अब न खेत चाहिए, न खाद
व्यंग्य : राजस्थान में मिट्टी भी मिलावटी ‘सोना’ है! बलवंत राज मेहता,वरिष्ठ पत्रकार अब खेती में उर्वरक ज़मीन और असली खाद की ज़रूरत नहीं रही, जनाब! ये सब तो पिछली सदी की बातें थीं। 2025 का भारत अब नकली...

व्यंग्य : राजस्थान में मिट्टी भी मिलावटी ‘सोना’ है!
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ पत्रकार
अब खेती में उर्वरक ज़मीन और असली खाद की ज़रूरत नहीं रही, जनाब! ये सब तो पिछली सदी की बातें थीं। 2025 का भारत अब नकली खाद से खेती करता है और मिलावटी मिट्टी से सोना उगाता है— और वो भी राजस्थान में!
जरा सोचिए, जहां किसान कभी अपने खेत की मिट्टी को मां समझता था, वहां अब वो मां भी “ह्यूमिड एसिड”, “फर्टीलाइज़र स्लरी”, और “डोलोमाइट के चूर्ण” में लिपटी मिलती है। पहले खेतों में गाय-बैल के गोबर की खाद डाली जाती थी, अब वहां डम्पर से मार्बल फैक्ट्री का चूरा आता है— बकायदा “खाद” का लेबल चिपका कर।
आपको ये सब मज़ाक लग रहा हो, लेकिन ये कहानी असली है। राजस्थान के कई जिलों में, सरकारी छापों में पता चला कि बिना लाइसेंस, बिना परीक्षण, बिना आत्मग्लानि के, कुछ कम्पनियां पत्थर और स्लरी को पैक करके किसान के खेत में पहुंचा रही थीं। ऊपर से उन पर ब्रांडिंग भी ऐसी कि किसान को लगे– “अरे वाह! ये तो जैविक भी है और वैज्ञानिक भी!”
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अब नया फार्मूला ये है : पत्थर + भूसा + थोड़ा सा रंग = हाई क्वालिटी फर्टीलाइज़र! किसी ने कहा— “भाई, खेत में फसल नहीं उग रही…!”
जवाब मिला— “फसल तो मीडिया में उगेगी, ताली बजाओ!” कृषि मंत्री खुद फैक्ट्रियों में छापा मारते पाए गए— ये देखकर कुछ व्यापारी उनके पैरों में गिर पड़े और बोले, “साहब! मांग ही सस्ते माल की है, तो हम क्या करें?” हां जी, अब ग्राहक ही जब मिलावटी हो जाए, तो बेचने वाला क्यों शुद्ध रहे?
कुछ अफसरों ने भी बड़ी समझदारी से आंखें मूंद ली थीं। जब पूछा गया कि लाइसेंस क्यों नहीं रोका? बोले— “हमें लगा खाद में ही आत्मा है, शरीर की क्या ज़रूरत!” वाह, क्या दर्शन है! सरकार को चाहिए कि ऐसे अधिकारियों को भारतीय दार्शनिक सेवा में ट्रांसफर कर दे।
अब खबरों में रोज़ लिखा जा रहा है कि “राजस्थान में खाद घोटाला!”, “किसान से धोखा!”, “बिना लाइसेंस खाद फैक्ट्रियां सील!” लेकिन सच्चाई ये है कि अगले हफ्ते फिर वही खाद, वही मिलावट, और वही मजबूरी लौट आएगी, क्योंकि असली फसल तो अखबारों में और भाषणों में उगाई जाती है।
किसान बेचारा सोचता है— “क्या डालूं ज़मीन में?”
सरकार कहती है— “विश्वास डालो, तकनीक भरो!”
और व्यापारी कहता है— “भाई, स्लरी डाल, भाव सस्ता है।” निष्कर्ष यही है: अब खेती के लिए न ज़मीन ज़रूरी है, न खाद। बस थोड़ी-सी मीडिया में जगह हो, और थोड़ी-सी सरकारी चुप्पी, फिर देखिए…, राजस्थान की धरा पत्थर से भी सोना उगलेगी।






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