वो सेल्समैन जो बन गए पहले सुपर स्टार
सहगल साहब हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार कहे जाते हैं. आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि उन्होंने रेलवे टाइमकीपर जैसा काम कर पैसा कमाना शुरू किया और बाद में में वे टाइपराइटर सेल्समैन का काम भी करने लगे...

सुधांशु टाक
हिंदी सिनेमा में अब तक एक से बढ़कर नायाब कलाकार आए और छा गए . अब तक के सफर की बात करें तो अशोक कुमार, राज कपूर , देवानंद , दिलीप कुमार, राजेश खन्ना , अमिताभ बच्चन जैसे बड़े सुपरस्टार ने हिंदी सिनेमा के परदे को रोशन किया . इन सभी का अपने जमाने मे बड़ा और जबरदस्त क्रेज रहा है . लेकिन इन सबसे भी पहले ये रुतबा एक ऐसे स्टार को हासिल था , जिसका दीवाना उस दौर का प्रत्येक सिने प्रेमी था. बाद के ये सुपर स्टार जैसे दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन तक भी इसी स्टार के दीवाने थे और इसे कॉपी करते थे . इस अभिनेता का नाम था कुंदन लाल सहगल यानी के एल सहगल.
ये सहगल साहब हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार कहे जाते हैं. आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि उन्होंने रेलवे टाइमकीपर जैसा काम कर पैसा कमाना शुरू किया और बाद में में वे टाइपराइटर सेल्समैन का काम भी करने लगे थे. लेकिन जब वे फिल्मों में आए तो अपने ज़माने के रॉकस्टार बन गए . उस जमाने में लोग उनकी सिंगिंग को लेकर क्रेज़ी थे और एक्टिंग के दीवाने .
जम्मू रियासत के तहसीलदार अमरचंद सहगल के घर 11 अप्रैल 1904 को उनका जन्म हुआ था. जालंधर से वास्ता रखने वाले अमरचंद के दो बेटे थे – रामलाल और हज़ारीलाल. तीसरे का नाम रखा गया कुंदन लाल.
कुंदन बचपन से ही अपनी मां को रोज़ सुबह भजन गाते देखते थे. रात को उनसे लोरी सुनते तभी नींद लेते. स्कूल जाने लगे तो पढ़ाई में मन नहीं लगता लेकिन गाना सुनाने को कहो तो रेडी रहते थे. जंगल में चिड़िया का चहचहाना सुनते, गडरियों के लोकगीत सुनते, घऱ में मनोयोग से भजन गाते . यहीं से संगीत उनमें स्थाई रूप से बस गया. बड़े होने लगे तो मां के गाए भजनों को हूबहू वैसे ही गाकर सुनाने लगे. जीवन के आखिरी दिनों तक कुंदन धार्मिक रहे. उनके तीन बच्चे हो गए थे. वे सुनते रहते थे और कुंदन रोज भजन गाते थे. लेकिन उन्हें शराब की बुरी लत लग चुकी थी .वे रोज सुबह उठकर हार्मोनियम लेकर बालकनी में बैठ जाते थे और दो भजन गाते थे – “उठो सोनेवालों सहर हो गई है, उठो रात सारी बसर हो गई है” और “पी ले रे तू ओ मतवाला, हरी नाम का प्याला.”
बचपन में उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली लेकिन संघर्ष के दिनों में जरूर अलग-अलग जगह से सीखने की कोशिश करते रहे. कानपुर में वे पेट पालने के लिए दिन में रैमिंग्टन के टाइपराइटर बेचा करते थे. लेकिन शाम को उस्तादों के साथ संगत करते थे. भैरवी जैसे राग सीखते थे. इसी शहर में उनकी एक गुरु-मां बन गई थीं जिनसे वो ठुमरी और दादरा सीखते थे.
फिर वे कलकत्ता चले गए वहां घूम-घूमकर साड़ियां बेचने का काम किया. इसके बाद वे न्यू थियेटर्स स्टूडियो से जुड़े जहां से उनकी फिल्मी यात्रा शुरू हुई. यहां तक पहुंचने में सहगल को 13-14 साल लगे. कुछ वक्त बाद 16 जनवरी 1932 को फिल्मों में उनकी एंट्री हुई. वो फिल्म थी ‘मोहब्बत के आंसू’ से. वे हीरो भी थे और इसके गाने भी गाए थे. फिल्म नहीं चली. अगले साल उनकी चार फिल्में आईं जिनमें दो में उन्होंने भजन गाए थे. दो में एक्टिंग की. ‘पूरण भगत’ में उनके भजन बड़े लोकप्रिय हुए. लेकिन ये तीसरे साल आई फिल्म ‘चंडीदास’ थी जिसके बाद उन्हें पलटकर नहीं देखना पड़ा.
