जीवन मूल्यों के संवाहक हैं हमारे बुजुर्ग
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग बीस करोड़ लोग डिप्रेशन का शिकार हैं, जिसमें बुजुर्गों की संख्या बहुत अधिक है। भारत में लगभग बयालीस प्रतिशत कर्मचारी डिप्रेशन और एन्क्जाइटी से...

अकेलेपन से भारत में बीस करोड़ लोग डिप्रेशन का शिकार
डॉ. गौरव बिस्सा,
एसोसिएट प्रोफ़ेसर, राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज बीकानेर
जर्मनी के विख्यात डॉ. फिट्ज़ टालबोट बच्चों की दुसाध्य बीमारियों का इलाज करने में सिद्धस्थ थे। वे पहले बच्चे को दवाई देते और जब दवा काम न करती तो वे अपनी सबसे अनुभवी नर्स को बुलाकर एक पर्ची पकड़ा देते। नर्स बच्चे को लेकर चली जाती और अप्रत्याशित रूप से बच्चा दो से तीन दिन में ठीक हो जाता। लोगों के लिए यह कौतूहल था। एक दिन उनसे समाज के समस्त प्रबुद्धजनों ने जिद करके कहा कि आखिर पर्ची पर लिखी दवा का नाम बताया जाए। डॉ. टालबोट ने पर्ची दे दी। पर्ची पर सिर्फ दो शब्द लिखे थे और वे शब्द थे “दादी मां”। टालबोट ने कहा कि ऐसे बच्चों को कॉटेज वार्ड में बैठी दादी मां दो दिन दुलारती है, प्रेम करती है और बच्चा ठीक हो जाता है। टालबोट ने कहा कि दुसाध्य से दुसाध्य बीमारी का इलाज भी ग्रैंडपेरेंट्स के प्रेम से संभव है। यह है ग्रैंडपेरेंट्स का महत्त्व।
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
महत्त्व बुजुर्गों का
संस्कारों, प्रेम या सच पूछो तो जीवन मूल्यों का संवाहक या कैरियर कौन हैं? माता पिता और उससे भी कहीं ज़्यादा दादा, दादी, नाना, नानी अर्थात ग्रैंडपेरेंट्स अर्थात समाज के बुजुर्गजन। वर्तमान पीढ़ी में ग्रैंडपेरेंट्स और घर के बुज़ुर्ग मानो गायब हैं। बुज़ुर्ग उन संस्कारों के वाहक थे जो दूध में घुली चीनी की तरह होते थे। यानि नजर नहीं आते, लेकिन उनका महत्त्व बहुत है। आज दूध रूपी ऊपरी संसाधन तो हैं लेकिन संस्कारों की मिठास मिसिंग है। इसी वजह से मोटिवेशनल स्पीकर्स का जन्म होता है, क्योंकि अब निराश व्यक्ति कहां जाए? आपने कभी सुना कि तीस-पैंतीस साल पहले युवा डिप्रेशन या एग्जाम एन्क्ज़ाइटी का शिकार हुआ हो? शायद नहीं। उस समय घर के बुज़ुर्ग और ग्रैंडपेरेंट्स स्थिति को संभाल लेते थे। अब ऐसा नहीं है। आज की पीढ़ी परीक्षा में जबर्दस्त परफॉर्मेंस देने के बावजूद ज़िन्दगी की परफॉर्मेंस में कमज़ोर है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है संयुक्त परिवारों की टूटन और बुजुर्गों की उपेक्षा।
रोबोट से दोस्ती
पहले संयुक्त परिवार थे। मोहल्ला भी एक तरह का परिवार ही था जो “सामाजिक पुलिस” का काम करता था। बड़ा परिवार और अनेक रिश्तेदारों की परस्पर निर्भरता के कारण व्यक्ति के मन का गुबार उनके बीच निकल जाया करता था। वर्तमान में इंसान अपनों के बीच भी बहुत अकेला है, क्योंकि वे अपने, “अपने” नहीं अपितु “औपचारिक अपने” हैं। औपचारिक अपनों का अर्थ है किसी विशेष प्रयोजन, लाभ या काम के कारण एकीकृत होना और उसके बाद बिखर जाना। आज के व्यक्ति में इतना अहंकार है कि वो किसी से दोस्ती कर ही नहीं पा रहा। समाचार पत्रों के अनुसार, जापान में अकेलेपन से त्रस्त लोग रोबोट से दोस्ती कर रहे हैं, अर्थात कृत्रिम दोस्तों का सहारा ले रहे हैं। दोस्त में कुछ छोटी- मोटी बुराई हो या आपस में कोई समस्या हो तो उसे सुलझा लेना उचित है।
अकेलेपन से लड़ने को मंत्रालय
जापान में अकेलेपन की समस्या बहुत विकराल है, क्योंकि वहां पर बुज़ुर्गजनों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। इसी कारण से वहां सरकार ने अकेलेपन से लड़ने के लिए एक नया मंत्रालय “मिनिस्ट्री ऑफ़ लोनलीनेस” बनाया है। इस मंत्रालय का काम ही बुजुर्गों का अकेलापन दूर करना, समाज की मुख्यधारा से उन्हें जोड़ना और उन्हें संबल देना है। जिस प्रकार भारत में परिवारों में छीजत हो रही है, तो वो दिन दूर नहीं जब भारत सरकार को भी अकेलेपन से लड़ने के लिए विभाग या मंत्रालय बनाना पड़े।
क्या कहता है शोध?
