बदलता समाज और मानसिक स्वास्थ्य: रिश्तों में बढ़ते खालीपन से कैसे निपटें?
‘Insight with Ra..Ga’ के तहत वरिष्ठ पत्रकार राकेश गांधी ने मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा की डॉ. सुरेंद्र कुमार और डॉ. सृष्टि देथा से। पढ़ें यह विस्तृत संवाद जो बताता है कि बदलते समाज में रिश्तों को कैसे...

साक्षात्कार : संयुक्त परिवार से न्यूक्लियर फैमिली की ओर बढ़ता झुकाव
आज का समाज तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवारों का विघटन, वर्क-लाइफ बैलेंस की चुनौतियां, सोशल मीडिया का दबाव और रिश्तों में संवाद की कमी मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर रही है। कभी बच्चों में अचानक बढ़ता गुस्सा, कभी बुजुर्गों की खामोश उदासी और कभी पति-पत्नी के बीच बढ़ती दूरी– ये सभी महज घटनाएं नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने में दरार का संकेत हैं।
‘Insight with Ra..Ga’ शृंखला के तहत वरिष्ठ पत्रकार राकेश गांधी ने वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सुरेंद्र कुमार और डॉ. सृष्टि देथा से ‘मानसिक स्वास्थ्य’ पर चर्चा की। पढ़ें यह विस्तृत संवाद जो बताता है कि बदलते समाज में रिश्तों को कैसे मजबूत बनाया जा सकता है और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता क्यों देनी चाहिए।
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राकेश गांधी: आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है? हमें बार-बार यह सवाल सुनाई देता है कि क्या हम सही दिशा में हैं या कहीं कुछ छूट रहा है?
डॉ. सृष्टि देथा: समाज को लेकर आज जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है वर्क-लाइफ बैलेंस। लोग अपने काम में इतने व्यस्त हैं कि सामाजिक अपेक्षाओं को पूरा करना कठिन होता जा रहा है। परिवार और रिश्तों पर समय नहीं दे पाने से दबाव बढ़ रहा है। इस बदलाव में कुछ लोग रेजिस्ट कर रहे हैं, कुछ आगे बढ़ रहे हैं। जितना एक्सपोज़र बढ़ता है, उतना समाज में बदलाव आता है। जब तक हम बदलाव को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक परेशानियां बढ़ती रहेंगी।
राकेश गांधी: तो आपको लगता है कि यह बदलाव सकारात्मक है या नकारात्मक? खासकर युवाओं में जो दृष्टि बदल रही है, उसका असर क्या है?
डॉ. सृष्टि देथा: युवाओं की सोच में सकारात्मक बदलाव भी है लेकिन सोशल मीडिया ने समस्याएं भी बढ़ा दी हैं। पहले भी गलत रास्तों पर जाने की घटनाएं होती थीं लेकिन अब सोशल मीडिया ने उन्हें बढ़ा दिया है। युवाओं का फोकस सतही हो गया है– उन्हें लगता है कि सब कुछ ऊपर से सही दिखना चाहिए। वे खुद की तुलना दूसरों से करते रहते हैं। परिवार में भावनात्मक जुड़ाव कम हो रहा है।
राकेश गांधी: आज के समय में न्यूक्लियर फैमिली की ओर झुकाव बढ़ रहा है। इसका समाज पर क्या असर नजर आता है?
डॉ. सुरेंद्र कुमार: न्यूक्लियर फैमिली समाज में एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसका पहला कारण आर्थिक है। पति-पत्नी दोनों ही काम पर जाते हैं। अक्सर शहर से बाहर भी जाना पड़ता है। बुजुर्ग माता-पिता अकेले रह जाते हैं और अकेलापन बढ़ने लगता है। बच्चों का ध्यान आर्थिक सम्पन्नता पर केंद्रित हो जाता है, लेकिन उसके दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। पहले संयुक्त परिवार में बच्चे कई लोगों से सीखते थे, उनका सर्वांगीण विकास होता था। अब वे दूसरों के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं, कई बार सीसीटीवी कैमरों से निगरानी करनी पड़ती है। बच्चों को अधिकांश समय दूसरों के सहारे गुजारना होता है। यह बच्चों के मानसिक विकास के लिए घातक है।
राकेश गांधी: कभी-कभी ऐसा लगता है कि विवाह एक तरह की “डील” बन गया है। क्या आप इससे सहमत हैं?
