मंडोर – जहां तैंतीस करोड़ देवी-देवता पत्थरों में प्रकट होते हैं
वीर भवन में स्थापित 15 विशाल मूर्तियां किसी गाथा के अटूट अध्याय जैसी प्रतीत होती हैं—जिनमें से सात देवताओं की और आठ वीर पुरुषों की...

जोधपुर की ऐतिहासिक गोद में बसा मंडोर कोई साधारण स्थान नहीं, बल्कि यह उस विराट कल्पना की धरती है, जहां तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की उपस्थिति को मूर्त रूप दिया गया है। यहां का वीर भवन केवल एक इमारत नहीं, बल्कि एक धार्मिक-ऐतिहासिक तीर्थ है, जहां देवत्व, वीरता और कलात्मकता त्रिकाल की तरह समाहित हैं।
यहाँ की भूमि पर जब पांव पड़ता है, तो लगता है जैसे इतिहास की नसों पर चल रहे हों। वीर भवन में स्थापित 15 विशाल मूर्तियां किसी गाथा के अटूट अध्याय जैसी प्रतीत होती हैं— जिनमें से सात देवताओं की और आठ वीर पुरुषों की हैं। ये मूर्तियां स्थूल नहीं, जीवंत प्रतीक हैं उन चरित्रों की जो धर्म, साहस और संस्कृति के रक्षक रहे।
महाराजा अजीत सिंह (1763–1781 ई.) के कालखंड में बना यह भवन एक ऐसा भाव-स्थल है, जहां तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के प्रतीक स्वरूपों को श्रद्धा से गढ़ा गया है। मान्यता है कि हिन्दू धर्म की इस अपार देवपरंपरा को यहां साकार करने का प्रयास मूर्तिकारों की अद्भुत साधना का परिणाम है।
यहां चामुंडा जी, कंकाली (भैंसासुरमर्दिनी), गुसांईजी और राव मल्लिनाथ जी जैसी मूर्तियां न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र हैं, बल्कि राजस्थान की वीरगाथाओं की जीवित प्रतिमाएं हैं। मंडोर – वह जगह है जहां पत्थर शिल्प नहीं, बल्कि श्रद्धा, परंपरा और आत्मा गढ़ी जाती है। जोधपुर आने वाला हर पर्यटक यदि मंडोर न जाए, तो समझो उसने शहर की आत्मा को छूने का अवसर गंवा दिया।






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