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग बीस करोड़ लोग डिप्रेशन का शिकार हैं, जिसमें बुजुर्गों की संख्या बहुत अधिक है। भारत में लगभग बयालीस प्रतिशत कर्मचारी डिप्रेशन और एन्क्जाइटी से त्रस्त हैं। डिप्रेशन और एन्क्जाइटी की मूल वजहों में से एक है अकेलापन। अकेलेपन के कारण मन में नकारात्मक भावों का उद्गम होता है, कार्य करने की इच्छा खत्म हो जाती है और इस कारण घुटन और निराशा बढ़ती जाती है। अकेलेपन पर शोध के आंकड़े डराने वाले हैं:
• हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, अकेलेपन के चलते व्यक्ति की आयु तेजी से घटती है। जितनी आयु एक दिन में पंद्रह सिगरेट्स पीने के कारण कम होती है, लगभग उतनी ही उम्र अकेलेपन से त्रस्त होने के कारण भी कम हो जाती है।
• डब्लूएचओ के अनुसार, आत्महत्या का तीसरा सबसे बड़ा कारण अकेलापन है।
• अकेलेपन से पीड़ित व्यक्ति को यह डर होता है कि लोग उनके बारे में नकारात्मक विचार रखते हैं, अतः वो आत्मविश्वास की कमी के चलते उनसे नहीं मिलता।
ह्यूमन लाइब्रेरीज़
अकेलेपन की इस समस्या से लड़ने के लिए, डेनमार्क में ह्यूमन लाइब्रेरीज़ का प्रचलन है। आम तौर पर हम किसी लाइब्रेरी में जाते हैं तो वहां एक पुस्तक किराए पर लेते हैं और उसे पढ़कर लौटाते हैं। ह्यूमन लाइब्रेरी में आप एक व्यक्ति को तीस मिनिट्स के लिए किराए पर लेते हैं और उसके साथ अपने मन की बातों को शेयर करते हैं। इससे वेंटिलेशन होता है और मन हल्का हो जाता है। यह सुनना अजीब लग सकता है, लेकिन यह सच है। यदि कोई आपको फोन करके कुशलक्षेम पूछ रहा है तो इसका अर्थ है कि उसे आपकी परवाह है। कहीं भविष्य में हमें भी ह्यूमन लाइब्रेरी की आवश्यकता न पड़ने लगे? मध्यप्रदेश सहित अनेक मेट्रो सिटीज़ में भी ह्यूमन लाइब्रेरी का प्रचलन हो चला है।
अंतरवैयक्तिक सम्बन्धों से सफलता
शोध के अनुसार, मनुष्य की सफलता में उसके ज्ञान, कौशल, डिग्री, कला और कार्य अनुभव का महत्त्व सिर्फ पंद्रह प्रतिशत के लगभग है। बाकी आपकी पिच्यासी प्रतिशत सफलता का कारण, लोगों के साथ आपके अंतरवैयक्तिक सम्बन्ध हैं अर्थात यदि परस्पर सम्बन्ध अच्छे हैं तो सफलता तय है। महान व्यक्तित्वों ने जीवन में सर्वाधिक महत्त्व आपसी संबंधों को निभाने के लिए दिया। जो बुज़ुर्ग लोग घर से निकलते हैं, घूमते हैं, खेलते हैं, मिलते जुलते हैं; वे अधिक सकारात्मक होते हैं और वे अकेलेपन का अपेक्षाकृत कम शिकार होते हैं।
जो हो रहा है.. वो सर्वश्रेष्ठ है
अकेलेपन से लड़ने के लिए बुजुर्गों का अगाथिज्म दर्शन के साथ जीना उचित है। अगाथिज्म दर्शन के अनुसार “जो हो रहा है, वो सर्वश्रेष्ठ है और अंत में सब अच्छा ही होगा”। ये सोच एक संतुष्टि और अकेलेपन के भय से राहत देती है। दिन में सिर्फ पांच से दस मिनिट्स प्रकृति के बीच बैठना, रोजाना सिर्फ पन्द्रह मिनिट्स पुस्तकें पढ़ना, दस मिनिट्स लोगों से मिलकर उनका हाल पूछना, ग्रेटीट्यूड जर्नल अर्त्थात आभार पुस्तिका बनाकर जीवन के सुखों को रोजाना लिखना आदि अपनाकर बुज़ुर्ग अकेलेपन की पीड़ा को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।