डॉ. सुरेंद्र: हां, आजकल विवाह को कई लोग जिम्मेदारी की बजाय समझौते के रूप में देखने लगे हैं। यही कारण है कि मेट्रो शहरों में विवाह की उम्र बढ़ रही है और लिव-इन रिलेशनशिप को प्राथमिकता दी जा रही है। उसमें प्यार है लेकिन जिम्मेदारियां कम हैं, जबकि विवाह में कई जिम्मेदारियां निभानी होती हैं।
राकेश गांधी: आपको नहीं लगता कि आज कई नौकरीपेशा पति-पत्नी अपने माता-पिता को साथ नहीं रखना चाहते? “हम दो-हमारे दो” की सोच क्यों बढ़ रही है?
डॉ. सुरेंद्र: आज समाज में निज स्वतंत्रता का चलन बढ़ गया है। कपल को लगता है कि यदि माता-पिता उनके साथ रहेंगे तो उनकी स्वतंत्रता बाधित होगी– समय पर घर आना पड़ेगा, उनकी सुविधाओं का ध्यान रखना होगा, और कुछ सामाजिक मर्यादाएं निभानी होंगी। इसी वजह से वे अलग रहना पसंद करते हैं। यह एक तरह से यूरोपियन कल्चर का प्रभाव है, जहां माता-पिता को खर्चा भेज दिया जाता है, लेकिन साथ नहीं रखा जाता।
राकेश गांधी: ऐसे हालात में महिलाओं को क्या करना चाहिए? क्या यह पुरुषों की या महिलाओं की ज्यादा जरूरत होती है कि वे स्वतंत्र रहें?
डॉ. सृष्टि: आजादी सबका हक है, लेकिन रिश्तों में बैलेंस जरूरी है। न तो किसी की स्वतंत्रता पूरी तरह खत्म होनी चाहिए और न ही हर बात पर डिक्टेट करना चाहिए। दोनों पीढ़ियों को समझना होगा कि परिवार में हर किसी को अपना स्पेस चाहिए। तभी सब लोग साथ रहते हुए भी खुश रह सकते हैं।
राकेश गांधी: मुझे लगता है कि इस बदलाव का खामियाजा बच्चों और महिलाओं को सबसे अधिक भुगतना पड़ रहा है।
डॉ. सुरेंद्र कुमार: सही कहा आपने। महिला का भावनात्मक वेंटिलेशन नहीं हो पाता। पहले महिलाएं प्रसव के समय मायके जाती थीं, परिवार का सहयोग मिलता था। अब न्यूक्लियर फैमिली के कारण वे हॉस्पिटल तक सीमित हो गई हैं। महिला पूरे घर- परिवार की धुरी होती है। जब वह खुद को दरकिनार कर सबकी खातिर बलिदान देती है और बदले में सहयोग नहीं मिलता तो अवसाद बढ़ता है। वो काम काम के बोझ तले इतनी दब सी गई है कि वे कहीं न कहीं कुंठा की शिकार हो रही है और वो कुंठा उसमें एक अराजकता की भावना पैदा कर रही है। चिड़चिड़ापन, नींद न आना, काम में मन न लगना जैसे मानसिक लक्षण नजर आने लगते हैं।
डॉ. सृष्टि देथा: समाज की अपेक्षाएं महिलाओं से कम नहीं हुई हैं। पहले लड़का- लड़की में फर्क होता था, अब इंडिविजुअल लेवल में आप परिवारों में देखेंगे तो बेटा- बेटी को एक ही तरीके से बड़ा किया जाता है। उनको उतनी ही अच्छी परवरिश दी जा रही है। उनको एक जैसे ही पढ़ाया जा रहा है। लेकिन शादी के बाद जेंडर रोल्स वही पुराने हैं। महिलाएं बच्चे की परवरिश और नौकरी दोनों को संतुलित करती हैं लेकिन सहयोग कम मिलता है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन का कारण यही है – परिवार का सपोर्ट सिस्टम कमजोर हो गया है। बेसिकली जो जेंडर रोल्स सोसाइटी ने डिफाइन किए हुए हैं, उन्हें थोड़ा सा बैलेंस करने की जरूरत है।
राकेश गांधी: क्या पुरुष भी मानसिक दबाव का सामना कर रहे हैं?
डॉ. सुरेंद्र कुमार: कई बार पुरुष सैंडविच बन जाते हैं। वे जिस मां के दामन में बड़े हुए हैं, उस मां को कैसे छोड़ सकते हैं और दूसरी ओर पत्नी को भी नाराज नहीं कर सकते। शादी रिश्तों की जननी है, लेकिन जब पति-पत्नी के विचारों में तालमेल नहीं होता तो पुरुष मानसिक दबाव में आ जाता है। अगर स्त्री समझदार है, सोशल इंजीनियरिंग उसकी स्ट्रांग है तो बहुत अच्छे से तालमेल बना लेती है। ऐसे में पुरुष सैंडविच बनने से बच जाता है।
डॉ. सृष्टि देथा: रिश्तों में संवाद की कमी तनाव का सबसे बड़ा कारण है। दोनों पीढ़ियों को एक-दूसरे को समझना होगा। जो पुरानी पीढ़ी है उसे नई जिम्मेदारियों को समझना चाहिए और नई पीढ़ी को भी माता-पिता का अनुभव मानना चाहिए। तभी इन समस्याओं का निवारण संभव होगा।
राकेश गांधी: क्या मोबाइल फोन कहीं न कहीं हमारे रिश्तों को नुकसान पहुंचा रहे हैं?
