावट, या छोटे मरम्मत कार्यों का सुझाव देती हैं। यह सब ‘सौंदर्य’ से अधिक ‘समृद्धि’ की भावना से जुड़ा होता है।
धनतेरस की चमक और भावनाएं
धनतेरस के दिन जब महिलाएं चांदी या स्टील के बर्तन खरीदती हैं, तो यह केवल परंपरा नहीं होती, बल्कि यह विश्वास होता है कि ‘कुछ नया लाने’ से घर में ‘नया आरंभ’ होता है। उनके लिए वह बर्तन मात्र धातु नहीं, बल्कि शुभता और सुख-समृद्धि का प्रतीक होता है। इसी विश्वास के साथ वे घर की रसोई से लेकर पूजा तक सब कुछ नए जोश के साथ करती हैं।
स्वाद और स्नेह की मिठास
दीपावली के असली आनंद में पकवानों की खुशबू घुली होती है। महिलाएं इस त्योहार में तरह-तरह के पारंपरिक व्यंजन और मिठाइयां बनाती हैं। गुझिया, चकली, नमकीन, बेसन के लड्डू, शक्करपारे… ये केवल व्यंजन नहीं, बल्कि प्रेम की अभिव्यक्ति होते हैं।
जब रसोई से उठती खुशबू पूरे घर में फैलती है, तो उसमें मेहनत की नहीं, ममता की मिठास होती है। महिलाएं चाहती हैं कि दीपावली पर घर में आए हर मेहमान को अपनापन महसूस हो, और परिवार के चेहरे पर सच्ची मुस्कान झलके। यही वो पल हैं, जब दीपों के साथ-साथ रिश्तों में भी रौशनी भर जाती है।
दीपों के संग उज्जवल विचार
दीपावली की शाम जब घर के हर कोने में दीपक जलते हैं, तो महिलाओं की आंखों में जो चमक होती है, वह केवल रोशनी की नहीं, संतोष व सुकून की होती है। यह संतोष या सुकून होता है अपने परिवार को खुश और सुरक्षित देखने का।
वे जानती हैं कि सफाई, सजावट या पूजा की सटीकता से भी ज़्यादा जरूरी है ‘भावना की शुद्धता’। और यही शुद्ध भावना पूरे घर में उजाला फैलाती है। यही असली दीपावली है।
परिवार और समाज में उनकी भूमिका
आज के दौर में जब महिलाएं बाहर कामकाजी भी हैं, तब भी दीपावली पर वे अपनी दोहरी भूमिका निभाती हैं। ऑफिस की जिम्मेदारी के साथ घर की परंपरा भी निभाती हैं। उनका यह समर्पण बताता है कि भारतीय समाज में त्योहार केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक बंधन को मजबूत करने का माध्यम भी हैं।
भीतर से फैलती है रोशनी
दीपावली की असली रोशनी तभी सार्थक है जब वह भीतर से फैले। महिलाएं इस भीतर की रोशनी की वाहक हैं। वे ही घर में प्रेम, सामंजस्य और सकारात्मक सोच का दीप जलाती हैं।
उनके बिना दीपावली केवल दीपों की नहीं, बल्कि अधूरी रोशनी की दिवाली रह जाएगी।






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