और ये 1935 का साल था जब एक सुपरस्टार के तौर पर उनका जन्म हुआ. फिल्म थी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के फेमस नॉवेल पर बनी ‘देवदास’.
उनकी फिल्मों के गानों ने भी पूरे भारत में लोगों को दीवाना किया हुआ था. जैसे 1937 में आई फिल्म ‘प्रेसिडेंट’ का ‘गाना इक बंगला बने न्यारा’.
इसके 32 साल बाद आई ब्लॉकबस्टर ‘दो रास्ते’ (1969) में बलराज साहनी का किरदार सहगल के इसी गाने को सुनता रहता है. कहानी भी घर बचाने के संघर्ष पर आधारित होती है. ये गाना उसका रेफरेंस पॉइंट था. इसी फिल्म में राजेश खन्ना भी थे जिन्होंने साहनी के सबसे छोटे भाई का रोल किया था. इस फिल्म में साहनी का पात्र जैसे फैन की तरह सहगल का ये गाना सुनता था, वो दीवानगी भारत भर के लोगों में रही.
सहगल के स्टारडम का पहला दशक चल रहा था और एक बच्ची थी जो उनकी दीवानी थी. नाम था लता. लता मंगेशकर. आज जिन लता मंगेशकर की सिंगिंग मौलिकता और विशुद्धता का बहुत ऊंचा पैमाना है, वे लता म्यूजिक सीखने के शुरुआती वर्षों में सहगल की तरह गाने की कोशिश करती थीं. घर में फिल्मी गानों को गाना पसंद नहीं किया जाता था लेकिन लता को छूट थी. वे अपने पिता के साथ सहगल के गाने गाती रहतीं. सहगल की वे ऐसी दीवानी थीं कि उनसे शादी करने के सपने देखती थीं. लता ने एक बार बताया, “जितना मुझे याद आता है, मैं हमेशा से के. एल. सहगल से मिलना चाहती थी. बच्चे के तौर पर मैं कहती थी – जब बड़ी हो जाऊंगी तो उनसे शादी करूंगी. तब मेरे बाबा मुझे समझाते थे कि जब तुम शादी करने जितनी बड़ी हो जाओगी तो सहगल साब शादी की उम्र पार कर चुके होंगे.” लता को ये अफसोस हमेशा रहा कि वे जीवन में कभी सहगल से नहीं मिल पाईं. वे एक तरह से उनके परोक्ष म्यूजिक गुरु भी थे. जैसे कि हिंदी सिनेमा के लैजेंडरी सिंगर-एक्टर किशोर कुमार भी सहगल के बड़े प्रशंसक थे. वे भी सहगल को अपना म्यूजिकल गुरु मानते थे. वे पहले-पहल बंबई आए ही इसलिए थे कि बस एक बार सहगल से मिल सकें.
सहगल का स्टारडम कैसा था इसे दिलीप कुमार के शब्दों में मुकम्मल रूप में जान सकते हैं. बॉम्बे टॉकीज़ में दिलीप कुमार अपनी फिल्म ‘मिलन’ (1947) की शूटिंग कर रहे थे. इसके डायरेक्टर नितिन बोस थे. पास ही में किसी और फिल्म का मुहुर्त चल रहा था. बोस और दिलीप भी वहीं थे. दिलीप साब ने इस अनुभव को यूं याद किया,
“मुझे अच्छी तरह याद है नितिन बाबू ने कहा था आओ हम तुम्हे किसी ख़ास दोस्त से मिलाते हैं. उस दिन मुहुर्त के मेहमानों में चंद्रमोहन साहब भी थे, अशोक भैय्या भी थे, और वहीं कहीं मोती भैय्या की हंसी भी गूंज रही थी. और सामने, दूर.. मेरे सामने ही सहगल साहब एक कुर्सी पर, सफेद कुर्ता और सफेद पायजामा पहनकर बैठे थे. अब इन तमाम बड़े-बड़े आर्टिस्टों के सामने से होकर सहगल साहब तक पहुंचना भी मेरे लिए एक मंजिल तय करने के बराबर था.
