दिमाग में रोशनी भरने का विज्ञान
क्या आप जानते हैं, आपका ध्यान-अभ्यास (मेडिटेशन) आपके दिमाग की बनावट को हमेशा के लिए बदल सकता है? हम घर में तो दीए जलाते हैं, पर क्या कभी हमने अपने दिमाग की करोड़ों छोटी बत्तियों को जलाने की कोशिश की...

गणपत सिंह मांडोली,
वरिष्ठ पत्रकार
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दीपावली का त्योहार हमें सिखाता है कि हमें अंधेरे को हटाकर रोशनी फैलानी चाहिए। हम हर साल घर के कोने-कोने में दीए जलाते हैं, ताकि किसी भी कोने में अंधेरा न रह जाए। पर क्या हमने कभी यह सोचने की कोशिश की है कि हमारे भीतर क्या चल रहा है? हमारा दिमाग, करोड़ों-अरबों छोटी-छोटी स्नायु-कोशिकाओं से बना है, जिन्हें हम बिजली के छोटे-छोटे बल्ब समझ सकते हैं। ये बल्ब आपस में तारों से जुड़े हैं और बिजली के संकेतों से बात करते हैं। जब ज़िंदगी में भाग-दौड़, तनाव और चिंता बहुत बढ़ जाता है, तो हमारे दिमाग में भी ‘अमावस्या’ छा जाती है, रोशनी कम और शोर ज़्यादा। यह वह स्थिति है जब हमें हर पल घबराहट, गुस्सा और बेचैनी महसूस होती है, और हम अंदर से अशांत रहते हैं।
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दिमाग़ के इस अंधेरे का सीधा संबंध हमारे ‘डर के बटन’ से है। हमारे दिमाग में एक हिस्सा होता है जो खतरे को पहचानता है, आप इसे ‘डर का अलार्म’ समझ लीजिए, जिसे वैज्ञानिक ‘भीति-ग्रंथि’ कहते हैं। जब तनाव बढ़ता है, तो यह अलार्म बिना किसी वजह के भी लगातार बजता रहता है, जैसे कोई अलार्म खराब हो गया हो। यह अलार्म हमारे शरीर में ‘तनाव वाले रसायन’ भर देता है, जिससे मन शांत नहीं रह पाता। यह हमारे मन का वह अंधेरा कमरा है, जहां शांति कभी नहीं टिकती और हम हर छोटी बात पर भड़कने लगते हैं। इसके साथ ही दिमाग का सबसे आगे वाला और सबसे समझदार हिस्सा होता है जो हमें सोचने, सही फैसला लेने और भावनाओं को संभालने में मदद करता है, आप इसे ‘समझदारी का स्विच’ समझिए। ज़्यादा तनाव में यह स्विच कमज़ोर पड़ जाता है। इसलिए हम छोटी-छोटी बातों पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं, गुस्सा करते हैं और सही निर्णय नहीं ले पाते। यह हमारी बुद्धि का टिमटिमाता दिया है, जो बुझने वाला है। इसके अलावा, जब मन में हमेशा नकारात्मक बातें चलती हैं, तो हमारे दिमाग के अंदर के तार (स्नायु-पथ) उलझ जाते हैं, जिससे याददाश्त, ध्यान और रचनात्मकता की बिजली ठीक से नहीं पहुंचती। सीधी बात यह है कि जब तक हम इस आंतरिक अंधेरे को दूर नहीं करेंगे, बाहर की रोशनी हमें सच्ची और टिकाऊ शांति नहीं दे सकती, इसीलिए हमें एक आंतरिक दीपोत्सव शुरू करने की ज़रूरत है।
ध्यान से दिमाग़ की मरम्मत