डॉ. सृष्टि देथा: बिल्कुल। फोन का उद्देश्य हमें जोड़ना था, लेकिन यह हमें disconnect कर रहा है। परिवार में सब लोग एक ही टेबल पर बैठे हैं लेकिन हर कोई अपने-अपने फोन में खोया है। पति-पत्नी एक कमरे में हैं लेकिन डिजिटल रूप से अलग-अलग स्क्रीन पर।
राकेश गांधी: क्या यह सच है कि लोग अपनी परेशानियां शेयर नहीं करते और यही मानसिक रोगों का कारण बनता है?
डॉ. सुरेंद्र कुमार: मन शरीर का कोई अंग नहीं है, इसलिए उसकी परेशानी छिप जाती है। लोग अपनी समस्याएं बताते नहीं, उन्हें डर होता है कि शेयर करने पर उनका मजाक उड़ाया जाएगा। यही घुटन डिप्रेशन, एंग्जायटी और अन्य मानसिक रोगों को जन्म देती है।
डॉ. सृष्टि देथा: पुरुषों से बचपन से कहा जाता है कि रोना नहीं चाहिए। भावनाएं दबाने से मन का बोझ बढ़ता है। जब तक हम एक-दूसरे को सुनेंगे नहीं, तब तक रिश्तों में खामोशी बढ़ेगी। यही कारण है कि पारिवारिक समस्याओं के चलते सुसाइड के मामले सबसे अधिक सामने आते हैं।
राकेश गांधी: तो मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत रखने के लिए क्या करना चाहिए?
डॉ. सृष्टि देथा: हमें सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखना होगा। परिवार में बातचीत का दायरा बढ़ाना होगा। साथ ही वर्क-लाइफ बैलेंस पर काम करते रहना चाहिए। जजमेंट हटाकर सुनें और एक-दूसरे को स्पेस दें।
डॉ. सुरेंद्र कुमार: योग, ध्यान, व्यायाम और संगीत को जीवन का हिस्सा बनाएं। हेल्दी डाइट और नियमित दिनचर्या अपनाएं। मद्यपान से दूरी रखें और दोस्तों व परिवार के साथ समय बिताएं। अपनी भावनाएं शेयर करें।
क्या कहते हैं महापुरुष –
“मनुष्य अकेलेपन में जी नहीं सकता। परिवार वह पहली पाठशाला है जहां हम प्रेम, त्याग और धैर्य सीखते हैं। संयुक्त परिवार केवल दीवारों का साझा करना नहीं है, यह दिलों का जुड़ना है।” – महात्मा गांधी
“हमारा स्वभाव ही हमें एक-दूसरे से जोड़ता है। परिवार में रहते हुए हम सहनशीलता, प्रेम और करुणा को आत्मसात करते हैं। यही भाव समाज को मजबूत बनाते हैं।” – स्वामी विवेकानंद
“परिवार ही जीवन का सबसे बड़ा विद्यालय है। यदि वहां प्रेम और समझ नहीं होगी तो दुनिया के किसी कोने में भी शांति नहीं मिल सकती।” – लियो टॉलस्टॉय
“सच्चा परिवार वह है जहां हर व्यक्ति को अपना महत्व महसूस हो। जब घर के सभी लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते हैं, तभी समाज में सामंजस्य आता है।” – रवींद्रनाथ ठाकुर
“मैं जो कुछ भी हूं, या बनने की आशा करता हूं, उसका श्रेय मेरे परिवार को जाता है। घर ही वह जगह है, जहां व्यक्ति सबसे पहले जीवन के मूल्यों को सीखता है।” – अब्राहम लिंकन
“संयुक्त परिवार केवल आर्थिक सहयोग नहीं देता, यह मनुष्य को सहनशीलता, त्याग और परस्पर सहयोग का अभ्यास कराता है। यही गुण समाज को जीवंत बनाते हैं।” – विनोबा भावे
“परिवार ही राष्ट्र की नींव है। यदि परिवारों में अनुशासन, प्रेम और सम्मान होगा, तो समाज और राष्ट्र स्वतः सशक्त होंगे।” – कन्फ्यूशियस






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