..जब नितिन बाबू ने मेरा तार्रुफ करवाया उनसे तो वो बड़ी ही शफक़त से मिले. मेरा हाथ पकड़कर अपने पास बैठा लिया. मुख्तसर बातें कीं. उनकी उन बातों में बहुत ही अपनापन और सादगी थी. मुझे ऐसे लगा जैसे, अपने ही घर का कोई बुजुर्ग मुझसे बातें कर रहा हो. थोड़ी देर बाद वो किसी ख़याल में खो गए. और दूर आम के पेड़ों पर टकटकी लगाए यूं देख रहे थे जैसे मन ही मन में कुछ गुनगुना रहे हों.”
पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद सैयद के शब्दों में – ‘सिनेमा का संगीत सहगल ने ईजाद किया। फ़क़ीरों-सा बैराग, साधुओं-सी उदारता, मौनियों-सी आवाज़, हज़ार भाषाओं का इल्म रखने वाली आंखें, रात के पिछले पहर गूंजने वाली सिसकी जैसी ख़ामोशी, और पुराने वक़्तों के रिकार्ड की तरह पूरे माहौल में हाहाकार मचाती एक सरसराहट। वह कौन-सी गंगोत्री है, जहां से निकल कर आती है सहगल की आवाज़ ?’
नई पीढ़ी ने भले ही सहगल के गानों को मज़ाक का पात्र समझा हो लेकिन दिलीप साहब ने उसे यूं देखा था, “उनकी एक फिल्म थी जिसका नाम था ‘ज़िंदगी’. उस फिल्म का वो आखिरी दर्दनाक सीन मुझे कभी नहीं भूलता. जिसमें निहायत ही मतीन अंदाज में सहगल साब फिल्म की हीरोइन जमना की लाश के पास बैठे हुए थे और अपनी महबूबा की मौत का सारा कर्ब, सारी रूहानी तकलीफ उनके उस गाने में ढल गई, जो उन्होंने उस वक्त गाया थाः सो जा, सो जा, सो जा राजकुमारी सो जा.”
सहगल ने हिंदी, बंगाली और तमिल भाषा की 36 फिल्मों में अभिनय किया था. ज्यादातर हिंदी थीं. उन्होंने 185 के करीब गाने गाए. इनमें 110 हिंदी और बाकी ज्यादातर बंगाली थे. जब 1937 में उनकी पहली बंगाली फिल्म ‘दीदी’ रिलीज हुई तो सामान्य और संभ्रांत दोनों वर्ग के दर्शक उनके मुरीद हो गए.
सहगल की आवाज की लोकप्रियता का यह आलम था कि कभी भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय रहा रेडियो सीलोन कई साल तक हर सुबह सात बज कर 57 मिनट पर इस गायक का गीत बजाता था .
सहगल की आवाज लोगों की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गई थी. वे रवीन्द्र संगीत गाने का सम्मान पाने वाले पहले गैर बांग्ला गायक थे. यह वह समय था जब भारतीय फिल्म उद्योग मुंबई में नहीं बल्कि कलकत्ता में केंद्रित था. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस जमाने में उनकी शैली में गाना अपने आपमें सफलता की कुंजी मानी जाती थी.
एक समय में जब पंजाबी होने के कारण उनसे बंगाली गाने गवाने और एक्टिंग करवाने को लेकर साफ मना कर दिया, उन्हीं के बंगाली गायन को इस फिल्म में इतना पसंद किया गया कि खुद रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, “तुम्हारा गला कितना सुंदर है.”
कलकत्ता और बंबई की फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने 15 साल काम किया. 1947 में उनकी आखिरी फिल्म ‘परवाना’ रिलीज हुई, उनकी मृत्यु के बाद. शराब ने उन्हें जिलाए भी रखा, और जीने भी नहीं दिया.
सहगल जनवरी, 1947 में केवल 43 वर्ष की उम्र में इस संसार को अलविदा कह गए थे. 18 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि है। ‘राजस्थान टुडे’ की ओर से उनकी पुनीत आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि। शत शत नमन





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