परिवार है जीवन निर्माण की पाठशाला
सभी को स्वातंत्र्य व स्वयं निर्णय करने की ताकत चाहिए। धैर्य और सहनशीलता की कमी से एकाकी परिवार पनप रहे हैं। घरों में राम- लक्ष्मण के स्थान पर बाली- सुग्रीव पनप रहे हैं। अत्यंत ही दुख का विषय है कि...

चिंताजनक – आज दो भाई एक छत के नीचे रहने को तैयार नहीं..
डॉ. गौरव बिस्सा,
मोटिवेशनल स्पीकर
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भारतीय समाज में परिवार जनों को महाभारत नहीं अपितु रामायण पढ़ने की सलाह दी जाती है। रामायण भाइयों के बीच प्रेम की पराकाष्ठा को दिखाता है, जबकि महाभारत में संपत्ति के लिए भाइयों को लड़ता हुआ दिखाया गया है। भारतीय समाज सदैव जोड़ने की बात कहता है। घर टूटने में भारतीय समाज विश्वास नहीं करता। रामायण में बालक लक्ष्मण सदा इस बात के लिए रोते थे कि उन्हें श्रीराम के पास ही खड़ा किया जाए। जब श्रीराम, लक्ष्मण और सीता सहित वन में पहुंचे तो रात को निद्रादेवी का आगमन हुआ। लक्ष्मण ने निद्रादेवी से अनुरोध किया कि वह उनकी आंखों में न आकर कहीं और जाएं, ताकि लक्ष्मण अपने भाई और भाभी की सेवा कर सके। निद्रादेवी ने लक्ष्मण की ऐवज में सोने वाले का नाम पूछा, तो उन्होंने वह निद्रा अपनी पत्नी उर्मिला को स्थानांतरित कर दी। उर्मिला ने समर्पण और प्रेम के कारण लक्ष्मण के हिस्से की नींद अपनी आंखों में भर ली और चौदह वर्ष तक सोए रहने का संकल्प लिया, ताकि उनके पति अपने भाई और भाभी के प्रति धर्म निभा सके। यह धर्म और दाम्पत्य प्रेम की पराकाष्ठा है।
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कमज़ोर पड़ते परिवार
यह तो हुई प्राचीन बात, लेकिन क्या वर्तमान जगत के परिवारों में ऐसा समन्वय देखने को मिल रहा है? क्या महान गौरवशाली परम्परा को धारण करने वाला देश, अपने पारिवारिक जीवन मूल्यों को जी रहा है? क्या बढ़ते वृद्धाश्रम समाज के युवा वर्ग पर एक कलंक या प्रश्नचिन्ह नहीं हैं? आखिर ऐसा क्या है कि पति अपनी पत्नी के साथ, भाई अपने भाई से और रिश्तेदार एक दूसरे के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे? एक घर में, एक छत के नीचे दो भाई साथ रहने को तैयार नहीं। सभी को स्वातंत्र्य व स्वयं निर्णय करने की ताकत चाहिए। धैर्य और सहनशीलता की कमी से एकाकी परिवार पनप रहे हैं। घरों में राम- लक्ष्मण के स्थान पर बाली- सुग्रीव पनप रहे हैं। अत्यंत ही दुख का विषय है कि रिश्ता खोजते समय एक महिला ही अपनी पुत्री को संयुक्त परिवार में ब्याहना नहीं चाहती। वह चाहती है कि परिवार तो बड़ा हो, लेकिन उसकी बेटी परिवार से अलग रहे। अलगाव का यह प्रेम, संकट का कारण बन रहा है। ये चिंताजनक हैं और इसके निवारण के लिए चिंतन ज़रूरी है।
क्या है परिवार?
– क्या एक कुल में जन्म लेना या एक साथ एक घर में रहना परिवार है? यदि यह सही है तो कई जानवर भी इस श्रेणी में शामिल हो जाएंगे, जो एक ही कुल के हैं और साथ भी रहते हैं। तो क्या आप इसे परिवार कहेंगे? शायद नहीं। आखिर क्यों नहीं?
– एक साथ कई भाई और उनकी संतानें एक ही स्थान पर रहते हैं। उनमे विषाद, ईर्ष्या, जलन, क्लेश और लड़ने का भाव प्रबल है। क्या इसे परिवार कह सकते हैं?
