रातानाड़ा: वफ़ा और विश्वास की ज़मीन
रातानाड़ा नाम की उत्पत्ति एक ओर लाल पत्थरों के कुंड से जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर यह एक वफ़ादार कुत्ते 'रातिया' की निष्ठा और एक साहूकार की उदारता की स्मृति में बसा इलाका है। यह स्थान आज प्रेम, विश्वास...

राजस्थानी लोकभाषा में ‘राता’ का अर्थ होता है लाल, और ‘नाड़ा’ का मतलब है कुंड या जलाशय। जोधपुर के एक पुराने इलाके में ऐसे ही लाल पत्थरों से बना एक प्राचीन कुंड है, जो गणेश मंदिर के पास स्थित है।
मान्यता है कि इसी कारण इस स्थान का नाम पड़ा— रातानाड़ा। परंतु इस नाम के पीछे एक और कहानी है— कहीं अधिक भावनात्मक और स्मरणीय।
यह कथा जुड़ी है एक बंजारे और उसके वफ़ादार कुत्ते रातिया से। कहते हैं, एक बार उस बंजारे ने कठिन परिस्थिति में अपनी पूंजी एक साहूकार के पास गिरवी रखी और अपने कुत्ते को उसकी निगरानी के लिए छोड़ दिया। कुछ समय बाद जब बंजारा जोधपुर पहुंचा, तो उसे देखकर हैरानी हुई कि उसका कुत्ता पहले ही वहां पहुंच गया था। साहूकार को संदेह हुआ कि बंजारे ने उसे धोखा दिया है, और आवेश में आकर उसने कुत्ते को मार डाला। बाद में जब बंजारे ने कुत्ते के गले में बंधी वह चिट्ठी पढ़ी, जिसमें लिखा था— “यह कुत्ता न केवल मेरी पूंजी की रक्षा कर रहा है, बल्कि मेरी जान भी बचा चुका है। इसलिए मैं कर्ज़ माफ़ करता हूं और इसे लौटाने भेज रहा हूं।” तो वह स्तब्ध रह गया।
कुत्ते की निष्ठा और साहूकार की उदारता से अभिभूत होकर बंजारे ने वहां एक छत्री (स्मारक) और तालाब बनवाया। आज भी वे निशानियां मौजूद हैं और यही स्थान कहलाया रातानाड़ा, जो अब केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि वफ़ा, प्रेम और कृतज्ञता की ज़मीन बन चुका है।
यह प्रेरक प्रसंग लेखक महेन्द्र सिंह नगर के आलेख से लिया गया है, जिन्होंने इन लोककथाओं को शब्दों में संजोया है। (काल्पनिक चित्र )






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