‘टरबन मैन’ जसवंत राज मेहता
शख्सियत बलवंत राज मेहता,वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार जोधपुर की धरती पर समय-समय पर ऐसे व्यक्तित्व जन्मे जिन्होंने अपने आचरण, आदर्शों और कर्म से समाज की दिशा बदली। इन विभूतियों में जसवंत राज मेहता का नाम...

शख्सियत
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार
जोधपुर की धरती पर समय-समय पर ऐसे व्यक्तित्व जन्मे जिन्होंने अपने आचरण, आदर्शों और कर्म से समाज की दिशा बदली। इन विभूतियों में जसवंत राज मेहता का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे ऐसे जनप्रतिनिधि रहे जिन्होंने सिद्धांतों को सत्ता से ऊपर रखा और जनता का विश्वास ही अपनी सबसे बड़ी पूंजी माना। संसद में उनका जोधपुरी साफा केवल पहनावा नहीं था, बल्कि उनकी पहचान और मर्यादा का प्रतीक था। तभी तो पंडित नेहरू उन्हें स्नेह से “टरबन मैन” कहा करते थे।
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जसवंत राज मेहता का जन्म एक जैन परिवार में हुआ। संस्कारों की गहराई और सेवा का भाव उनमें बचपन से ही था। सरदार स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई उन्होंने जसवंत कॉलेज से की। यही संस्थान उनके विचारों की प्रयोगशाला बने, जहां वे छात्र जीवन में ही नेतृत्व और संगठन क्षमता के लिए पहचाने जाने लगे। उनका व्यक्तित्व प्रशासनिक सेवाओं में भी चमका। उन्होंने उप जिला कलेक्टर से लेकर मुख्य सचिव और विधिक सलाहकार तक के पदों पर काम किया। उनकी कार्यशैली हमेशा पारदर्शी और जनहितकारी रही। 1946 का वर्ष उनके जीवन में निर्णायक साबित हुआ। खाद्य नीति पर सरकार का निर्णय उन्हें जनता के हित के विपरीत लगा। उन्होंने पद, प्रतिष्ठा और सुविधाएं छोड़कर त्यागपत्र दे दिया। यह केवल नौकरी का त्याग नहीं था, बल्कि उनके सिद्धांतों की जीत थी। इस त्याग ने उन्हें साधारण अधिकारी से असाधारण व्यक्तित्व बना दिया।
इसके बाद उनके लिए राजनीति की राह खुली और 1952 का लोकसभा चुनाव उनके जीवन का ऐतिहासिक पड़ाव था। जोधपुर की जनता के विश्वास के सहारे उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से सांसद बने। संसद में जसवंत राज मेहता का व्यक्तित्व अलग ही आभा बिखेरता था। वे पारम्परिक जोधपुरी वेशभूषा और साफे में संसद भवन पहुंचते। वे मरुभूमि की समस्याएं, किसानों की पीड़ा और जनता की तकलीफें पूरे दमखम से सदन में उठाते। उनकी स्पष्टवादिता और सादगी उन्हें अलग पहचान दिलाती थी।
उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग लालबहादुर शास्त्री से जुड़ा है। 1957 में शास्त्रीजी ने उन्हें कांग्रेस में शामिल होने का आग्रह किया। मेहता ने साफ़ कहा कि यदि उनके मित्र और सहयोगी हरिशचंद्र माथुर कांग्रेस में आते हैं, तभी वे भी शामिल होंगे। यह शर्त सिद्धांत और घनिष्ठ मित्रता की मिसाल थी। अंततः वे कांग्रेस में आए और उनकी पहचान और भी मजबूत हुई। 1957 में उनकी जीत पर जोधपुर में ऐतिहासिक स्वागत हुआ, जो उनकी लोकप्रियता की निशानी थी।
सार्वजनिक जीवन में जसवंतराज मेहता के योगदान की सूची लम्बी है। राजस्थान हाईकोर्ट की बेंच को जोधपुर में कायम रखने में उनकी अहम भूमिका रही। गिरदीकोट से सोजती गेट तक नई सड़क की परिकल्पना भी उनकी ही थी, जो बाद में शहर की सबसे महत्वपूर्ण धमनियों में से एक बनी। उनकी पहचान केवल नेता की नहीं, बल्कि संवेदनशील लेखक की भी थी। पत्र लेखन में वे पारंगत थे। महाराजा से लेकर संसद तक, सभी उनकी लेखनी की कला के कायल थे।
उनकी ईमानदारी के किस्से आज भी आदर्श बनकर सामने आते हैं। नाजायज धन लेना उनके सिद्धांतों के विपरीत था। जब निजी जीवन में कर्ज का बोझ बढ़ा, तब भी उन्होंने बेईमानी का सहारा नहीं लिया। उन्होंने जोधपुर के पावटा स्थित विशाल बंगले को बेचकर कर्ज चुकाया। गृहस्थ जीवन में वे समान रूप से सरल और सादगीप्रिय थे। पत्नी चंदादेवी और चार बच्चों के साथ उन्होंने संयुक्त परिवार की परम्परा निभाई। उनका मानना था कि यदि समाज संयुक्त परिवार की भावना से चले, तो अधिकांश समस्याएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी। वे जातिप्रथा जैसी रूढ़ियों के खिलाफ थे। कुछ समय तक उन्होंने अपने नाम से “मेहता” उपनाम हटाकर केवल “जसवंत राज” लिखना शुरू किया।
जोधपुर और पाली की जनता के लिए वे उस वृक्ष की तरह रहे जिसकी छाया सबको समान ठंडक देती है। उनकी दूरदर्शिता और निष्पक्षता ने उन्हें लोकप्रिय नेता बनाया। 1946 में लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रवेश कर सबसे अधिक मतों से विजयी होना और फिर लगातार तीन बार सांसद चुना जाना उनके जनाधार का सबूत है। उनके पुत्र प्रो. वी.आर. मेहता स्मृतियों में कहते हैं “पिताजी ने कभी अपने लिए कुछ सुरक्षित नहीं रखा। वे हमेशा कहते थे कि जीवन का असली मूल्य दूसरों के लिए जीने में है।” यह शिक्षा वे अपने परिवार और समाज दोनों को देते रहे।
दुर्भाग्य यह है कि आज जोधपुर शहर में उनके नाम का कोई बड़ा स्मारक या स्मृति आयोजन नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि उनकी वजह से ही जोधपुर की न्यायिक गरिमा, सड़क संरचना और जनप्रतिनिधित्व मजबूत हुआ। उनका जीवन हमें सिखाता है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम है। उनका जीवन हर युग और हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। सचमुच, जसवंत राज मेहता साफे से संसद तक की ऐसी यात्रा के प्रतीक हैं, जिसे भुलाना असंभव है।






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