सिंघी इंद्रराज: जोधपुर राज्य का महान सेनापति
इंद्रराज सिंघी,एक जैन परिवार में जन्मे, अहिंसा के उपासक होते हुए भी जब राज्य की अस्मिता पर आंच आई, तो बुद्धि को अस्त्र बनाया। वे दिखाते हैं कि वीरता केवल तलवार की चमक में नहीं, बल्कि विवेक की चमक में...

इतिहास की धूल में कई ऐसे रत्न छिपे होते हैं, जो समय की चुप्पी में खो जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है — सिंघी इंद्रराज, जोधपुर राज्य के वह सेनापति, जिनका जन्म एक जैन परिवार में हुआ था, पर जिनकी कर्मभूमि युद्धक्षेत्र बनी। उन्होंने न तलवार से, न रक्तपात से, बल्कि बुद्धि, रणनीति और मातृभूमि के प्रति निष्ठा से एक राज्य को पराजय से उबारा। यह कहानी है 19वीं सदी की शुरुआत की — जब जोधपुर पर राजा मान सिंह (1803–1843) का शासन था। राज्य उस समय राजनीतिक और व्यक्तिगत उलझनों में उलझा हुआ था। एक ओर उदयपुर की राजकुमारी कृष्णा का विवाह प्रस्ताव था, दूसरी ओर जयपुर के शासक जगत सिंह (1803–1818) से उसका नाता टूटने के कारण उत्पन्न हुआ युद्ध।
मान सिंह ने जयपुर पर आक्रमण किया, परंतु उनकी इस हठधर्मिता का अंत उनके अपने सरदारों के असंतोष और जयपुर–बीकानेर गठबंधन की हार के रूप में हुआ। पराजित मान सिंह बिसलपुर भागे और वहीं उनके एक जैन सलाहकार चैनमल सिंघी ने उन्हें पुनः जोधपुर लौटने का परामर्श दिया। लेकिन दुर्भाग्यवश, वापसी के बाद मान सिंह ने शक के चलते अपने वफादार दीवानों और सरदारों को पदच्युत कर दिया — जिनमें प्रमुख नाम था इंद्रराज सिंघी का। परंतु महानता की असली परीक्षा तब होती है जब व्यक्ति सत्ता से बाहर होने के बावजूद अपने कर्तव्य को न भूले। इंद्रराज ने कूटनीति की वीणा उठाई और शत्रु शिविर में जाकर युद्ध की बिसात को पढ़ा। उन्होंने जयपुर की सेना की रणनीतियाँ सीखी, और फिर गुप्त रूप से अपने पुराने जोधपुरी साथियों को संगठित किया।
उनकी सोच शतरंज के महारथी जैसी थी — बिना एक चाल खेले, उन्होंने विरोधी के मोहरे खुद उसके विरुद्ध खड़े कर दिए। उन्होंने जोधपुर के भीतर बिखरे आत्मबल को फिर से एकत्रित किया और युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि युद्ध की सोच में जयपुर को पराजित किया। उनकी रणनीति के फलस्वरूप, जोधपुर की घेराबंदी हटी और राज्य को नयी साँस मिली। इंद्रराज सिंघी, एक जैन परिवार में जन्मे, अहिंसा के उपासक होते हुए भी जब राज्य की अस्मिता पर आंच आई, तो बुद्धि को अस्त्र बनाया। वे दिखाते हैं कि वीरता केवल तलवार की चमक में नहीं, बल्कि विवेक की चमक में भी होती है।
आज यह विभूति, यह स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने वाली गाथा, समय की किताब के कोनों में दबी रह गई है। नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि जोधपुर की दीवारें केवल पत्थरों से नहीं बनीं, उनमें इंद्रराज जैसे मनीषियों की चुपचाप रची गई योजनाओं का गार भी है। समय आ गया है — इतिहास की अलमारी खोलने का, और उन पन्नों को फिर से पढ़ने का जिनमें नाम नहीं, प्रेरणाएँ दर्ज हैं। (चित्र काल्पनिक)






No Comment! Be the first one.