अक्षरधाम मंदिर, जोधपुर : आकर्षक स्थापत्य
नागर शैली भारत की प्रमुख मंदिर स्थापत्य शैलियों में से एक है, जो विशेषतः उत्तर और पश्चिम भारत में विकसित हुई। इस नागर शैली की पश्चिमी भारत में जो विशिष्ट और परिष्कृत रूप विकसित हुआ, उसे ही...

स्थापत्य शैली- नागर शैली में मारू गुर्जर शैली के साथ विशिष्ट स्वामिनारायणीय शैली
डॉ. ज्ञानानंददास स्वामी,
सहायक निदेशक, बीएपीएस स्वामीनारायण अनुसंधान संस्थान, अक्षरधाम, नई दिल्ली
नागर शैली भारत की प्रमुख मंदिर स्थापत्य शैलियों में से एक है, जो विशेषतः उत्तर और पश्चिम भारत में विकसित हुई। इस नागर शैली की पश्चिमी भारत में जो विशिष्ट और परिष्कृत रूप विकसित हुआ, उसे ही “मारू-गुर्जर शैली” या “सोलंकी शैली” कहा जाता है। यह शैली मुख्यतः राजस्थान और गुजरात में 10वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य उत्कर्ष पर थी।
इसके अतिरिक्त उत्तर मध्यकाल में भगवान स्वामिनारायण ने उपर्युक्त शैली को आधार बनाकर एक नई मंदिर शैली को विकसित किया, जिसे स्वामिनारायणीय मंदिर स्थापत्य शैली कहा जाता है। जोधपुर का अक्षरधाम मंदिर इसी मिश्रित शैली में बनाया गया है। यहां इस शैली की मुख्य विशेषताएं दी गई हैं:
मंदिर परिसर – ४२ बीघा
पाषाण -१,११,१११ घनफीट
मुख्य मंदिर – १९१*१८१*९१ फीट
जगती – ११, ५५१ वर्ग फीट
अभिषेक मंडप -११,५५१ वर्गफीट
शिखर – ५
मंडप – १३+१+१
स्तम्भ -२८१
तोरण कमान – १२१
निर्माण सामग्री:
• मुख्यतः जोधपुरी बलुआ पत्थर तथा कहीं कहीं संगमरमर का भी प्रयोग हुआ है। यह मंदिर हमारे प्राचीन स्थापत्य पद्धति से बनाया गया है, जिसमें लौह या अन्य धातु का प्रयोग नहीं किया जाता। दो पाषाण खंडों को एक विशिष्ट ताल-कुंचिका विधि से परस्पर जोड़ा जाता है।
शिल्पी:
पिण्डवाडा, सागवाड़ा, भरतपुर, जोधपुर, जयपुर आदि स्थानों से आए करीब 500 शिल्पियों और कारीगरों ने सात वर्षों में इस मंदिर को पूर्ण किया है।
जगती व बहुतल मंदिर संरचना:
नागर प्रासाद शैली के मंदिर प्राय: एक ऊंचे चबूतरे पर बनते हैं, जिसे जगती कहा जाता है। यहां इस मंदिर में जगती पर मंदिर का प्रथम भूतल है, जिसे अभिषेक मंडप कहते हैं। भगवान स्वामिनारायण की किशोर मूर्ति नीलकंठवर्णी के रूप में यहां प्रतिष्ठित है। यहां इस धातु मूर्ति पर नित्य जलाभिषेक होगा। अभिषेक मंडप तीनों ओर से नक्काशी दार जालीदार पाषाण खण्डों ओर स्तंभों से आवृत्त है।
इसके ऊपर के तल पर मुख्य मंदिर है। मंदिर का गर्भगृह उठकर तीन भिन्न शिखरों के रूप में आसमान को छूता प्रतीत होता है। इस प्रकार गर्भगृह के तीन मुख्य खंड हुए, जिसमें मध्य खंड में भगवान स्वामिनारायण, अक्षरब्रह्म गुणातीतानन्द स्वामी महाराज, प्रथम खंड में राधा-कृष्ण भगवान तथा अंतिम खंड में घनश्याम महाराज की मूर्तियां प्रतिष्ठित होंगी।
मंदिर का मुख्य मंडप ठीक मध्य में है। गुम्बदनुमा इस मंडप की ऊंचाई मुख्य मंदिर के अन्य हिस्सों से बहुत अधिक है, जिससे यहां एक तीसरी मंजिल का निर्माण हुआ है। मंदिर का मुख्य तल गर्भगृह को छोड़कर तीनों दिशाओं से खुला है। मंदिर के ठीक सामने विस्तृत कलात्मक सीढ़ियों का निर्माण किया गया है, जिससे जो भक्त भूतल पर बने नीलकंठ अभिषेक मंडप में न जाना चाहते हों, वे नीचे से इस प्रथम मंजिल पर सीधे ही आ सकते हैं।
मंदिर के इस ऊपरी तल पर आते ही दोनों ओर क्रमश: हनुमान जी और गणपति जी के मंदिर हैं। यहां दर्शन कर भक्त आगे मुख्य मंडप की ओर बढ़ता है।
इस प्रकार यहां कुल पांच शिखर होने से इस मंदिर को पञ्चशिखरीय मंदिर भी कहा जाता है।
प्रदक्षिणा पथ:
