पद्मश्री मुनि जिनविजय का प्राच्य साहित्य के पुनर्जागरण में योगदान
भारत सरकार ने उन्हें १९६१ में “पद्मश्री” सम्मान से विभूषित किया – और वे पहले जैन मुनियों में से एक बने, जिन्हें यह राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त...

एक साधारण राजपूत बालक से जैन मुनि बनने तक की उनकी यात्रा केवल आत्मिक नहीं थी, वह भारतीय प्राच्य साहित्य के पुनर्जागरण की यात्रा भी थी। मुनिजी ने राजस्थान के हजारों हस्तलिखित प्राचीन ग्रंथों को न केवल खोजा, बल्कि उन्हें संपादित कर प्रकाशित भी किया – जैसे रेगिस्तान में लुप्त हो चुकी नदी को पुनर्जीवित करना।
उन्होंने जोधपुर को शोध और संस्कृति की राजधानी बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर स्थापित किया। राजस्थान पुरातत्व मंदिर (राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान) के रूप में जो संस्था उन्होंने जोधपुर में साकार की, वह आज भी ज्ञान-साधकों की तीर्थ बन चुकी है। मुनिजी द्वारा संपादित ८६ ग्रंथ, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिंदी के गहरे सागर में उतरने का आमंत्रण हैं।
आज जब हम जैन समाज के गौरवशाली अतीत की बात करते हैं, तो मुनिजी का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए – क्योंकि उन्होंने जैन धर्म की तत्त्वचर्चा, साहित्य और दार्शनिक परंपराओं को दुनिया के समक्ष प्रमाण सहित प्रस्तुत किया। यही कारण है कि भारत सरकार ने उन्हें १९६१ में “पद्मश्री” सम्मान से विभूषित किया – और वे पहले जैन मुनियों में से एक बने, जिन्हें यह राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ।
मुनि जिनविजय हमारे लिए मात्र विद्वान नहीं, बल्कि एक चेतना हैं – जो यह सिखाते हैं कि तप, त्याग और तत्त्वज्ञान जब कर्मयोग से जुड़ता है, तो वह एक पूरी सभ्यता को जीवित कर सकता है।जोधपुरवासियों और जैन समाज के लिए उनका जीवन यह संदेश छोड़ता है – रेगिस्तान में भी ज्ञान के वटवृक्ष उग सकते हैं, यदि मन तपस्वी और दृष्टि शोधक हो!






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