ध्यान (मेडिटेशन) कोई मुश्किल या रहस्यमयी काम नहीं है, बल्कि यह सिर्फ़ अपने दिमाग को समझदारी से इस्तेमाल करने का अभ्यास है। आधुनिक विज्ञान ने साबित कर दिया है कि ध्यान आपके दिमाग की बनावट और काम करने के तरीके को बिल्कुल बदल सकता है। दिमाग की इस कमाल की बदलने की ताक़त को वैज्ञानिक ‘दिमाग़ का लचीलापन’ कहते हैं। इसका मतलब है कि हमारा दिमाग किसी भी उम्र में, नए अनुभव और अभ्यास से अपनी बनावट और तारों को बदल सकता है। यह साबित करता है कि दिमाग कोई स्थिर पत्थर नहीं, बल्कि एक गूंथी हुई मिट्टी जैसा है, जिसे हम अपनी इच्छा से नया आकार दे सकते हैं। ध्यान-साधना इसी लचीलेपन का सबसे प्रभावी उपयोग है।
हार्वर्ड के वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि जो लोग कुछ हफ़्तों तक रोज़ ध्यान करते हैं, उनके दिमाग के कुछ ज़रूरी हिस्सों में ‘भूरा पदार्थ’ (ग्रे मैटर) बढ़ जाता है। यह भूरा पदार्थ मुख्य रूप से हमारे ‘समझदारी के स्विच’ (अग्र-प्रमस्तिष्क वल्कुट) में बढ़ता है। इससे हमारी सोचने, ध्यान लगाने और भावनाओं को काबू करने की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। यह ऐसा है जैसे हम अपनी समझदारी के दीए में सबसे शुद्ध तेल भर रहे हों, ताकि वह रौशनी देता रहे। वहीं दूसरी तरफ, डर के अलार्म (भीति-ग्रंथि) का आकार और काम करने का तरीक़ा शांत हो जाता है, क्योंकि ध्यान से तनाव वाले रसायन कम बनते हैं। इससे घबराहट, गुस्सा और डर अपने आप कम होने लगते हैं। यह बिल्कुल बजते हुए अलार्म को बंद करने जैसा है।
इसके अलावा, ध्यान हमारे दिमाग में नए और अच्छे तार जोड़ने का काम भी करता है। हमारे दिमाग में जैसे तार जुड़े होते हैं, हम वैसा ही सोचते और महसूस करते हैं। अगर हम हमेशा चिंतित रहते हैं, तो चिंता का तार बहुत मज़बूत हो जाता है। ध्यान हमें नए, शांति वाले और ख़ुशी वाले तार जोड़ने का मौक़ा देता है। ध्यान, दिमाग की कोशिकाओं के बीच के जोड़ ‘युग्मन’ को मज़बूत करता है। जब हम बार-बार शांत रहने का अभ्यास करते हैं, तो ‘शांति के नए तार’ मज़बूत हो जाते हैं, और ‘चिंता वाले पुराने तार’ कमज़ोर होकर टूट जाते हैं। यह प्रक्रिया ठीक वैसी है, जैसे दीपावली पर हम पुराने, टूटे रास्तों को छोड़कर, ज्ञान के प्रकाश से सुसज्जित नए और सुंदर रास्तों पर दीये सजाते हैं। साथ ही, ध्यान हमारे ‘समझदारी के स्विच’ और ‘भावनाओं के केंद्र’ के बीच एक मज़बूत पुल बनाता है। इससे हम अपनी भावनाओं को सिर्फ महसूस करने की जगह, उन्हें समझदारी से देखना सीख जाते हैं। यह हमारे भीतर एक शांत दर्शक का दिया जलाता है, जो मन के नाटक को बिना उलझे देखता रहता है।
अंदरूनी ख़ुशी का उत्सव
जब दिमाग़ की बनावट इस तरह सुधरती है, तो हम सिर्फ़ शांत नहीं होते; हम एक गहरे आंतरिक उत्सव का अनुभव करते हैं। सबसे पहले, फ़ोकस का दीया प्रज्वलित होता है। ध्यान में हम अपना सारा ध्यान एक ही जगह, जैसे सांस पर टिकाते हैं। यह अभ्यास हमारे दिमाग के ‘ध्यान देने वाले हिस्से’ को मज़बूत करता है, जिससे हमारी एकाग्रता (फ़ोकस) और याददाश्त दोनों बेहतर होती हैं। जब हम किसी दीए की लौ को देखते हैं, तो हमारी आंखें शांत हो जाती हैं। उसी तरह, ध्यान मन को भटकने से रोककर उसकी शक्ति को बढ़ाता है। बेहतर फ़ोकस का मतलब है ज़िंदगी के हर काम (पढ़ाई, नौकरी, रिश्ते) में बेहतर नतीजा। यह हमारी अंदरूनी ताक़त को लेज़र जैसी धार देता है, जिससे हम अपने लक्ष्य को आसानी से पा सकते हैं।
