महाकुंभ नहीं देखा … तो क्या देखा
उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समागम ‘महाकुंभ 2025’ शुरू हो चुका...

राधा रमण
उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समागम ‘महाकुंभ 2025’ शुरू हो चुका है। देशभर के संतों-महंतों और धर्माचार्यों ने पखवाड़ेभर पहले से कुंभ नगरी में डेरा जमा लिया है। मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी है। ऐसा आखिर हो भी क्यों न, मोक्ष की कामना भला किसे नहीं रहती ? अथर्ववेद की टीका में लिखा है कि कुंभ का अर्थ समय का इष्टकाल होता है जो जीवों को एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाता है।
उत्तरप्रदेश सरकार ने महाकुंभ की तैयारियों के लिए 5060 करोड़ का बजट बनाया है। इसमें कितना खर्च होता है यह तो आयोजन के बाद पता चलेगा। इस बार उत्तरप्रदेश सरकार की अपील पर केंद्र ने भी दिल खोलकर खजाना खोला है। केंद्र ने इसके आयोजन के लिए 2100 करोड़ रुपये दिया है। यह पिछले महाकुंभ से करीब चार गुना ज्यादा है। पिछलीबार सरकार ने 1214 करोड़ रुपये आवंटित किया गया था जिसमें 1017 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके थे। हालाँकि उत्तरप्रदेश सरकार ने इस बार महाकुंभ से 2 लाख करोड़ रुपये कमाने का लक्ष्य भी रखा है। राज्य सरकार ने महाकुंभ के दौरान 40 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के प्रयागराज पहुँचने की संभावना जताई है।
सरकार की ओर से महाकुंभ की तैयारियों के तहत कुल 421 परियोजनाओं पर काम किया गया। इनमें सड़क, आवास, परिवहन, पुल-पुलिया और सुरक्षा शामिल है। राज्य सरकार के लोक निर्माण, आवास और नियोजन, सेतु निगम, जल संसाधन, पर्यटन, सिंचाई और नगर निगम पिछले एक साल से आयोजन की तैयारियों में जी-जान से जुटे रहे हैं। राज्य सरकार का कोई न कोई मंत्री हर रोज प्रयागराज में कैम्प किये रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आयोजन की तैयारियों की निगरानी करते रहे।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि ‘महाकुंभ भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का परिचायक है। जो कि भारत समेत पूरी दुनिया को अपनी परंपराओं पर गर्व करने का अवसर प्रदान करता है। इस बार का महाकुंभ भव्य, दिव्य और डिजिटल होगा। मेला परिसर में डेढ़ लाख से अधिक शौचालय बनाए गए हैं, ताकि श्रद्धालुओं को दिक्कत नहीं हो। रेलवे ने कई मेला स्पेशल ट्रेनें चलाई हैं ताकि यात्रियों को आने-जाने में कठिनाई न हो। रेलवे स्टेशन से मेला तक लोकल परिवहन की पुख्ता व्यवस्था की गई है। एक जनवरी से मेला अवधि तक प्रयागराज स्थित बमरौली हवाई अड्डे को अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट का दर्जा दिया गया है, ताकि दुनियाभर से श्रद्धालु महाकुंभ में आ-जा सकें। मेला परिसर के साथ-साथ पूरे प्रयागराज में चप्पे-चप्पे पर चौकसी बरती जा रही है। सादी वर्दी में पुलिस और सुरक्षाबलों के जवान तैनात किये गए हैं। इसके अलावा ड्रोन से भी निगरानी रखी जा रही है। मेला परिसर और शहरभर में रैन बसेरे की व्यवस्था की गई है। होटलों, धर्मशालाओं और अतिथि गृहों को सजाया-संवारा गया है। मेला परिसर में बहुतायत की संख्या में खोया-पाया केंद्र बनाए गए हैं। संगम तट पर स्नान करने और कपड़े बदलने के लिए काफी संख्या में चेंजिंग रूम की व्यवस्था की गई है। हजारों की संख्या में नावों और गोताखोरों को तैनात किया गया है। मेले की कवरेज के लिए मीडिया सेंटर और अलग-अलग मीडिया समूहों के लिए टेंट के आवास की व्यवस्था की गई है। संगम के उस पार कई एकड़ में संतों-महंतों के पंडाल लगाए गए हैं। पूरा वातावरण आध्यात्मिक नजर आता है। कथा-प्रवचन के दौर चल रहे हैं।
