मेहरानगढ़ की जालियां : पत्थरों में कैद कहानियाँ
इन जालियों की ओट से रानियां दुनिया को निहारती थीं — सब कुछ देखती थीं, मगर खुद पर एक परछाईं तक नहीं पड़ने देती...

जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग की पत्थर की बारीक जालियां सिर्फ सुंदर शिल्प नहीं हैं — ये समय की मौन गाथाएं हैं।
इन जालियों की ओट से रानियां दुनिया को निहारती थीं — सब कुछ देखती थीं, मगर खुद पर एक परछाईं तक नहीं पड़ने देती थीं।
यहाँ निजता और शालीनता का ऐसा अद्भुत संगम था, जो तत्कालीन सामाजिक मर्यादाओं का एक गरिमामय रूप भी था।
एक अंग्रेज़ पत्रकार ने लिखा —“इन जालियों के पीछे खड़े होकर मैंने उन रानियों की मौन सांसें महसूस कीं, जो रेगिस्तान के आसमान के नीचे चुपचाप सपने देखती थीं।”
इटली की एक लेखिका ने लिखा —”यह पत्थर नहीं, कविता है — जो उन जिंदगियों की रक्षा करता था, जो दुनिया को देखती थीं पर उसे छूती नहीं थीं।”
जब तेज धूप इन जालियों से छनकर धरती पर गिरती है, तो लगता है जैसे सदियों पुरानी कोई याद हल्के से मुस्कुरा रही हो। मेहरानगढ़ की ये पत्थर की जालियां आज भी उसी गरिमा और मधुरता से इतिहास की कहानियां बुन रही है।






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