इसके बाद, दया का दीया जलता है। कुछ तरह के ध्यान (जैसे ‘सबके लिए अच्छी भावनाएं भेजने वाला ध्यान’) से दिमाग के वे हिस्से सक्रिय होते हैं जो दूसरों के लिए हमदर्दी और दया महसूस करते हैं। यह अभ्यास हमें अकेलापन और स्वार्थ के अंधेरे से निकालकर जुड़ाव और प्यार की रोशनी में लाता है। जब हम दयालुता का अभ्यास करते हैं, तो दिमाग में ‘खुश रहने वाले रसायन’ ज़्यादा बनने लगते हैं। इससे हम खुद भी खुश रहते हैं और हमारे आसपास के लोग भी। यह हमारे आसपास एक सकारात्मक माहौल बनाता है, जो केवल हमारे मन को नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक परिवेश को भी शांत करता है।
इस तरह ध्यान लंबी उम्र का दीया जलाता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि रोज़ ध्यान करने से दिमाग के बुढ़ापे की रफ़्तार धीमी हो जाती है। एक रिसर्च के मुताबिक, ध्यान करने वाले लोगों का दिमाग उनकी असल उम्र से कई साल ज़्यादा जवान रहता है। ध्यान दिमाग की कोशिकाओं को स्वस्थ रखता है, जिससे याददाश्त, सीखने की क्षमता और दिमाग़ी तेज़ी बुढ़ापे तक बनी रहती है। यह हमारे आंतरिक दीये की लौ को कभी न बुझने वाला बना देता है, जो हमें स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने में मदद करता है। यह सब कुछ दिमाग़ के लचीलेपन के कारण ही संभव हो पाता है।
हर दिन मने दिवाली
“मन की दिवाली” सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सच्चाई है। यह संकल्प है कि हमें बाहरी रोशनी से ख़ुश न होकर, अपने अंदरूनी दिमाग में शांति, ख़ुशी और समझदारी का पक्का प्रकाश भरना है। हमारा सवाल था: हम घर में तो दीए जलाते हैं, पर क्या कभी हमने अपने दिमाग की करोड़ों छोटी बत्तियों को जलाने की कोशिश की है? उत्तर है: हां, हम करते हैं। जब हम शांत बैठते हैं, अपनी सांस पर ध्यान लगाते हैं, और अपने विचारों को बिना गुस्सा किए देखते हैं, तब हम अपने समझदारी के स्विच को ऑन कर रहे होते हैं, डर के अलार्म को शांत कर रहे होते हैं, और दिमाग में खुशहाली के नए तार जोड़ रहे होते हैं।
विज्ञान ने हमें यह ज्ञान दे दिया है कि हमारा यह प्रयास व्यर्थ नहीं है; हमारा हर दिन का ध्यान-अभ्यास दिमाग को सचमुच और स्थायी रूप से बदल रहा है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, लेकिन इसके परिणाम पक्के होते हैं। आइए, हम सभी आज से ही जागरूकता का छोटा-सा दीया जलाना शुरू करें। यह आंतरिक दीपोत्सव हमें सिखाता है कि सबसे बड़ी दौलत हमारे मन की शांति है और सबसे बड़ा प्रकाश हमारी अपनी समझदारी। सच्ची दिवाली तभी होगी, जब हमारा पूरा दिमाग, उसकी हर छोटी बत्ती, आनंद और ज्ञान की रोशनी से जगमगाएगी, और हमारा जीवन हर पल एक उत्सव बन जाएगा।






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