‘बैलेट’ की वापसी या लोकतंत्र की वापसी से पलायन?
क्या वाकई कुछ राजनीतिक दल ईवीएम की पारदर्शिता को लेकर चिंतित हैं या यह बैलेट पेपर की वापसी की मांग सिर्फ एक सियासी रणनीति भर है? यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि बैलेट की उस व्यवस्था में फर्जी मतदान,...

कहीं यह घोड़ा-गाड़ी से चंद्रयान की उलटी यात्रा तो नहीं!
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
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देश में इन दिनों चुनाव आयोग जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था भी विवादों के घेरे में है, खासतौर पर कांग्रेस, सपा और कुछ अन्य विपक्षी दलों के आरोपों के चलते। लोकसभा चुनाव 2024 के बाद मतगणना और ईवीएम को लेकर उठे सवालों ने यह बहस और तेज कर दी है। चुनाव आयोग ने अपने स्पष्टीकरण दिए, लेकिन सियासी आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमा नहीं।
भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद उसका निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव तंत्र है, जिसकी रीढ़ चुनाव आयोग है। यह कोई पहली बार नहीं कि उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठे हों, लेकिन हर बार ऐसे सवाल लोकतंत्र की विश्वसनीयता को झकझोरते हैं। हाल ही में मायावती ने बयान दिया कि अगर बैलेट पेपर से चुनाव हों, तो बहुजन समाज पार्टी फिर से जिंदा हो जाएगी। सपा और कांग्रेस सहित कई दलों की यह मांग दोबारा जोर पकड़ने लगी है कि ईवीएम की जगह फिर बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं।
ये सोची-समझी साजिश तो नहीं?
अब सवाल यह है कि क्या ये दल सच में ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर चिंतित हैं या फिर यह एक सोची-समझी चुनावी रणनीति है? क्या यह उस ‘पुराने दौर’ की वापसी की साजिश तो नहीं, जहां बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान और मतपत्रों की खुली छेड़छाड़ आमबात थी? बैलेट पेपर के दौर में मतदान केंद्रों पर अक्सर ऐसा देखने को मिलता था कि मतदाता का वोट पहले ही कोई और डाल चुका होता था।
ईवीएम ने इस अव्यवस्था को काफी हद तक खत्म किया है। 1990 के दशक में जब इन मशीनों का आगमन हुआ था, तब संदेह स्वाभाविक थे, लेकिन समय के साथ सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और तकनीकी सुधारों ने भरोसा मजबूत किया।
लेकिन जब आज भी सत्ता में रह चुके दल, जिन्होंने इन्हीं ईवीएम से चुनाव जीते, अब उसकी पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, तो यह संदेह उपजता है कि यह आक्रोश नहीं, अवसरवाद है। क्या बैलेट पेपर की मांग दरअसल एक ऐसा मंच पाने की कोशिश है, जहां परिणामों को ‘मनचाहा’ बनाया जा सके? यह ‘चंद्रयान युग’ में ‘घोड़ा-गाड़ी युग’ को वापस लाने जैसा नहीं है क्या?
ईवीएम सिस्टम को जवाबदेह बनाना जरूरी
हां, यह ज़रूर सही होता अगर इन दलों की मांग यह होती कि ईवीएम की प्रणाली को और पारदर्शी, अधिक तकनीकी रूप से सुरक्षित और जवाबदेह बनाया जाए। लेकिन समस्या यह है कि जब परिणाम अनुकूल नहीं आते, तभी मशीनों पर शक किया जाता है। इससे जनविश्वास डगमगाने लगता है।
बहरहाल, चुनाव आयोग को चाहिए कि वह खुद को और अधिक पारदर्शी बनाते हुए संवाद को प्राथमिकता दे। वीवीपैट प्रणाली ने पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम तो उठाया है, लेकिन उसकी कवरेज और प्रक्रिया अब भी व्यापक सुधार की मांग करती है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में 90 करोड़ से अधिक मतदाताओं के लिए ईमानदार, तेज़ और विश्वसनीय चुनाव प्रणाली आवश्यक है। ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका अत्यंत कम है, फिर भी तकनीक का विकास रुकना नहीं चाहिए। हमें ब्लॉकचेन वोटिंग, बायोमेट्रिक सत्यापन जैसी उन्नत प्रणालियों की दिशा में विचार करना होगा।
यदि भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, तो उसे सबसे पारदर्शी लोकतंत्र भी बनना होगा। बैलेट पेपर की वापसी कोई लोकतांत्रिक सुधार नहीं, बल्कि उस अंधेरे युग की पुनरावृत्ति होगी, जहां चुनाव ‘ठप्पों’ और ‘ठप्पेदारों’ के हाथ में बंधक हुआ करता था। कई बार तो सम्पूर्ण बूथ हाईजैक हो जाया करते थे।
आज आवश्यकता है कि राजनीतिक दल सत्ता में आने से पहले लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समझें, स्वीकारें और सम्मान दें। साथ ही चुनाव आयोग को चाहिए कि वह सिर्फ तकनीकी जवाबदेही न निभाए, बल्कि संवाद में भी सक्रिय भागीदारी करे। लोकतंत्र सिर्फ मतदान की प्रक्रिया नहीं, उस पर जनविश्वास की गारंटी भी है।






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