दईजर की गुफा : धरती की खामोश सांसों में छिपा पाताललोक का दरवाज़ा
दईजर की गुफाएं केवल चट्टानों का संयोग नहीं, यह पृथ्वी के सीने पर खिंची वो अनकही लकीरें हैं, जिनके भीतर समय सांस लेता है और रहस्य अपनी आँखें मूँदकर बैठा है। ये गुफाएं जैसे धरती की नींद में देखे गए...

दईजर की गुफाएं केवल चट्टानों का संयोग नहीं, यह पृथ्वी के सीने पर खिंची वो अनकही लकीरें हैं, जिनके भीतर समय सांस लेता है और रहस्य अपनी आँखें मूँदकर बैठा है। ये गुफाएं जैसे धरती की नींद में देखे गए सपने हों — जिनके अर्थ खोजते-खोजते विज्ञान भी थक चुका है और आस्था चुपचाप नतमस्तक है।
विदेशी पुरातत्ववेत्ता डॉ. एल्विन रेडफोर्ड ने दईजर गुफा का अध्ययन कर लिखा था: ये गुफाएं सिर्फ प्राकृतिक संरचना नहीं, अज्ञात की ओर सांस लेती हुई रहस्यमयी गलियाँ हैं — कल्पना से भी पुरानी एक गूढ़ रचना।
जब सूर्यनगरी जोधपुर की तपती हवाएं भी दईजर की ओर पहुँचती हैं, तो ठिठक जाती हैं — जैसे कुछ पूछना चाहती हों। कहा जाता है कि रावण की बारात इसी भूलभुलैया से मंडोर पहुँची थी। गुफा का मुंह आज भी गवाह है, लेकिन उसका अंत… वो आज भी अंधेरे में खोया है।
गुफाओं में घुसते ही सामने गणपति की प्रतिमा है, मानो हर यात्री को चेतावनी देती हो — “यह मार्ग तुम्हारे लिए नहीं।” मां जगदंबा का मंदिर उस पार है, जहां साधना है, पर गहराई में पाताललोक की सी गूंज है। वैज्ञानिकों ने रोशनी और ऑक्सीजन की कमी को कारण बताया, लेकिन शायद गुफा खुद नहीं चाहती कि कोई उसके रहस्य को छुए।
कभी यह जलप्रवाही क्षेत्र था, जहां वन्यजीवों की गूंज थी। आज वो सब सन्नाटे में बदल गया है। पर सन्नाटे की भी एक आवाज़ होती है — और दईजर की गुफाएं आज भी कुछ कहती हैं।शायद धरती का गुप्त दरवाज़ा यहीं कहीं है, लेकिन वो केवल उन्हीं को दिखता है जो दुनिया की नहीं, आत्मा की आंखों से देखते हैं।






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