प्रकृति के साथ चलना ही भविष्य
चिपको आंदोलन के प्रेरक और गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट प्रकृति और विकास के संतुलन पर गहन दृष्टि रखते हैं। हिमालय की संवेदनशीलता वन संरक्षण जलवायु परिवर्तन और जन...

पद्मभूषण पर्यावरणविद चण्डी प्रसाद भट्ट से बातचीत
गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। 23 जून 1934 को उत्तरप्रदेश (अब उत्तराखंड) के चमोली जिलान्तर्गत गोपेश्वर गांव के एक गरीब परिवार में जन्में चण्डी प्रसाद भट्ट वैसे बिरले लोगों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत, सीखने की ललक और लगनशीलता से न सिर्फ एशिया का सबसे प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त किया, बल्कि देश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीन पद्म पुरस्कारों में से दो पद्मश्री और पद्मभूषण दोनों पुरस्कारों के हकदार बने। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के व्याख्यान और विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन का चण्डी प्रसाद जी के जीवन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि महज 26 वर्ष की आयु में जो आमतौर पर कमाने-खाने की उम्र होती है, 1960 में श्रम संविदा समिति की स्थापना की तथा स्वयं श्रमिक बने। 1964 में उन्होंने ‘दशोली ग्राम स्वराज संघ’ की स्थापना कर डाली और अपने क्षेत्र में श्रम की प्रतिष्ठा, सामाजिक समरसता, नशाबंदी, वनों का बचाव, महिलाओं के उत्थान आदि सामाजिक कार्यों में जी-जान से जुट गए। बहुत कम लोगों को मालूम है कि इसी ‘दशोली ग्राम स्वराज संघ’ के बैनर तले बहुचर्चित ‘चिपको आंदोलन’ का 1972-73 में सूत्रपात हुआ था, जिससे हिमालयन क्षेत्रों में वृक्षों का कटान बंद हुआ। कहना न होगा कि ‘चिपको आंदोलन’ ने देश ही नहीं, बल्कि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा और चण्डी प्रसाद भट्ट के नाम की अमिट छाप छोड़ी।
बात चण्डी प्रसाद भट्ट जी को मिले पुरस्कारों की करें तो 1982 में उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, 1983 में अमेरिका का अरकांसस ट्रेवलर्स पुरस्कार, उसी साल अमेरिका के लिटिल रॉक के मेयर द्वारा सम्मानित नागरिक पुरस्कार, 1986 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा पद्मश्री सम्मान, 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा ग्लोबल 500 सम्मान, 1997 में कैलिफोर्निया (अमेरिका) में प्रवासी भारतीयों द्वारा इंडियन फॉर कलेक्टिव एक्शन सम्मान, 2005 में भारत के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा पद्म भूषण सम्मान, 2008 में डॉक्टर ऑफ साइंस (मानद) उपाधि, गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर समेत पांच विश्वविद्यालयों ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया है। 2010 रियल हिरोज लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड सी.एन.एन. आई.बी.एन, -18 नेटवर्क तथा रिलाइंस इंडस्ट्रीज द्वारा सम्मान प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा 2014 में भट्ट को गांधी शांति पुरस्कार और 2019 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार दिया गया। अब तो ऐसा लगता है कि श्री भट्ट के सम्मानित होने से उन्हें मिलने वाले पुरस्कारों का सम्मान बढ़ जाता है। 92 वर्ष की आयु में भी उनकी सक्रियता कम नहीं हुई है। उनकी प्रवृति आज भी अन्वेषी है। राजस्थान टुडे के लिए वरिष्ठ पत्रकार राधा रमण ने चण्डी प्रसाद भट्ट जी से विभिन्न विषयों पर खुलकर बातचीत की है। प्रस्तुत है मुख्यांश –
राधा रमण : क्या दशोली ग्राम स्वराज संघ अस्तित्व में है? अगर हां, तो उसकी भूमिका क्या रहती है। उसकी भविष्य की योजनाएं क्या-क्या हैं ?
