जांबाज स्वतंत्रता सेनानी अचलेश्वर प्रसाद शर्मा ‘मामा’
अचलेश्वर प्रसाद शर्मा, जिन्हें लोग स्नेह से 'मामा' कहते थे। वे केवल पत्रकार नहीं थे, वे उस समय की स्याही में भी क्रांति खोजने वाले दृष्टा...

उनकी लेखनी की नोक पर जनाक्रोश की ज्वाला थी, और हृदय में एक स्वर्णिम भारत का सपना। ‘प्रजा सेवक’ उनका अखबार नहीं, जनमानस की गूंगी पुकार का घोष था, जिसने रियासतों में सन्नाटा तोड़कर लोकतंत्र की गूंज पैदा की। यह केवल कागज़ का टुकड़ा नहीं था, यह उस दौर का अखबार नहीं, एक आंदोलन था — जिसमें हर पंक्ति जनविद्रोह का बिगुल बन जाती थी।
और साथ थीं उनकी धर्मपत्नी, कृष्णा देवी शर्मा — एक प्रेरणा की मूर्ति, जो चूल्हा-चौका नहीं, चिंगारी बनकर मैदान-ए-जंग में उतरीं। यह दंपति कोई साधारण जोड़ा नहीं था, बलिदान और विश्वास की मूर्त छाया थी, जो एक-दूसरे की शक्ति बन, हर ज़ुल्म को चुनौती दे रहे थे।
1930 से 1942 तक, शर्मा दंपति की कहानी स्याही में लिपटी स्वतंत्रता की महागाथा है, जिसमें हर गिरफ्तारी एक अध्याय है, और हर अख़बार की प्रति एक क्रांति की गवाही। सामंती दुर्गों के दरवाज़े उनके शब्दों से कांप उठे, और जनता ने उन्हें ‘अवाजों का आकाशदीप’ मान लिया।
उनकी यात्रा बताती है — जब शब्दों में आत्मा बसती है, तो वे तलवार से तीखे और सूर्य से उजले हो जाते हैं। शर्मा जी का जीवन एक संदेश है — “क्रांति केवल नारों से नहीं आती, उसे विचारों के बीज, त्याग की मिट्टी और सत्य की वर्षा चाहिए होती है।”
ऐसे जांबाज़ पत्रकार और उनकी सहधर्मिणी को शत-शत नमन, जिनकी कलम ने गुलामी की जंजीरों में कंपन पैदा कर दिया।






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