हनुमान लंगूर की वैश्विक शोध में प्रो डॉ. मोहनोत का योगदान
डा मोहनोत लंगूरों की आंखों में झाँककर जोधपुर का भविष्य पढ़ते थे – और आज, उन्हीं आंखों में जोधपुर का नाम चमक रहा...

जब दुनिया के वैज्ञानिक अफ्रीका के जंगलों में चिंपैंज़ियों की खोज में लगे थे और अमेज़न के वर्षावनों में जीवन की जटिलताओं को समझने की होड़ मची थी, तब जोधपुर की तपती दोपहरियों में एक साधारण दिखने वाला असाधारण व्यक्ति चुपचाप हनुमान लंगूरों की दुनिया पढ़ रहा था। यह व्यक्ति थे प्रोफेसर डॉ. एस.एम. मोहनोत– जिनके लिए लंगूर कोई सामान्य वन्य जीव नहीं, बल्कि एक जीवंत ग्रंथ थे, जिनमें समाज, व्यवहार, संवाद और चेतना की गहराई दर्ज थी।
उन्होंने जोधपुर के चौपासनी, उम्मेद गार्डन और आसपास के रॉक पठारों पर विचरते लंगूरों को केवल देखा नहीं, बल्कि उन्हें समझा। उनकी दृष्टि वैज्ञानिक ही नहीं, दार्शनिक भी थी। वे लंगूरों के हावभाव, सामाजिक संरचना, संवाद शैली और समूहगत जीवन को एक शोधकर्ता की सूक्ष्मता और एक कलाकार की संवेदनशीलता से पढ़ते थे। जैसे कोई इतिहासकार किसी सभ्यता की कथा लिखता है, वैसे ही उन्होंने लंगूरों की ज़िंदगी को अपने शोधों और लेखन में उकेरा।
उनके शोधों ने पहली बार दुनिया को यह बताया कि प्राइमेट्स केवल घने वनों तक सीमित नहीं, बल्कि भारत के शुष्क रेगिस्तानी इलाकों में भी एक समृद्ध और जटिल सामाजिक जीवन जीते हैं। उन्होंने “प्राइमेट्स ऑफ साउथ एशिया”, “करंट प्राइमेट रिसर्च” और “एनवायरनमेंटल डिग्रेडेशन इन वेस्टर्न राजस्थान” जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों के माध्यम से हनुमान लंगूरों को वैश्विक वैज्ञानिक विमर्श का हिस्सा बना दिया। और यहीं से जोधपुर को मिली एक नई पहचान।
रेत का शहर अब ‘लंगूरों की प्रयोगशाला’ बन चुका था।
यहां की हवाओं में लंगूरों की किलकारियां वैज्ञानिक संकेत बन गईं। जर्मनी, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों से छात्र जोधपुर आने लगे— हनुमान लंगूरों के व्यवहार को समझने और डॉ. मोहनोत के मार्गदर्शन में क्षेत्रीय अनुसंधान करने। यह तपती धरती अब जीवन के रहस्यों को समझने का जीवंत केंद्र बन गई।
उन्होंने स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेज (SDS) की स्थापना की— जो न केवल भारत, बल्कि विश्व में मरुस्थलीय पारिस्थितिकी और प्राइमेटोलॉजी का प्रमुख संस्थान बनकर उभरा। वे राष्ट्रीय प्राइमेट संग्रहालय और प्रजनन केंद्र की स्थापना की परिकल्पना के अग्रदूत भी रहे, ताकि आने वाली पीढ़ियां गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान के लिए प्रेरित हो सकें।
डॉ. मोहनोत ने जोधपुर को वैश्विक शोध मानचित्र पर अंकित कर दिया।
उनकी दूरदृष्टि ने इस ऐतिहासिक शहर को केवल पुरानी हवेलियों और किलों का केंद्र नहीं रहने दिया, बल्कि एक जीवंत जैवविविधता क्षेत्र के रूप में पहचान दिलाई। आज जब कोई विदेशी वैज्ञानिक हनुमान लंगूरों पर काम करता है, तो उसकी यात्रा जोधपुर के उल्लेख से शुरू होती है।
डॉ. मोहनोत ने न केवल प्राइमेटोलॉजी में योगदान दिया, बल्कि पश्चिमी राजस्थान के पर्यावरणीय संकटों— विशेषकर अवैध खनन— पर भी चेतना जगाई। उन्होंने दिल्ली के सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के संस्थापक अनिल अग्रवाल के साथ मिलकर पर्यावरणीय मुद्दों पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
और फिर, 12 सितंबर 2023 को, डॉ. एस.एम. मोहनोत इस संसार से विदा हो गए— लेकिन जोधपुर की स्मृति, शोध की संस्कृति और लंगूरों की आंखों में वे सदा जीवित रहेंगे।
वे लंगूरों की आंखों में झांककर जोधपुर का भविष्य पढ़ते थे– और आज, उन्हीं आंखों में जोधपुर का नाम चमक रहा है।






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