चण्डी प्रसाद : बिलकुल अस्तित्व में है। हालांकि मैं, पिछले तीन दशक से इस संगठन में नाममात्र का भी सदस्य नहीं हूं। इसकी कार्यकारिणी समिति से मैं पहले से ही मुक्त हूं। कभी-कभी मार्गदर्शक की भूमिका में रहता हूं। दशोली ग्राम स्वराज संघ द्वारा ग्रामीणों, खासतौर से महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर पौधरोपण और वन संरक्षण का कार्य निरंतर जारी है। इधर, चण्डी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र जो स्थानीय युवाओं द्वारा संचालित किया जा रहा है, हमारी वन संरक्षण और पर्यावरणीय जन-जागरूकता के प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने की दिशा में सक्रिय हैं। ये अन्य कार्यों के साथ बुग्यालों के संरक्षण और वनाग्नि की रोकथाम की दिशा में एक दशक से बेहतरीन कार्य कर रहे हैं। जहां तक भूमिका और भविष्य की योजनाओं की बात है, हमारा काम पूरा कहां हुआ है? ग्राम विकास और हिमालय संरक्षण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। इसके तहत पौधरोपण, इको डवलपमेंट कैंपों का सिलसिला जारी है। प्रसिद्ध कृषि विज्ञानी डा. एम.एस. स्वामीनाथन, अनिल अग्रवाल, सुनीता नारायण, बादल दास, अशोक सैकिया, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंग्दोह आदि दशोली ग्राम स्वराज संघ में इन शिविरों में आते-जाते रहे हैं।
राधा रमण : आप चिपको आंदोलन के सूत्रधार और संस्थापक रहे हैं। कभी चिपको आंदोलन की देश-दुनिया में चर्चा होती थी। आजकल चिपको आंदोलन मद्धिम क्यों पड़ गया है। क्या चिपको आंदोलन अब इतिहास बन गया है?
चण्डी प्रसाद : चिपको आंदोलन का फैसला ‘दशोली ग्राम स्वराज संघ’ की बैठक में आम-राय से लिया गया था। सूत्रधार आम लोग हैं, चिपको में सूत्रधार एवं संस्थापक जैसी बात नही है। यह लोगों का, लोगों द्वारा आरंभ किया गया आंदोलन है। इसमें गांव के लोग और पढ़े-लिखे लोग दोनों की समझ थी। हां, आगे चलकर कमान जरूर महिलाओं के हाथ में थी। श्यामा देवी, गौरा देवी, कलावती देवी, सावित्री देवी आदि अनेक-अनेक देवियों ने उस मुहिम को अंजाम तक पहुंचाया। किस- किसका नाम लें। चिपको आंदोलन से यह साबित हो गया कि महिलाओं में जोखिम कम करने की बेहतर समझ होती है। हमलोग तो नेपथ्य में थे। उसका असर भी हुआ। चिपको आंदोलन 1973 में शुरू हुआ था। बछेर गांव में बड़ी संख्या में पेड़ कटने वाले थे। जन सहयोग से पेड़ कटने से बचे। 1974 से अलकनंदा घाटी में पेड़ों का कटान बंद है। 1978 में सरकार ने आदेश लाकर पेड़ों का कटान पूरी तरह से रोक दिया है।
राधा रमण : आपने जन सहयोग से खेल का सामान बनाने वाली कंपनी साईमन को तो पेड़ काटने से रोक दिया था, लेकिन विकास के नाम पर सरकार को पेड़ काटने से क्यों नहीं रोक पा रहे हैं ? सरकार लोकलाज की अनदेखी करने लगी है अथवा जन सहयोग कम होने लगा है ?
चण्डी प्रसाद : देखिए, पहाड़ी जीवन मैदानों की अपेक्षा काफी दुरूह होता है। पहाड़ों के लोगों को भी मूलभूत सुविधाएं मिलनी चाहिए। आखिर वे भी मनुष्य हैं। सड़क, बिजली, पानी की उनकी भी जरूरतें होती हैं। पहाड़ों के लोगों ने सैकड़ों वर्षों से कष्टपूर्ण जीवन बिताया है। अब भी कष्ट में जी रहे हैं। लेकिन निर्माण के दौरान इस तरह की तकनीकी का उपयोग होना चाहिए, जिससे पहाड़ के पारिस्थितिकी-तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। और इसमें यदि धनराशि ज्यादा खर्च होती है तो वह देशहित में वहन करने में किसी तरह की झिझक नहीं होनी चाहिए। सड़क की ही बात करें तो इनका निर्माण इस तरह से होना चाहिए, जिससे पहाड़ों की स्थिरता बनी रहे। सड़क बनाते समय कट और फिल तकनीकी का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए, जिससे सड़कों के निर्माण से होने वाली आपदा और क्षति को कम किया जा सकता है। दरअसल, समस्या दूसरी है। विकास कार्यों का मुआवजा सिर्फ जिनकी जमीन ली जाती है उनको ही दिया जाता है, जबकि सड़क के निर्माण से निकले मलबे के अनियोजित प्रबंधन से आसपास के किसानों को ज्यादा नुकसान होता है। ऐसा पहाड़ी क्षेत्रों की बनावट और बसावट के कारण होता है। रही जन सहयोग कम होने की बात, तो मुझे ऐसा नहीं लगता है। यह तो लोगों के सहयोग से लोगों की भलाई और प्रकृति संरक्षण तथा हिमालय की हिफाजत का काम है। इसमें सबका भला है। हमारा कार्य लोगों को जागरूक करना रहा है और जब भी जरूरत पड़ती है लोग आगे आते रहे हैं।
राधा रमण : पिछले कुछ वर्षों से कभी बिजली उत्पादन के नाम पर तो कभी पहाड़ों पर सड़कों की जाल बिछाने के नाम पर और अब तो ऑल वेदर रोड बनाने के नाम पर डायनामाइट लगाकर पहाड़ों का सीना छलनी किया जा रहा है। आप हिमालय की तड़प को किस नजरिये से देखते हैं ?