भारतीय दर्शन में छिपा है समाधान
भारतीय दर्शन में अकेलेपन और तनाव को दूर कर उत्तम सम्बन्ध बनाने के कुछ मन्त्र हैं। पहला मन्त्र है “ददाति प्रतिगृह्याति” अर्थात “देना और लेना”। किसी को अपना श्रम देना, उसका स्वास्थ्य पूछने जाना, और किसी की मदद करके उसे कृतार्थ महसूस करवाने को पहला सूत्र माना गया है। मन की बात को कहना और सामने वाले के मन की बात को पूर्ण मनोयोग से सुनने को शास्त्रों में “गुह्याख्याति प्रच्छति” कहते हैं। साथ भोजन करना, सामने वाले व्यक्ति के भोजन की रूचि के अनुसार उसे भोजन करवाना आदि परस्पर संबंधों में सुधार करके व्यक्ति का अकेलापन दूर होता है। शास्त्रों में इसे “भुक्ते भोजयते चैव” कहा गया है। इसके अलावा मित्रों, बंधुओं और समाज के साथ हृदय से जुड़ना, अपनों के लिए उपयोगी बनना और अपने संपर्क सूत्रों के दुर्गुणों या बुरी बातों पर मिट्टी डालते हुए उनके उजले पक्षों पर ध्यान देना ही सार्थक है।
भावी पीढ़ी पर विश्वास करना जरूरी
भारतीय परिवारों में क्लेश की एक बड़ी वजह यह भी है कि बुजुर्ग सदस्य रिटायरमेंट लेना ही नहीं चाहते। उम्रदराज हो चुके हैं लेकिन बुजुर्गों को यह विश्वास ही नहीं है कि उनकी संतान अब योग्य हो चुकी है। संतान को सदा बालक समझने की गलती ही संयुक्त परिवारों को नष्ट कर रही है। अस्सी साल के पार बुज़ुर्ग व्यक्ति जमीन जायदाद, फिक्स्ड डिपोजिट, विवाह में मिठाई और वस्त्रों के लेन-देन के हिसाब आदि समीकरणों में उलझे पड़े हैं। बुजुर्गों को चाहिए कि अब ये रोज़मर्रा के काम भावी पीढ़ी को करने दें। इसका अर्थ यह नहीं है कि बुजुर्गों का सम्मान न हो। बुजुर्गों की दूरदृष्टि का लाभ मिलना ही चाहिए। बुजुर्गों को भी यह समझना चाहिये कि हर छोटी बात में भूमिका निभाना उनके लिए कष्टप्रद हो सकता है।
अपने मन पर नियंत्रण जरूरी
बुजुर्गों का अपने मन पर नियंत्रण जरूरी है। उम्र बढ़ती जाती है और शरीर कमज़ोर होता जाता है, लेकिन इसके विपरीत, बुजुर्गों के शौक, इच्छाएं और कामनाएं कतई कमजोर नहीं पडतीं। शरीर से भले ही मनुष्य वृद्ध हो जाए, लेकिन उसके मन में प्रसिद्धि, उत्तम भोजन व पर्यटन, कमाकर इकट्ठे हुए पैसे का सुख भोगने और परिवार से सम्मान पाने की इच्छा कम ही नहीं होती। यही समस्या का मूल है। एक उम्र के बाद इन्द्रियों, धन संग्रहण प्रवृत्ति तथा खुद की सत्ता के सुख को कम करने की दिशा में प्रयास शुरू कर देने चाहिए। साथ ही बुजुर्गों को वित्तीय स्वतंत्रता का ध्यान रखना चाहिए। बुजुर्गों को अपने खर्च को नियंत्रित कर कुछ गुप्त धन स्वयं के लिए अवश्य रखना चाहिए। बुज़ुर्गावस्था में ललित कला, घूमना, मित्र बंधुओं से वार्तालाप व मेलजोल, चित्रकारी, बागवानी जैसे अपने शौक जीवित रखना जरूरी है, ताकि जीवन्तता बनी रहे। याद रहे, कि बुज़ुर्गावस्था एक उम्र है। मानसिक बुढ़ापे से बचिए। यही जीने का तरीका है।






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