जोधपुर में सोना-चांदी के सिक्कों का ऐतिहासिक सफर
सन 1780 में महाराजा विजय सिंह के शासनकाल में जोधपुर की टकसाल में पहली बार चांदी और सोने के सिक्के ढाले गए, जिन्हें विजय शाही सिक्के कहा...

जोधपुर नगरी सिर्फ रंगों और किलों के लिए नहीं, बल्कि अपनी खनकती विरासत — सोना-चांदी के सिक्कों के लिए भी प्रसिद्ध है। सन 1780 में महाराजा विजय सिंह के शासनकाल में जोधपुर की टकसाल में पहली बार चांदी और सोने के सिक्के ढाले गए, जिन्हें विजय शाही सिक्के कहा गया। ये सिक्के महज़ मुद्रा नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और शुद्धता के प्रतीक थे।
इन सिक्कों को त्रिमूर्ति सिक्के भी कहा गया, क्योंकि इनमें मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और मां सरस्वती की छवियाँ उकेरी जाती थीं। पारंपरिक टकसाल में चांदी को गलाकर सांचों में ढाला जाता और 99% शुद्धता की सरकारी मुहर लगाई जाती — जो आज भी जोधपुर सर्राफा बाजार की पहचान है।
विशेष “कळदार” सिक्के, जिनका वजन 11.664 ग्राम होता है, अपनी शुद्धता के कारण खूब लोकप्रिय हैं। धनतेरस पर चांदी के सिक्के खरीदना जोधपुर की पुरानी परंपरा है।
इतिहास में और भी सिक्के चर्चित रहे — माधोसिंह और ईश्वरी सिंह के नाम से, और 1858 से पहले के सिक्के शाह आलम के नाम से ढले। लेकिन महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के काल में आए भयंकर अकाल ने इस परंपरा को कुछ समय के लिए थाम दिया। आज ये सिक्के, समय की धरोहर बनकर, इतिहास की चमकदार गवाही देते हैं।






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