आप सही सोच रहे हैं। ये परिवार नहीं हो सकता। जहां परिवार रहता है, वहां क्लेश, संघर्ष और ईर्ष्या के लिए स्थान नहीं रह जाता। परिवार तो शुद्ध सात्विक प्रेम, त्याग, आत्मीयता, सहयोग, और समानुभूति के गुणों से चलता है। परिवार का अर्थ है- परी का वार अर्थात माधुर्य का वार जिसके अनुसार प्रत्येक दिन मधुर हो। क्या आपका प्रत्येक दिन मधुरता के साथ बीतता है? यदि नहीं तो आप शायद परिवार में नहीं रह रहे।
संयुक्त परिवार और बजुर्ग
परिवारों के कमज़ोर पड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण है संयुक्त परिवारों का टूटना और दादा-दादी या नाना- नानी के स्नेह से बच्चों का महरूम होना। आज की पीढ़ी डिग्रियों की परीक्षा में जबर्दस्त परिणाम देने के बावजूद ज़िन्दगी की जंग में कमज़ोर है। आंख की शर्म, व्यावहारिक ज्ञान और बुज़ुर्ग सम्मान में कमी आई हैं।
– रिसर्च रिव्यू जर्नल की शोध रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त परिवार में रहने वाले बच्चों में सामाजिक कौशल जैसे- साझा करना, दूसरों की भावनाओं को समझना, सहयोग करना आदि गुण अधिक विकसित होते हैं।
– बुजुर्गों के साथ रहने से बच्चों के व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभावों पर जर्मनी के प्रो. जेफ्री स्टॉक्स कहते हैं कि जो बच्चे अपने दादा-दादी या नाना-नानी के साथ समय बिताते हैं और रहते हैं; वे मानसिक रूप से अधिक समृद्ध, समाधान केन्द्रित, धैर्यवान तथा अच्छी शारीरिक सेहत से संपन्न होता हैं।
– इलिनोइस विश्वविद्यालय के शोध अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, ग्रेंड पेरेंट्स के साथ रहने से बच्चे भावनात्मक संतुलन, समानुभूति, स्वाध्याय, हाथ के हुनर और वित्तीय विषयों में दूसरों से बेहतर होते हैं।
रहना, सहना और कहना
सहनशीलता के कारण ही परिवार का अस्तित्व होता है। वर्तमान समय में पारिवारिक तनाव की मूल वजह सहनशीलता में कमी ही है। आपने कई बार सुना होगा कि अमुक परिवार का रहन- सहन अच्छा है। यहां रहने का अर्थ है साथ में निवास। सहन का अर्थ है विरोधी बातों और विचारों को भी सहन करने की ताकत। यहां यह स्थापित होता है कि जो सह पाने अर्थात सहन करने में समर्थ है वो परिवार में रहने में भी समर्थ होगा। परिवार सहन करने का ही स्कूल है। विपरीत विचार को सहना, अपने हितों का बलिदान देना, बड़े- बुज़ुर्ग कुछ कह दें तो उसे सहन करना और पलट कर जवाब नहीं देना ही परिवार को श्रेष्ठ परिवार बनाता है। कहने से अभिप्राय है किस समय, किस बात को कहना और कहने की कला सीखना। कई बार परिवार के प्रेम को बनाए रखने के लिए कुछ बातें सच होते हुए भी बोली नहीं जाती। कई बार बुरे सत्य को न कहना भी परिवार को बचाता है।
ताकत परिवार की : महाभारत कथा
वनवास के दौरान युधिष्ठिर को पता चला कि कुछ शत्रुओं ने कुरु राजकुमार दुर्योधन को बंदी बना लिया है। युधिष्ठिर ने तुरंत ही अर्जुन को आदेश दिया कि दुर्योधन को मुक्त करवाए। जब भीम ने प्रश्न किया कि दुर्योधन पांडवों के कष्टों का कारण है तो उसे मुक्त क्यों करवाएं? इसका जवाब देते हुए युधिष्ठिर ने कहा कि यह वक्त आपसी लड़ाई का नहीं है। दुर्योधन को बंदी बनाना कुरु परिवार का अपमान है। यह हस्तिनापुर राष्ट्र का अपमान है। दुर्योधन की वजह से हस्तिनापुर और उसके ज्येष्ठ पिता धृतराष्ट्र की कीर्ति धूमिल नहीं होनी चाहिए। उसने कहा कि आज भी कुरु परिवार एक है। यह कथा परिवार के महत्त्व को समझाती है।
