गिरिजा व्यास: आरती की लौ में बुझ गई एक दीप्ति
गिरिजा जी केवल नेता नहीं थीं, वे एक कविता थीं—ध्वनि में नहीं, अर्थ में। उनका जीवन एक खुली किताब की तरह था, जिसमें दर्शन भी था, संघर्ष भी और सेवा की स्याही से लिखा गया हर पृष्ठ एक नई दिशा देता...

वो एक दीप थीं—मद्धम नहीं, तेजस्वी। राजनीति की चौपाल में जब शब्द खोखले हो चले थे, तब उनकी वाणी में संवेदना की लौ थी। डॉ. गिरिजा व्यास… एक नाम नहीं, एक उजास था, जो किताबों से निकली, संसद तक पहुँची और स्त्रियों के हक की मशाल बन गई।
जैसे आरती की लौ धूप से पहले अंधकार को चीरती है, वैसे ही उनका जीवन समाज की रूढ़ियों को छूकर उसे आलोकित करता रहा। लेकिन विडंबना देखिए—वही आरती की लौ, जो उन्होंने वर्षों तक जगाई, अंततः उन्हें अपने आगोश में ले गई।
जिस घर में उन्होंने वर्षों तक प्रार्थना की, वहीं की एक चिंगारी, एक दिन सब कुछ राख कर गई। परंतु ऐसी विभूतियाँ राख नहीं होतीं, वे गंध बनकर रह जाती हैं—स्मृति की, प्रेरणा की।
गिरिजा जी केवल नेता नहीं थीं, वे एक कविता थीं—ध्वनि में नहीं, अर्थ में। उनका जीवन एक खुली किताब की तरह था, जिसमें दर्शन भी था, संघर्ष भी और सेवा की स्याही से लिखा गया हर पृष्ठ एक नई दिशा देता था।
राजनीति, साहित्य और समाजसेवा—तीनों में उन्होंने ऐसा संतुलन साधा, जैसे कोई कलाकार तीन रंगों से एक आकाश रच दे। वे कोई पद नहीं थीं, वे एक पद्य थीं—जिसे पढ़ते हुए आत्मा भी मौन हो जाए।
आज वे नहीं हैं, पर उनकी उपस्थिति हर उस स्त्री के चेहरे पर है, जो हौसले से बोलती है। हर उस मंच पर है, जहाँ विचार ज्वलंत होते हैं। हर उस आरती में है, जो श्रद्धा से जलती है। गिरिजा व्यास अब लौ नहीं, दीप्त स्मृति हैं।






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