गैस्ट्रिक कैंसर : भारत के लिए चेतावनी
अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि 2008 से 2017 के बीच जन्म लेने वाली पीढ़ी में से 15.6 करोड़ लोग अपने जीवनकाल में गैस्ट्रिक कैंसर से पीड़ित हो सकते हैं। इस सूची में भारत, चीन के बाद दूसरा...

पेट के कैंसर के बढ़ते मामले, भारी पड़ सकती है अनदेखी
राकेश गांधी,
✍🏻 वरिष्ठ पत्रकार
भारत जहां एक ओर चिकित्सा पर्यटन में वैश्विक पहचान बना रहा है, वहीं देश के भीतर कुछ बीमारियां ऐसी भी हैं जो चुपचाप करोड़ों जिंदगियों को निगल रही हैं। पेट का कैंसर यानी गैस्ट्रिक कैंसर ऐसी ही एक बीमारी है, जो समय पर पहचान न होने की स्थिति में जीवन के लिए बेहद घातक साबित हो रही है। हाल ही में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘नेचर मेडिसिन‘ में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि 2008 से 2017 के बीच जन्म लेने वाली पीढ़ी में से 15.6 करोड़ लोग अपने जीवनकाल में गैस्ट्रिक कैंसर से पीड़ित हो सकते हैं। इस सूची में भारत, चीन के बाद दूसरा सबसे ज्यादा प्रभावित देश है। वहीं ग्लोबोकैन-2022 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 60,000 से अधिक नए मामले सामने आते हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में मृत्यु भी हो जाती है।
क्यों छिपा रह जाता है पेट का कैंसर?
गैस्ट्रिक कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती लक्षण बेहद सामान्य और उपेक्षणीय होते हैं – जैसे अपच, पेट में हल्का दर्द, भूख कम लगना, उलटी जैसा महसूस होना या काला मल आना। यही वजह है कि इसे अक्सर पेट की सामान्य गड़बड़ी समझकर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। जब तक सही निदान होता है, तब तक कैंसर अक्सर गंभीर अवस्था में पहुंच चुका होता है।
भारत में क्यों अधिक है यह खतरा?
इस बीमारी की जड़ें भारत की स्वास्थ्य प्रणाली से ज़्यादा हमारे खानपान, स्वच्छता और जीवनशैली में छिपी हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में गैस्ट्रिक कैंसर के 70–80 फीसदी मामलों के पीछे ‘Helicobacter Pylori’ नामक बैक्टीरिया जिम्मेदार होता है, जो दूषित जल और भोजन से शरीर में पहुंचता है और पेट की अंदरूनी परत को क्षतिग्रस्त करता है।
इसके अतिरिक्त कुछ प्रमुख जोखिम कारक हैं:
– अत्यधिक नमकयुक्त व तैलीय खाना
– प्रोसेस्ड फूड व बार-बार तला गया भोजन
– रेड मीट, बासी खाना और अचार
– धूम्रपान और शराब
– बचपन से दूषित पानी का सेवन
– तनावपूर्ण और असंतुलित जीवनशैली
– पेट की परत पर लगातार जलन उत्पन्न करने वाले तीखे मसाले
क्या उम्र अब कोई सीमा नहीं रही?
पेट का कैंसर पहले आमतौर पर 45 वर्ष से ऊपर के लोगों में देखा जाता था। लेकिन अब इसके मामले 30–40 वर्ष की आयु के युवाओं में भी सामने आ रहे हैं।
यह बदलाव इस बात का संकेत है कि बीमारी अब उम्र की मोहताज नहीं, बल्कि हमारी दिनचर्या, खानपान और पर्यावरणीय स्थितियों से नियंत्रित हो रही है।
क्या इसका इलाज संभव है?
हां, शुरुआती अवस्था में पेट के कैंसर का इलाज संभव है।
उपचार के प्रमुख विकल्पों में शामिल हैं:
– एंडोस्कोपिक सर्जरी
– कीमोथेरेपी और रेडिएशन
– जीवाणु संक्रमण के लिए एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत में लगभग 70 फीसदी रोगी तब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं जब कैंसर तीसरे या चौथे चरण में होता है। इस स्थिति में इलाज जटिल हो जाता है और जीवन की संभावना घट जाती है। यदि समय रहते एंडोस्कोपी, बायोप्सी या यूरिया ब्रेथ टेस्ट जैसे उपाय अपनाए जाएं, तो बीमारी की पहचान और नियंत्रण सरल हो सकता है।
क्या है बचाव का रास्ता?
– दूषित पानी से बचें और उबालकर पानी पिएं
– हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दही और ग्रीन टी का सेवन बढ़ाएं
– अत्यधिक नमक, प्रोसेस्ड फूड, धूम्रपान व शराब से दूरी बनाए रखें
– खाली पेट न रहें और नियमित भोजन करें
– साल में एक बार पेट की सामान्य जांच कराएं
– पेट में जलन, अपच या भूख में बदलाव लगातार हो तो तुरंत जांच कराएं
अब जरूरी है नीतिगत पहल और सामाजिक जागरूकता
– स्वास्थ्य मंत्रालय को चाहिए कि गैस्ट्रिक कैंसर की स्क्रीनिंग को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में शामिल किया जाए।
– प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सस्ती जांच सुविधाएं दी जाएं
– स्कूल पाठ्यक्रमों में पोषण, स्वच्छता और हेल्दी फूड कल्चर को पढ़ाया जाए
– हर जिले में हेल्थ स्क्रीनिंग और पोषण जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएं
रसोई ही बन सकती है हमारी औषधि
भारत में गैस्ट्रिक कैंसर एक खामोश, लेकिन तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। इसका हल सिर्फ़ दवाइयों में नहीं, बल्कि समझदारी, समय पर जांच और संतुलित जीवनशैली में छिपा है। आज जरूरत है कि हम सिर्फ़ बीमार होने पर इलाज कराने की मानसिकता से बाहर निकलें और रोकथाम आधारित सोच को अपनाएं। क्योंकि पेट की सेहत दुरुस्त होगी, तो जीवन अपने आप संतुलित रहेगा। रसोई ही दवा बन जाए, यही है सही दिशा।
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