– आंतरिक रूप से परिवार में चाहे जितनी मतभिन्नता हो, लेकिन अन्य जनों के सामने परिवार को नीचा दिखाना भारतीय संस्कृति नहीं है।
– परिवार वह इकाई है जो मुश्किल परिस्थितियों में आपका संबल बनाए रखती है।
– लहू सदा पानी से गाढ़ा होता है। इस उक्ति को सदा हृदय में रखना चाहिए। इसका अर्थ है कि हमारे अन्यजनों से चाहे जितने ही मधुर सम्बन्ध हों, लेकिन कुछ ऐसे कार्य होते हैं जो सिर्फ परिवारजन ही संपन्न करवा सकते हैं अतः उनकी महत्ता को समझें।
– घर के बुजुर्गों (जैसे काका, मामा आदि) से आपके अच्छे सम्बन्ध हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि उन बुजुर्गों की संतानों और उनकी संतानों से भी आपके मधुर सम्बन्ध हों ही। ऐसे में उन बुजुर्गों की संतानों की गलतियों का दंड उन बुजुर्गों को न दें। उनसे अपने प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखें, क्योंकि आपकी और उन बुज़ुर्गजनों के रिश्तों की गहराई को उन बुजुर्गों के पोते- दोहिते नहीं समझ सकते। इस कथा में भी युधिष्ठिर ने अपने ज्येष्ठ पिता धृतराष्ट्र के साथ के संबंधों को वरीयता दी। उसने दुर्योधन की गलतियों को अपने ज्येष्ठ पिता से नहीं जोड़ा।
– परिवारों में आपसी समस्या, छोटी बातों पर अहं पर चोट लगने जैसी घटनाएं होती रहती हैं। कभी कभार बुज़ुर्ग जन भी कुछ कह देते हैं। उन्हें दिल पर नहीं लेना चाहिये।
भूलिए और माफ़ कीजिए
आपसी संपर्क और कम्युनिकेशन की कमी भी परिवारों के बीच दरार पैदा करती है। पुरानी बेकार की बातों को दोहराने, नकारात्मक घटनाओं को याद रखने, और परिवार के सदस्यों की बुराई ढूंढने से वैमनस्य ही पनपता है। इन्हें जाने दीजिये। जीवन बहुत छोटा है। प्रेम ही याद रहता है। भावनाएं ही याद रहती हैं। छोटी बातों को भूलना और सदा बड़ा सोचना ही परिवार के एकाकार रहने का प्राण सत्त्व है। बच्चों से जुड़िये। वे परिवारों के बीच की खाई को पाटकर नए संबंधों का निर्माण कर देते हैं। परिवार हमारा सबसे बड़ा शॉक एब्सोर्बर है अर्थात कष्टों और दुखों को दूर करने वाला संस्थान है। यदि परिवार ही न रहा तो समस्त संसाधनों के भंडारण, धन, दौलत, यश आदि का कोई मोल नहीं रह जाता।
अपने छोटे भाई और उसकी पत्नी को माफ़ कर दें कि उसने आपको फोन नहीं किया। अपनी मौसी, बुआ, काकी, ताई, सालेजी या भतीजे को भी क्षमा कर दें कि वे आपको याद नहीं करते। वे न करें तो कोई बात नहीं, आप उन्हें याद कर लीजिए। कुछ दिन करके देखिए। अप्रत्याशित सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। ऐसे ही किसी मित्र से मिलने पहुंच जाइए। उसे खुशी होगी कि आप आए। मिलिए, अहंकार त्यागिए। ऐसा नहीं कर पाए तो अत्यधिक कष्ट होगा। अपने मन की बात कहने का स्थान ही नहीं बचेगा। मस्तिष्क में समस्या होने लगेगी। अतः वेंटिलेशन के लिए ही सही, लोगों से मिलिए।
कई बार जीवन में हमें ऐसा लगता है कि हमें किसी की भी आवश्यकता नहीं है। उस समय हमारे पास अत्यधिक साधन और सम्पन्नता होती है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि हमारे पास कोई भी नहीं होता जब हमें अत्यधिक आवश्यकता होती है। अतः अपने परिवार के साथ समन्वय रखकर हृदय को विशाल बनाइए। यही परिवार प्रबंध का गूढ़ सूत्र है।






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