मुख्य मंदिर तल पर परिक्रमा खुली रखी गई है। मुख्य मंदिर तल से करीब दो फीट नीचे के इस विशाल तल पर होकर भक्तजन सम्पूर्ण मंदिर की परिक्रमा कर सकते हैं। मुख्य मंदिर तल पर प्रदक्षिणा करते भक्त मंदिर पीठिका जो करीब दो फीट ऊंची है, वहां वेदों, पुराणों के प्रेरणादायी मंत्रों-श्लोकों को पढ़ सकते हैं। यह बड़ी ही विशिष्ट रचना है।
अत्यंत जटिल, महीन और अलंकृत शिल्पकला:
• प्रत्येक दीवार, मंडप, स्तम्भ, छत और प्रवेशद्वार पर बारीक नक्काशी।
• देवताओं, दिग्पालों, संतों, भक्तों की मूर्तियों और पौराणिक कथाओं से युक्त मूर्तिशिल्प।
• स्तम्भों पर बेलबूटों, पशु-पक्षियों व ज्यामितीय आकृतियों की सुंदर नक्काशी।
शिखर की विशिष्ट बनावट:
• नागर शैली के अंतर्गत तीव्र आरोही और लंबवत शिखर यहां दृष्टिगोचर होते हैं। शिखर पर छोटे- छोटे शिखर (उरुश्रुंग), झरोखें और वितान का समावेश इसे अधिक आकर्षक बनाता है।
• शिखर के ऊपर आमलक (कदम्ब फलाकार पत्थर) और उसके ऊपर कलश है।
• ध्वज दंड और ध्वज भी इस शैली की मुख्य विशेषता है।
गर्भगृह, मंडप और अर्धमंडप:
• मंदिर तीन प्रमुख भागों में विभक्त— गर्भगृह, महा मंडप (गुम्बद) और अर्धमंडप है। इसके अतिरिक्त अन्तराल भी है, जो मुख्य मंडप को गर्भगृह से अलग करता है, जिसे कोली मंडप भी कहा जाता है। स्वामिनारायण परम्परा के ब्रह्मचारी संतों के बैठने और पूजा अर्चन करने के लिए इसे बड़े ही विशेष रूप से बनाया जाता है।
• मंदिर के तीनों दिशाओं में आती सीढ़ियों की समाप्ति पर वितान मंडपों की उपस्थिति इस मंदिर की बड़ी विशेषता है।
स्तम्भों की अद्वितीयता:
• परम्परा के अनुसार एक ही बहुकोणीय या वृत्ताकार स्तम्भ के अनेक नक्काशीदार विभाग होते हैं, इन्हें एक के ऊपर एक संयोजित कर अत्यंत भव्य और नयन रम्य बनाया गया हैं। इनके विभाग- खारो, कुम्भी, स्तंभ, ठेकी, भरनी, काटासरो, भेटासरो आदि हैं।
• स्तम्भों में आल भी हैं, जिनमें भगवान के चरित्रों व लीलाओं को अंकित किया गया है।
तोरण द्वार:
• मंदिरों के प्रवेश पर बड़े तोरण-द्वार की उपस्थिति भव्य है। इसके अलावा मंदिर के हर दो सतम्भों को खूबसूरत तोरण से जोड़ा गया है, ये धनुषाकार हैं।
• ये तोरण बहुत सजावटी और कला-कौशल से परिपूर्ण होते हैं। यहाँ इसे हाथियों की सूंड पर से उभारा गया है, जो अत्यंत आकर्षक है।
मनमोहक मूर्तियां:
• यहां १५१ से अधिक बड़ी भाव-प्रधान मूर्तियां हैं, जिनमें अवतारों, ऋषियों की प्रतिमाएं विशेष हैं। इन प्रतिमाओं में शृंगार, भक्ति, नृत्य आदि की स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। यहां गुरु परम्परा की मूर्तियां, गणपति जी तथा शिवस्वरूपों की मूर्तियां अत्यंत मनमोहक हैं।
मंडोवर
– मंदिर की बाह्य दीवारों को मंडोवर कहा जाता है। यहां अति नयन रम्य देवताओं, दिग्पालों, मुक्तों, संतों, भक्तों की मूर्तियों से यह अलंकृत है।
१२. बहु मंजिल
– वैसे तो राणकपुर आदि मंदिरों में बहु मंजिल स्थापत्य है, किन्तु भूमि तल पर अभिषेक मंडप की रचना स्वामिनारायण मंदिरों की अप्रतिम विशेषता है।
स्वामिनारायणीय विशेषताओं के साथ मारू-गुर्जर शैली, नागर परम्परा का सबसे सुंदर और कलात्मक रूप इस मंदिर में निखर उठा है। यह विशिष्ट स्थापत्य शैली जोधपुर के इस अक्षरधाम मंदिर को कई मायनों में अद्वितीय बनाती है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसकी सूक्ष्म शिल्पकला, संतुलित संरचना और अभिनव वास्तुकला है, जिसने पश्चिम भारत की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध किया है। हमारी प्राचीन विरासत को पुनर्जीवित किया है।






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