मैजेस्टिक टॉकीज को बचाने के लिए महर्षि ने बेच दिया अपना सबकुछ
क्या आप जानते हैं कि जोधपुर के एक सिनेमा संचालक ने आज़ादी के तुरंत बाद अंग्रेज़ अधिकारियों से कागज़ी लड़ाई लड़ते हुए अपने थिएटर के लाइसेंस को बचाने के लिए अपना सब कुछ बेच डाला...

(जोधपुर स्थापना दिवस विशेष)
-अयोध्या प्रसाद गौड़,
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अगर किसी देश, राज्य या शहर के मिज़ाज़ का इतिहास टटोलना हो तो हमें उसके मनोरंजन स्थलों के इतिहास पर नज़र डालनी चाहिए। घर के तहखाने में धूल चढ़े बक्सों की तलाशी में जो दस्तावेज मेरे हाथ लगे वो मेरे लिए इतिहास की एक खिड़की खोलने जैसे थे। उन दस्तावेजों में छुपी थी मेरे दादा रामचंद्र महर्षि की एक फोटो और उनके सिनेमा हॉल से जुडी चौंकाने वाली जानकारी। क्या आप जानते हैं कि जोधपुर के एक सिनेमा संचालक ने आज़ादी के तुरंत बाद अंग्रेज़ अधिकारियों से कागज़ी लड़ाई लड़ते हुए अपने थिएटर के लाइसेंस को बचाने के लिए अपना सब कुछ बेच डाला था?
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हम बात कर रहे हैं 1938 में सोजती गेट के पास शुरू हुए मैजेस्टिक टॉकीज और उसके संचालक रामचंद्र महर्षि की। मैजेस्टिक टॉकीज के समय घटित रोचक किस्सों में एक किस्सा उन दर्शकों के बारे में था, जो ओपन स्काई थिएटर में पत्थर की बेंचों पर विराजमान हो, खुद को वीआईपी मानते। ज़मीन पर बैठने वालों से दो आने का टिकट वसूला जाता, जबकि बेंचों पर बैठने वाले चार आने यानी पच्चीस पैसे का टिकट खरीदते।
“दोआने वाले, हाका करो रे!”
एक बार बिजली चले जाने या मशीन में रोल फंस जाने के कारण अचानक फिल्म प्रदर्शन रुका तो बेंचों पर बैठे दर्शकों में से एक ने लोअर क्लास वाले दर्शकों को सम्बोधित करते हुए कहा: “दोआने वाले, हाका करो रे!” अब, नीचे बैठने वालों में से एक के दिल पर ये बात लग गई और वहां से करारा जवाब आया: “क्यूं रे! चारआने वालों के मुंडे फूलीजियेड़े हैं क्या?”
वर्ष 1923 में जोधपुर का पहला सिनेमाघर सोजती गेट के पास सूरतसिंह जी की कोठी में शुरू हुआ। यहां मूक फिल्मों का प्रदर्शन होता था। थिएटर में लगभग सत्तर लोगों के ज़मीन पर बैठने की व्यवस्था होती थी। ख़ास लोगों के लिए मुड्ढे भी लगाए जाते थे। बिना साउंड वाली मूवी को देखने का क्या मतलब! इसलिए वहां दरवाज़े के ऊपर बनी खिड़की में गुल मोहम्मद उर्फ गुल्लू अपनी बुलंद आवाज़ में पर्दे पर चल रही कहानी रोचक तरीके से पढ़ कर लगभग लाइव सुनाते।
दस बार होते थे इंटरवल
