जोधपुर की धरा के डा. मनमोहन शर्मा बने वैश्विक वैभव
डॉ. मन मोहन शर्मा कोई एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि विज्ञान की वह ज्वाला हैं, जो जोधपुर की रेत से उठी और समूचे विश्व में उजास भर...

राजस्थान की सुनहरी रेत में अक्सर सिर्फ किले और कहानियां नहीं जन्म लेतीं—कभी-कभी वहाँ से वह बीज भी फूटते हैं जो वैश्विक विज्ञान की भूमि पर वटवृक्ष बन जाते हैं। डॉ. मनमोहन शर्मा ऐसे ही एक चमत्कारी बीज थे, जो जोधपुर की मिट्टी में जन्मे और ज्ञान की वर्षा से सींचकर पूरी दुनिया में फैले।
वे रसायनों के नहीं— सम्भावनाओं के रचनाकार थे। महज 27 वर्ष की आयु में केमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर बन जाना, ऐसा था जैसे किसी युवा वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला की दीवारें लांघकर भविष्य की नींव रख दी हो। यूडीसीटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के वे पहले ऐसे प्रोफेसर बने, जिन्होंने निदेशक का पद संभाला— एक ऐसा कीर्तिमान, जो किसी रासायनिक सूत्र से भी अधिक सटीक और प्रेरणादायक था।
उनकी प्रयोगशाला में न केवल रासायनिक अभिक्रियाएं होती थीं, बल्कि वहां विचार, संस्कृति और विज्ञान का ऐसा संलयन होता था जो मानवता को दिशा देने लगा। भारत की सीमाओं से निकलकर वे ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी के फेलो बने। यह सम्मान प्राप्त करने वाले वे पहले भारतीय इंजीनियर थे। जैसे किसी मरुधर की बात विश्ववाणी बन गई हो।
पद्म भूषण (1987) और पद्म विभूषण (2001) उनके व्यक्तित्व के रासायनिक संतुलन की भारत सरकार द्वारा की गई प्रतिष्ठा थी।
इसके अलावा—
लीवरहल्मे मेडल (1996) रसायन विज्ञान में वैश्विक योगदान का प्रमाण था,
शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (1973) उनके अनुसंधान की ऊँचाइयों का संकेत,
फिक्की पुरस्कार (1981), विश्वकर्मा पदक (1985), जीएम मोदी पुरस्कार (1991), और
मेघनाद साहा पदक (1994) जैसे अनेक सम्मान, उनके बहुआयामी कार्यों की गवाही देते हैं।
विश्वविद्यालयों के गलियारों से लेकर WHO जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के मंचों तक, डॉ. शर्मा का ज्ञान एक दीपक की तरह जलता रहा, जो सिर्फ दिशा नहीं देता, बल्कि प्रेरणा भी भरता है।
डॉ. मनमोहन शर्मा कोई एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि विज्ञान की वह ज्वाला हैं, जो जोधपुर की रेत से उठी और समूचे विश्व में उजास भर गई। वे साबित करते हैं कि यदि सोच में तपन हो और ज्ञान में दिशा— तो मरुभूमि से भी मेधा की गंगा बह सकती है।






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