चण्डी प्रसाद : पहाड़ों पर डायनामाइट का प्रयोग तत्काल बंद होना चाहिए। इससे नुकसान ज्यादा होता है। इससे कंपन होती है, अस्थिरता बढ़ती है। निर्माण कार्य से जुड़े लोगों को यह बात समझनी चाहिए। सड़क निर्माण के अब कई नये तरीके हैं। डायनामाइट से जब पहाड़ दरकते हैं तो जोशीमठ जैसी त्रासदी आती है। भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। हमें यह समझना पड़ेगा कि जहां आज हिमालय खड़ा है वहां पहले समुद्र था। फिर पहाड़ बना। विशेषज्ञ मानते हैं कि हिमालय अपेक्षाकृत युवा पहाड़ है, आज भी ऊपर उठ रहा है। बहुत ही संवेदनशील है, थोड़ी सी छेड़छाड़ से यह दरकने लगता है। इसलिए यहां भूस्खलन होता रहता है।
राधा रमण : आपकी समझ से हिमालय का संरक्षण जरूरी है ?
चण्डी प्रसाद : बिलकुल। सिर्फ हिमालय का ही नहीं, बल्कि जहां-जहां पहाड़ हैं, पश्चिमीघाट, पूर्वी घाट के पहाड़ों का भी संरक्षण हो। ऐसी किसी भी गतिविधि को हतोत्साहित किया जाना चाहिए जिससे इनकी संवेदनशीलता बढ़ती हो। उन सभी का संरक्षण होना चाहिए। आपको बता दूं कि वर्ष 2008 में जो बिहार में कोशी नदी में प्रलयकारी बाढ़ आई थी, कोशी बैराज टूट गया था, जिससे विहार के आठ जनपद प्रभावित हुए थे। वह बिहार की नदियों से आई बाढ़ नहीं थी। वह नेपाल के पहाड़ों से आई थी। आज देखिए, सिर्फ उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू कश्मीर ही बारिश और भूस्खलन से आपदाग्रस्त नहीं हैं, बल्कि सिक्किम समेत पूर्वोत्तर और केरल के वायनाड के पहाड़ भी आपदाग्रस्त हैं। बर्बादी सभी जगह हो रही है, कहीं कम तो कहीं ज्यादा। इसलिए पहाड़ों का संरक्षण जरूरी है। हमारे उत्तराखंड में रोनेवाले कमजोर बच्चे को ‘प्यांकू’ कहते हैं। मैं तो यही कहूंगा कि हिमालय भी ‘प्यांकू’ (रोनेवाला बच्चा) है। इसलिए उसकी हिफाजत जरूरी है। यहां से उद्गमित गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु बौखलाएंगी ही। यदि हिमालय खुशहाल रहेगा तो मानव जीवन के साथ-साथ असंख्य जीव-जन्तु भी खुशहाल रहेंगे। दूसरी तरफ हिमालय पीड़ित रहेगा तो उस पर आश्रित सभी जीव-जन्तु आपदाग्रस्त रहेंगे। संकट आनेवाला है और दो ही विकल्प हैं … सुधरो या फिर टूटो। पहाड़ों को संरक्षण देने से इसकी मारक क्षमता कम हो सकती है।
राधा रमण : आजकल हिमालय के ग्लेशियरों की भी खूब चर्चा है। वे कितने खतरनाक हैं ?
