“काम करवाना है तो देना पड़ेगा..”- यही सोच है असली संकट
जानिए कैसे भारत की संस्थागत प्रगति के नीचे भ्रष्टाचार की दीमक देश को खोखला कर रही है। CPI 2024 रैंकिंग, कानूनी विफलता और सुधारों की संभावनाओं पर एक विश्लेषणात्मक सम्पादकीय...

भारत में भ्रष्टाचार: प्रगति की नींव दीमक से हो रही खोखली
✍️ राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
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भारत आज तकनीकी, वैज्ञानिक और डिजिटल मोर्चों पर उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज कर रहा है। चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता, डिजिटल लेन-देन में विश्वस्तरीय बढ़त और वैश्विक कूटनीति में निर्णायक उपस्थिति इस बात की गवाही देती है कि भारत एक उभरती महाशक्ति है। परंतु इसी उन्नति के नीचे एक ऐसी आंतरिक दीमक है जो निरंतर हमारी नींव को खोखला कर रही है और उसका नाम है भ्रष्टाचार। आज देश के किसी भी हिस्से में यह शब्द अब अनजाना नहीं है। अधिक दुखद यह है कि यह अब केवल एक अपराध नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा बन चुका है। “काम करवाना है, तो देना ही पड़ेगा” जैसी सोच केवल आम आदमी तक सीमित नहीं रही, यह हमारे तंत्र, संस्थाओं और नेतृत्व के भीतर तक पैठ बना चुकी है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि आज कोई व्यक्ति यदि घोटाले में पकड़ा भी जाता है, तो उसे सजा से अधिक इस बात का भरोसा होता है कि “कुछ देकर छूट जाएगा।” यही सोच हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर प्रश्नचिन्ह है।
भारत 96वें स्थान पर
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2024 की करप्शन परसेप्शन इंडेस्क (CPI) में भारत 180 देशों में 96वें स्थान पर है। यह स्थिति हमारे लिए गंभीर चेतावनी है कि हम चाहे जितने भी आर्थिक ग्राफ चढ़ लें, जब तक संस्थागत ईमानदारी नहीं होगी, तब तक हमारा विकास सतही ही रहेगा। भारत इस सूची में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों से बेहतर स्थिति में भले हो, लेकिन चीन से भी पीछे होना हमारी संस्थागत गिरावट का संकेतक है। यह विडंबना नहीं तो क्या है कि देश में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए आवश्यक सभी प्रमुख कानूनी और संस्थागत ढांचे मौजूद हैं, जैसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, आरटीआई अधिनियम, और लोकपाल व्यवस्था। लेकिन इनका प्रभाव वहां समाप्त हो जाता है, जहां राजनीति और पद का हस्तक्षेप शुरू होता है। शिकायतें वर्षों तक लंबित रहती हैं, और कार्रवाई तभी होती है जब जनदबाव अपरिहार्य बन जाए। इससे आमजन का भरोसा प्रणाली से टूटता है और रिश्वत को ‘समझदारी’ मान लिया जाता है। इस समस्या की गहराई समझने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि भ्रष्टाचार अब केवल नीतिगत दोष नहीं, बल्कि सामाजिक सोच की विकृति बन चुका है। आज रिश्वत देना-बचना केवल कोई अपराध नहीं, बल्कि लोगों की दृष्टि में एक ‘जुगाड़’ है। ईमानदारी को या तो मूर्खता माना जाता है या फिर आत्मघाती। यह मानसिकता स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार अब प्रणाली नहीं, संस्कृति बन चुका है।
साफ-सुथरे देशों को बनाएं अपना आदर्श
हमारे लिए यह ज़रूरी है कि हम डेनमार्क, फिनलैंड, न्यूजीलैंड, नॉर्वे और सिंगापुर जैसे देशों की तरफी देखें, जिन्होंने भ्रष्टाचार को समूल समाप्त किया है या न्यूनतम स्तर तक नियंत्रित रखा। इन देशों में शासन, प्रशासन और समाज के बीच पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और क़ानून के अनुपालन की स्पष्टता है। वहां न सत्ता में कोई छूट है, न नौकरशाही में कोई अपवाद। बच्चों को स्कूल स्तर से ही ईमानदारी और नागरिक उत्तरदायित्व की शिक्षा दी जाती है, जिससे पूरी पीढ़ी एक उत्तरदायी नागरिक चेतना में विकसित होती है।
बढ़ती जा रही है नीति व नैतिकता के बीच की खाई
इसके विपरीत भारत में नीति और नैतिकता के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना, उनके कार्य को पारदर्शी बनाना और दोषियों को त्वरित व निर्णायक सजा देना आज की आवश्यकता है। रिश्वत देने-लेने वालों को केवल कानूनी सजा नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना चाहिए। सरकारी तंत्र में तकनीक का उपयोग और डिजिटल प्रक्रियाओं को अनिवार्य बनाना भ्रष्टाचार पर प्रभावी प्रहार हो सकता है। मीडिया को भी अब केवल ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ से आगे जाकर ‘फ़ॉलोअप पत्रकारिता’ की ओर बढ़ना होगा। भ्रष्टाचार की खबर केवल एक सनसनी नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का विषय बननी चाहिए।
विश्वगुरु बनने से पहले ‘चरित्रगुरु’ बनना जरूरी
यदि भारत को सचमुच ‘विश्वगुरु’ बनना है, तो पहले ‘चरित्रगुरु’ बनना होगा। यह बदलाव केवल कानून से संभव नहीं है। इसकी शुरुआत हर नागरिक के भीतर से होगी। जब आमजन यह ठान लेगा कि वह न रिश्वत देगा, न लेगा, और न ही चुप रहेगा, तब जाकर यह दीमक मरेगी और वही भारत खड़ा होगा, जिस पर हम न केवल गर्व कर सकें, बल्कि अगली पीढ़ी को भी सौंप सकें, एक ईमानदार, आत्मनिर्भर और भीतर से मजबूत भारत।






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