नीला शहर जोधपुर का राज
कहते हैं, जब चूने की उजली देह में नील की एक चुटकी घुलती है, तो जैसे धरती पर आसमान उतर आता है। जोधपुर वासियों ने इसी जादू से अपने शहर को रच...

कहते हैं, जब चूने की उजली देह में नील की एक चुटकी घुलती है, तो जैसे धरती पर आसमान उतर आता है। जोधपुर वासियों ने इसी जादू से अपने शहर को रच दिया — एक ऐसा स्वप्न, जिसमें हर दीवार, हर गली नीले रंग से कहानी कहती है।
किंवदंती है कि रियासत काल में, जब दीमकों ने घरों को चाटना शुरू किया और वास्तुदोष से जीवन बाधित होने लगा, तब किसी सिद्ध साधक ने समाधान सुझाया — “चूने में नील मिलाओ। यह नील घरों को दीमकों से बचाएगा और राहु-केतु की अशुभ छाया भी दूर करेगा।” जोधपुर वासियों ने इस उपाय को अपनाया और जल्द ही नीला रंग उनकी पहचान बन गया।
नील और चूने का यह संगम केवल दीवारों की सजावट नहीं था — यह एक सुरक्षा कवच था। स्नानागारों और शौचालयों को नील मिले पानी से साफ करने का प्रचलन भी इसी मान्यता से जुड़ा, जिससे राहु का प्रभाव शांत होता और घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता। घर के बाहर नील और चूने से बनी रंगोलियां अलक्ष्मी को दूर भगातीं और लक्ष्मी का आवाहन करतीं।
विदेशी यात्रियों की नजर से भी जोधपुर की यह नीली दुनिया छुपी नहीं रही। फ्रांसीसी यात्री हवेल लुसेन ने अपनी यात्रा वृतांत में लिखा — “जोधपुर की गलियां मानो नीले धुंध के सपनों से बुनी हों, जहां हवा भी हल्के नीले रंग में घुली मालूम पड़ती है।”
ब्रिटिश अधिकारी कर्नल जेम्स टॉड ने भी तारीफ करते हुए लिखा – ” यह नीला शहर, अपने वासियों की सामूहिक चेतना और प्रकृति से युद्ध की एक शांतिपूर्ण घोषणा है।”
दंत कथा:
कहते हैं जब राव जोधा ने 1459 में मेहरानगढ़ किले की नींव रखी, तो नगर बसाने का कार्य शुरू हुआ। परंतु निर्माण कार्य में एक समस्या थी — दीमकों ने नई बस्तियों में दीवारों को खोखला करना शुरू कर दिया। तब एक सिद्ध साधु नाथजी महाराज को बुलाया गया। उन्होंने राव जोधा को सलाह दी —
“राजन, अपने नगरवासियों से कहो कि वे अपने घरों की दीवारों को चूने में नील मिलाकर पोतें। नीला रंग आकाश का प्रतिनिधि है, जो घरों में शांति और रक्षा का कवच बनाएगा।”
राव जोधा ने यह आदेश दिया, और धीरे-धीरे पूरा नगर नीले स्वप्न में ढलने लगा। लोग कहते हैं कि तभी से जोधपुर को देवताओं का आशीर्वाद मिला और नगर समृद्धि की ओर बढ़ता गया।
सिर्फ सौंदर्य या परंपरा ही नहीं, जोधपुर की नीली दीवारों के पीछे व्यावहारिक सोच भी थी। गर्मी के भीषण थपेड़ों से बचाव के लिए भी यह नीला रंग वरदान था। नीले मकान सूर्य की तपिश को परावर्तित करते थे, जिससे घर अपेक्षाकृत ठंडे रहते थे।
कहते हैं, कुछ पुराने घरों में कॉपर सल्फेट मिलाकर चूने को रंगा जाता था, जो नीलापन बढ़ाने के साथ-साथ कीटों को भी दूर रखता था।
इसलिए नीला जोधपुर — सिर्फ ईंट-पत्थर की बस्ती नहीं, बल्कि एक जीवंत लोककथा है। यह रंग है आत्मरक्षा का, विश्वास का, और उस अदृश्य सौंदर्य का, जो हर जोधपुरी दिल में बसता है।
“नीला रंग — जहां आसमान, आस्था और आशा — सब एक साथ दीवारों पर खिल उठते हैं।”






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