उन दिनों फिल्म प्रदर्शन के दौरान दस बार इंटरवल होते थे। फिल्म की रील या रोल गट्टों के रूप में बॉक्स में आती और एक गट्टा चल जाने के बाद नई रील लगाने के लिए मशीन को रोकना पड़ता। रामचंद्र महर्षि ने सोजती बारी के पास गिरधारी महाराज के नोहरे में मैजेस्टिक टॉकीज शुरू किया, उन्हीं दिनों कृष्णा टॉकीज, कंटालिया और एम्पायर टॉकीज भी शुरू हुए। रामचंद्र ने सिनेमा प्रेमियों को नया और निर्बाध एक्सपीरियंस देने के लिए मैजेस्टिक टॉकीज को डबल मशीन थिएटर के रूप में विकसित करने का निर्णय किया। ऐसा करने से रोल चेंज करने के लिए बार- बार होने वाले इंटरवेल से छुटकारा मिल गया। इंटरवल में दर्शकों के मनोरंजन के लिए लाइव डांस का आयोजन उन दिनों बड़ा आकर्षण का केंद्र था। बड़े बैनर की फिल्मों के प्रदर्शन के समय मुंबई से डांसर्स आकर कुछ दिन लाइव डांस पेश करते और उन्हें देखने टिकट खिड़की पर दर्शकों का हुजूम टूट पड़ता। मैजेस्टिक थिएटर ने बागवान, देशभक्त और कई हिट फिल्मों से अपने सफर को आगे बढ़ाया।
अंग्रेज अधिकारी ने लाइसेंस के नवीनीकरण से किया मना
महर्षि के सपने और सफर पर उस समय ब्रेक लग गया, जब दस साल संचालन के बाद 1948 में अंग्रेज़ अधिकारी ने थिएटर का लाइसेंस नवीनीकरण करने से मना कर दिया। डबल मशीन लगाने और उनके रखरखाव में अपना पैसा लगा चुके महर्षि ने राज परिवार को पत्र लिख कर अपनी व्यथा सुनाई और लाइसेंस रीन्यू करने के बदले सात हज़ार रुपए दान की पेशकश बापू मेमोरियल बनाने के लिए की। पुराने दस्तावेज उस दौर में रियासत की तरफ से जारी होने वाले लाइसेंस प्रक्रिया को भी रोचक तरीके से उजागर करते हैं। जोधपुर रियासत के राजघराने ने भी मनोरंजन के केंद्र बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। महाराजा उम्मेद सिंह ने स्टेडियम सिनेमा का निर्माण करवाया, जिसका उद्घाटन 3 नवंबर 1939 को सोहराब मोदी की फ़िल्म पुकार के प्रदर्शन के साथ हुआ। इसी स्टेडियम थियेटर में पृथ्वीराज कपूर और सोहराब मोदी अन्य कलाकारों के साथ ‘दीवार’ नाटक का मंचन करने आए।
पृथ्वीराज कपूर खानदान का जोधपुर रियासत से नाता
रोचक यह भी है कि पृथ्वीराज कपूर खानदान का नाता जोधपुर रियासत से है। ये उस समय की बात है जब जोधपुर रियासत में महाराजा जसवन्तसिंह प्रथम का राज था। यही कोई 1650 के आस-पास। बाद में जब महाराजा अपने निजी सहायकों और सैनिकों के साथ काबुल-अफगानिस्तान गए तो कपूर खानदान के पुरखे भी उनके साथ हो लिए। महाराजा हनवंतसिंह द्वारा ओलंपिक सिनेमा हॉल की शुरुआत 1949 में फ़िल्म ‘बड़ी बहन’ से हुई। अप्रैल 1950 को ‘दुनिया’ फ़िल्म के प्रदर्शन के साथ आनंद सिनेमा की शुरुआत हुई। ‘भाभी’ फिल्म के साथ 1951 में चित्रा और फिर ओलिंपिक सिनेमा हॉल भी शुरू हुए। नूर मोहम्मद ने 1978 में पांचवीं रोड पर कोहिनूर की नींव रखी। फ़िल्म मिस्टर नटवरलाल के साथ 26 जनवरी 1980 को ये शुरू हुआ। राजघराने का तीसरा सिनेमा हॉल दर्पण 19 अप्रैल 1985 को फिल्म ‘राम तेरे कितने नाम’ के साथ शुरू हुआ। 1983 में नसरानी सिनेमा हॉल की शुरुआत के बाद अस्सी के दशक में यहां छोटे- बड़े बीस सिनेमा हॉल थे।






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