चण्डी प्रसाद : ज्यूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय पर ग्लेशियरों की संख्या 9575 है। उधर, इसरो ने उपग्रह के सर्वे में ग्लेशियरों की संख्या इससे ज्यादा बताई हैं। सिक्किम में ग्लेशियर से बनी 14 झीलें बहुत खतरनाक हैं। ग्लेशियर बर्फ के पहाड़ होते हैं जो प्राकृतिक तटबंध के सहारे टिके होते हैं। दुनिया का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा बढ़ गया है, जिससे ग्लेशियरों के अंदर ग्लेशियरजनित झीलों का आकार और संख्या बढ़ रही है। कल्पना कीजिए, यदि किसी दिन ये ग्लेशियर पिघल गए और तटबंध टूट गया तो मनुष्य के साथ-साथ पहाड़ों के जीव-जन्तुओं के लिए कितना बड़ा खतरा हो जाएगा। आखिर, उनकी भी तो आयु कभी न कभी पूरी होगी ही। इसलिए पहाड़ों की संवेदनशीलता से खिलवाड़ उचित नहीं है। दुनियाभर के विशेषज्ञों को इस पर विचार करना चाहिए। पहाड़ों पर पेड़ और हरी घास को बढ़ावा देना चाहिए।
राधा रमण : आजकल जलवायु परिवर्तन के खतरे से न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया चिंतित है। इस पर आप का क्या कहना है ?
चण्डी प्रसाद : बिलकुल, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहाड़ और समुद्र दोनों पर दिखाई दे रहा है। यह कोई एक दिन की बात नहीं है। स्थिति बिगड़ते-बिगड़ते यहां तक पहुंच गई है। हम अब भी सचेत नहीं हुए तो तबाही तय है। अतिवृष्टि, बाढ़, सूखा, तूफान, भूकंप, भूस्खलन आदि जलवायु परिवर्तन के ही खतरे हैं।
राधा रमण : पहाड़ों पर पहुंच आसान हो गई है, लेकिन जीवन यात्रा कठिन हो गई है। ऐसा क्यों है ?
चण्डी प्रसाद : बहुत ही अच्छा सवाल किया है। ऐसा कई कारणों से हो रहा है। पहाड़ों के जंगल कम हो रहे हैं। लोग पानी कम होने पर नदियों की धारा के बीच अथवा नदियों के डूब क्षेत्र में घर बनाने लगे हैं। पहाड़ों पर कोलाहल बढ़ रहा है, जबकि पहाड़ों की प्रवृति शांत है। पिछले 4- 5 दशकों से पहाड़ों पर आपदाएं बढ़ रही हैं। जब अटल जी की सरकार थी, हमने उन्हें सचेत करते हुए एक रिपोर्ट भेजकर लिखा था, ‘पहाड़ों और पहाड़ों के निवासियों पर ध्यान देने की जरूरत है। पूर्व की आपदाओं का अध्ययन होना चाहिए, ताकि आनेवाली पीढ़ी सुरक्षित हवा में सांस ले सके। बुग्याल के ऊपरी क्षेत्र पर प्राकृतिक गतिविधियों पर नजर रखने की जरूरत है।’
राधा रमण : भारत धार्मिक देश है और अधिकतर धार्मिक स्थल पहाड़ों पर हैं। आवागमन की सुविधा होने के कारण लोगों की गतिविधियां बढ़ गई हैं। आप क्या कहेंगे ?
चण्डी प्रसाद : जहां तक संभव और सुगमता हो लोगों को पहाड़ पर जरूर जाना चाहिए। लेकिन जहां जाएं वहां की क्षमता का ध्यान रखना चाहिए। प्रकृति संरक्षण की मान्यताओं का पालन करना चाहिए। धार्मिक यात्रियों को धार्मिक यात्रा का कष्ट भी उठाना चाहिए।
राधा रमण : आखिरी सवाल, नई पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहेंगे ?
चण्डी प्रसाद : यही कि प्रकृति के साथ मिलकर चलेंगे तो लाभ में रहेंगे। जिन्दगी का सफर आनन्ददायी होगा। मैंने तो 1970 में अलकनंदा नदी की बाढ़ और तबाही के बाद ही खुद को प्रकृति के सुपुर्द कर दिया था। हमारा प्रयास प्राकृतिक गतिविधियों पर रोना नहीं, बल्कि नुकसान कम करने पर होना चाहिए। वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इस पर काम करें तो बात बने।






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