सवाल उठता है कि आखिर महाकुंभ क्यों, कब से और कब-कब मनाया जाता है ? शास्त्रों में इस संबंध में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। ऋग्वेद और अथर्ववेद में कुंभ शब्द का तो उल्लेख है लेकिन मेले जैसी कोई बात नहीं है। अपना देश शुरू से ही धर्मभीरु रहा है। ऐसी मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान मिले अमृत कलश को जब दानवों ने देवताओं को पराजित कर हासिल कर लिया तो लुटे-पिटे देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। भगवान विष्णु ने देवताओं से किसी प्रकार अमृत कलश हासिल करने को कहा। फिर योजना बनी कि दानवों से अमृत कलश चुराई जाए। तब इंद्र के पुत्र जयंत को यह जिम्मेदारी दी गई। जयंत की मदद के लिए देवताओं ने चन्द्रमा, सूर्य, बृहस्पति और शनि को सहयोग करने को कहा। बाद में जयंत ने अमृत कलश दानवों के चंगुल से चुरा लिया और स्वर्ग ले गए। कहा जाता है कि अमृत कलश स्वर्ग ले जाने के क्रम में उसकी बूँदें चार स्थानों पर छलक कर गिर गईं। वह चार स्थान थे हरिद्वार, प्रयागराज, नाशिक और उज्जैन। चूंकि इस पूरी प्रक्रिया में 12 दिन लगे थे और मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर देवताओं का एक दिन होता है। इसलिए हर 12 वर्ष के बाद इन चारों स्थानों पर महाकुंभ का आयोजन होता है। इसी प्रकार चूंकि छह दिन के प्रयास के बाद अमृत कलश देवताओं को हासिल हो गया था, इसीलिए हर छह वर्षों के बाद अर्द्धकुंभ आयोजित होता है।
मान्यता यह भी है कि इन ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही कुंभ अथवा महाकुंभ कहाँ आयोजित किया जाए, तय होता है।
कुंभ अथवा महाकुंभ कब कहाँ आयोजित होता है
हरिद्वार – चैत्र माह में जब बृहस्पति, शनि की कुंभ राशि में विराजमान हों और सूर्य मेष राशि में निवास करते हों तो हरिद्वार में महाकुंभ अथवा कुंभ का आयोजन होता है।
प्रयागराज – माघ माह में जब बृहस्पति, वृषभ या मेष राशि में हों और सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों शनि की मेष राशि में हो तो प्रयागराज में महाकुंभ अथवा कुंभ का आयोजन किया जाता है।
नाशिक – भाद्र माह में जब सूर्य और बृहस्पति दोनों सूर्य की सिंह राशि में हों अथवा चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति तीनों अमावस्या के दिन कर्क राशि में हों तो नाशिक में महाकुंभ अथवा कुंभ का आयोजन होता है।
उज्जैन – चौथा महाकुंभ अथवा कुंभ का आयोजन उज्जैन में होता है। यह आयोजन तब होता है जब चैत्र माह में बृहस्पति सिंह राशि में हों और सूर्य मेष राशि में हों।
इसी प्रकार बारी-बारी से चारों स्थानों पर महाकुंभ अथवा कुंभ का आयोजन किया जाता है। मान्यता यह भी है कि इन आयोजनों में शामिल होने, नित्य स्नान के बाद भोजन प्रसाद ग्रहण करने और कल्पवास करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महाकुंभ 2025 के मुख्य स्नान
महाकुंभ के आयोजकों, अखाड़ा परिषद् ने प्रयागराज में 13 जनवरी से चल रहे महाकुंभ में कुल छह मुख्य स्नान बताये हैं। इनमें तीन शाही स्नान घोषित किये गए हैं। वह हैं – 14 जनवरी, मकर संक्रान्ति, 29 जनवरी मौनी अमावस्या और 3 फरवरी वसंत पंचमी। शाही स्नान में नागा साधुओं के अलावा अलग-अलग अखाड़ों के संत-महंत गाजे-बाजे और नृत्य करते प्रसन्न मुद्रा में पहले स्नान करते हैं। फिर आम आदमी को स्नान करने का मौक़ा मिलता है। हमने देखा कि 14 जनवरी शाही स्नान में संतों- महंतों के अलावा करोड़ों लोगों के जनसैलाब ने कैसे उत्साहपूर्वक संगम में स्नान किया। इस दौरान संगम नगरी की फिजां देखते ही बनती थी। जिन्होंने मकर संक्रान्ति पर संगम में डुबकी लगाई वह तो पुण्य के भागी बने ही, जिन्होंने टेलीविजन पर यह दृश्य देखा वह भी धन्य हो गए, उनकी आँखें निहाल हो गईं।
शाही स्नान के अलावा 4 फरवरी को अचला सप्तमी, 12 फरवरी को माघ पूर्णिमा और 26 फरवरी को महाशिवरात्रि को भी मुख्य स्नान है। बताने की जरूरत नहीं है कि शाही और मुख्य स्नान के दिन महाकुंभ में भारी भीड़ जुटती है। महाकुंभ के दौरान किसी भी दिन संगम में डुबकी लगाने का वही महत्त्व होता है जो मुख्य स्नान का होता है। तो देर किस बात की, आप भी जाइए और अपने परिजनों को भी लेकर जाइए महाकुंभ में डुबकी लगाने के लिए। कुछ वर्षों पहले उत्तरप्रदेश सरकार ने नारा दिया था कि ‘यूपी नहीं देखा तो क्या देखा’, हम तो यही कहेंगे कि महाकुंभ नहीं देखा तो क्या देखा!






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