जब दर्द असहनीय हो, तो जाने देना भी प्यार है
यह लेख असहनीय पीड़ा से जूझते मरीजों और उनके परिजनों की उस मानसिक स्थिति को उजागर करता है, जहां जीवन और गरिमा के बीच कठिन निर्णय सामने खड़ा होता है। इच्छामृत्यु, लिविंग विल और सामाजिक दृष्टिकोण के...

गरिमापूर्ण मृत्यु और संवेदनाओं के बीच समाज का कठिन सवाल
डॉ. मल्लिका बिश्नोई,
सहायक प्राध्यापक, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय, मोहाली, पंजाब
राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में रहने वाली सुमित्रा देवी पिछले छह साल से अपने पति की सेवा कर रही हैं। छह साल। दो हजार से भी ज्यादा सुबहें जब वे उठी हैं इस उम्मीद के साथ कि शायद आज वे कुछ बोलें, शायद आज उनकी आंखों में थोड़ी पहचान झलके, शायद आज वे एक बार उनका नाम लें। लकवे ने उनके पति का सब कुछ छीन लिया, आवाज, हरकत, पहचान। वे सांस लेते हैं, बस इतना। सुमित्रा नहलाती हैं, खाना खिलाती हैं, दवाई देती हैं और रात को सोने से पहले उनका हाथ थामकर चुपचाप पूछती हैं, “सुन रहे हो?” जवाब कभी नहीं आता। फिर भी पूछती हैं। क्योंकि यही एक धागा बचा है जो उन्हें उस इंसान से जोड़े हुए है जिसे वे प्यार करती हैं। जब कोई करीबी पूछता है कि कैसा लगता है तो वे बस इतना कहती हैं, “भगवान उन्हें उठा ले, यह तकलीफ अब देखी नहीं जाती।” और फिर खुद ही सहम जाती हैं, जैसे यह सोचना भी किसी पाप से कम नहीं था।
सुमित्रा देवी अकेली नहीं हैं। इस देश में ऐसे लाखों परिवार हैं जो किसी अपने को असहनीय पीड़ा में तड़पते देख रहे हैं, जो हर रात सोते हैं तो एक अजीब सा अपराधबोध लेकर, जो हर सुबह उठते हैं तो एक ऐसे सवाल के साथ जिसका जवाब कोई नहीं देता। वह सवाल यह है कि जब किसी के ठीक होने की कोई संभावना न हो, जब डॉक्टर खुद कह दें कि अब कुछ नहीं होगा, जब वेंटिलेटर सिर्फ सांसें गिन रहा हो जिंदगी नहीं दे रहा, तो क्या उस इंसान को इसी तरह रखते जाना सच में प्यार है? या यह हमारी अपनी तसल्ली के लिए है कि हमने सब किया जो कर सकते थे?
यह सवाल असहज है। यह सवाल दिल को तकलीफ देता है। लेकिन यही सबसे जरूरी सवाल है जो हमारा समाज आज तक पूछने से डरता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु को लेकर जो दरवाजा खोला है वह केवल कानूनी नहीं है, वह एक इंसानी स्वीकृति है कि जिंदगी के साथ गरिमा भी जरूरी है। जब गरिमा पूरी तरह छिन जाए, जब कोई इंसान सिर्फ मशीन के सहारे सांस ले रहा हो, जब उसकी आंखों में न पहचान हो न दर्द का एहसास, तो उसे इस अवस्था में रखते जाना दया नहीं, कभी कभी यह एक तरह की निर्दयता बन जाती है जिसे हम प्यार का नाम देते हैं।
अब बात करते हैं उस परिवार की जो वेंटिलेटर हटाने का फैसला करता है। उस बेटे की जो डॉक्टर के सामने कांपते हाथों से वह कागज साइन करता है। वह बेटा कमजोर नहीं है। वह निर्दयी नहीं है। वह शायद उस कमरे में मौजूद सबसे साहसी इंसान है क्योंकि वह वह काम कर रहा है जो उसके पिता ने शायद कभी खुद चाहा होता अगर वे बोल सकते। वह अपने दर्द से बड़ा अपने पिता का दर्द रख रहा है। और इसी इंसान को समाज कठघरे में खड़ा करता है। रिश्तेदार कहते हैं पैसा बचाने के लिए छोड़ दिया। पड़ोसी कहते हैं बेटे ने मार दिया। और वह बेटा जिंदगी भर यह बोझ उठाए घूमता है, अकेला, टूटा हुआ, बिना किसी के एक शब्द की सहानुभूति के।
यह हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना है। हम उस परिवार से सवाल नहीं पूछते जिसने अपने बुजुर्ग को छह साल वेंटिलेटर पर रखकर उनकी हर सांस को तड़पन में बदल दिया। हम उस परिवार को जज करते हैं जिसने तकलीफ को और न बढ़ाने का फैसला किया। हम सांसें गिनना जानते हैं, जिंदगी का मतलब समझना अभी बाकी है।
एक और पहलू है जिस पर बात होनी चाहिए। जब कोई मरीज महीनों या सालों से बेहोशी में हो, जब उसने कभी यह नहीं बताया कि ऐसी स्थिति में वह क्या चाहेगा, तो परिवार पर जो मानसिक बोझ पड़ता है वह शब्दों में नहीं कहा जा सकता। इसीलिए विकसित देशों में “लिविंग विल” का चलन है, यानी एक लिखित इच्छापत्र जिसमें व्यक्ति पहले से बता देता है कि अगर वह कभी ऐसी अवस्था में पहुंचे तो उसके साथ क्या किया जाए। भारत में यह अवधारणा अभी शैशवावस्था में है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे मान्यता दी है पर समाज में इसकी जागरूकता न के बराबर है। अपने परिवार से यह बात करना, अपनी इच्छाएं लिखकर रखना, यह मृत्यु का उत्सव नहीं है। यह अपने प्रियजनों को एक असंभव फैसले से बचाने का सबसे बड़ा उपहार है जो आप उन्हें दे सकते हैं।
जाने देना हार नहीं है। कभी कभी यही सबसे गहरा, सबसे निःस्वार्थ और सबसे सच्चा प्यार होता है। जिस तरह एक माँ अपने बच्चे को दूर जाने देती है यह जानते हुए कि दूरी तकलीफ देगी, पर यही उसके बच्चे के लिए सही है, उसी तरह किसी अपने को असहनीय पीड़ा से मुक्त करने की इच्छा रखना भी उतना ही पवित्र है। बस फर्क इतना है कि पहले वाले प्यार को समाज समझता है और दूसरे को समझने से आज भी इनकार करता है।
सुमित्रा देवी आज भी हर सुबह उठती हैं। हाथ थामती हैं। पूछती हैं, “सुन रहे हो?” जवाब नहीं आता। शायद जवाब कभी नहीं आएगा। पर उनके मन में जो सवाल है, जो थकान है, जो प्यार है और जो दर्द है, वह सब एक साथ जिंदा है। उन्हें किसी की सहानुभूति नहीं चाहिए। बस इतना चाहिए कि कोई उनके उस एक जुमले को सुने जो वे रात के अँधेरे में कहती हैं और जिसे सुनकर कोई उन्हें गलत न समझे।
क्योंकि जो इंसान छह साल से किसी को प्यार करते हुए टूट रहा है, उसके मुंह से निकला हर शब्द प्यार ही है, चाहे दुनिया उसे कुछ भी नाम दे





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